खेत-खलियान पर आपका स्‍वागत है - शिवनारायण गौर, भोपाल, मध्‍यप्रदेश e-mail: shivnarayangour@gmail.com
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Monday, January 4, 2016

समर्थन मूल्य बढ़ाने और कम फीसदी ब्याज दर पर कर्ज की मांग

दिल्ली की खबर है कि वित्त मंत्री अरुण जेटली ने किसान प्रतिनिध‍ियों के साथ 4 जनवरी को दिल्ली में बैठक की। इस बैठक में किसान प्रतिनिधियों ने मांग रखी कि किसानों को 4 फीसदी ब्याज पर 5 लाख रुपए तक कर्ज दिया जाए। उन्होंने समर्थन मूल्य बढ़ाने और फसल बीमा योजना तथा स्थाई निर्यात नीति बनाने की भी मांग वित्त मंत्री के सामने रखी है। गौरतलब है कि अभी किसान 7% ब्याज पर 3 लाख तक ही कर्ज ले सकते हैं और यदि वे समय पर कर्ज चुका देते हैं तो उन्हें ब्याज में 3 % छूट मिलती है।

दो घंटे की इस बैठक के बाद कंसोर्टियम ऑफ इंडियन फार्मर्स एसोसिएशन (सिफा) के सेक्रेटरी जनरल बीडी रामी रेड्‍डी ने कहा, “किसानों की हालत बेहद खराब है। सरकार उचित कदम नहीं उठा रही। वहीं वित्त मंत्री ने कहा कि संकट के दौर से गुजर रहे कृषि क्षेत्र उबारने के लिए सरकार लगातार प्रयास कर रही है। हमने किसानों को फसल के लिए 4 फीसदी ब्याज पर 5 लाख रुपए तक कर्ज उपलब्ध कराने की मांग की है। किसान प्रतिनिध‍ियों ने सरकार को कृषि उपज की लागत में 50% मुनाफा जोड़कर समर्थन मूलय तय करने की भी सलाह दी है।  वित्त मंत्री अरुण जेटली ने प्रतिनिधियों से कहा कि कृषि क्षेत्र संकट के दौर से गुजर रहा है। इससे बाहर निकालने के लिए सरकार कृषि क्षेत्र को सबसे अधिक महत्व दे रही है।

किसान संगठन भारत कृषक समाज (बीकेएस) के चेयरमैन अजय वीर जाखड़ के मुताबिक सरकार को दो लाख रुपए तक कर्ज पाने वाले किसानों की संख्या बढ़ाकर दोगुनी करनी चाहिए और इसके लिए एक फीसदी ब्याज लेना चाहिए। सरकार को कृषि कर्ज पर ब्याज में दी जाने वाली छूट खत्म करनी चाहिए और छोटे किसानों को बैंकों से कर्ज उपलब्ध कराने में की पहल करनी चाहिए। फर्टिलाइजर उद्योग की संस्था एफएआई ने बैठक के दौरान कहा कि किसानों को सीधे यूरिया सब्सिडी ट्रांसफर करने की सुविधा शुरू होनी चाहिए। 50,000 करोड़ रुपए से ज्यादा बकाया के भुगतान के लिए अगले तीन साल तक बजट में अधिक राशि का आवंटन होना चाहिए। बैठक में सिफा, बीकेएस के अलावा नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड, फर्टिलाइजर को-ऑपरेटिव इफको, फर्टिलाइजर एसोसिएशन ऑफ इंडिया आदि संगठनों के प्रतिनिधियों और विशेषज्ञ शामिल हुए।

Jan 05, 2016

Friday, January 1, 2016

किसान की गर‍िमा

खेती की बात आते ही हमारे मन में एक गांव की तस्वीर बनने लगती है। बैलगाड़ी, लहलहाती फसल नज़र आने लगती है। एक तथाकथ‍ित सभ्य समाज खेतीहर लोगों को थोड़ा फर्क किस्म से देखने लगता है। मसलन एक कम पढ़ा-लिखा, सिर पर एक गमछा बांधा हुए व्यक्ति‍ की अवधारणा बना लेता है। दिक्कत यह है कि उसे बराबरी का दर्जा दिया जा सके, ऐसी छबि बिरले ही आती होगी। 

कभी इस बात का आंकलन भी नहीं होता कि जिस सिर पर गमछा या अँगोछा ओड़े व्यक्त‍ि की अवधारणा आपके जेहन में बन रही है, हमारा जीवन उसकी बदौलत ही चल रहा है। हमारे हर खाने-पीने, ओड़ने-बिछाने की सामग्री उसके सौजन्य से ही प्राप्त हो रही है। यानी मसला है कि उसकी गरिमा के बारे में हम लगभग नहीं ही सोचते हैं। एक तबका नए साल का स्वागत करने में खूब खर्चा कर रहा है। बड़ी बड़ी होटलों में पार्टी चल रही हो जिसके एक दिन पार्टी में एक किसान के परिवार के दो-तीन माह या उससे भी ज्यादा का गुज़ारा चल सकता था। वहीं यदि हम देखें तो इस समय वही किसान खेती के संघर्षपूर्ण काम में जुटा है। और यदि वह न जुटा हो तो केवल पैसे से जीवन का संचालन कर पाना सम्भव ही नहीं है। 

क्या नए साल के इस जश्न के साथ हम उस मेहनतकश को कम से कम गरिमा के साथ स्वीकार कर सकेंगे। यदि हमारी नज़र में उसका सम्मान जागता है तो इतना भी पर्याप्त है, क्योंकि इस सम्मान के चलते हम उसे अपने जीवन में जगह दे पाएंगे। 

तो नए साल 2016 की आप सभी को ढेर सारी शुभकामनाएं !!!

श‍िवनारायण गौर,
भोपाल 1 जनवरी, 2016

Wednesday, October 1, 2014

बगैर जुते खेत ठंडक पैदा करते हैं



प्रोसीडिंग्‍स ऑफ नेशनल एकेडमी आफसाइन्‍सेज़ में प्रकाशित एक शोध पत्र में बताया गया है कि यदि खेत में जुताई न की जाए तो फसल क्षेत्र के आसपास के तापमान में 2 डिग्री सेल्सियस तक की कमी आती है। एक प्रकार की प्राकृतिक खेती में बीज बोने से पहले खेत की जुताई नहीं की जाती।
यह अध्‍ययन स्विस फेडरल इंस्‍टीट्यूटआफ टेक्‍नॉजॉली की जलवायु विशेषज्ञ सोनिया सेनेविरत्‍ने और उनके साथियों ने फ्रांस के दक्षिण-पूर्व में स्थित प्रोवेंस क्षेत्र में किया है।
आमातोर पर गैर-जुताई खेती इसलिए अपनाई जाती है ताकि भूक्षरण कम से कम हो। जब खेत में जुताई नहीं की जाती और पिछली फसल के अवशेषों को वहीं छोड़ दिया जाता है तो मिट्टी में नमी बनी रहती है। मगर पानी के वाष्‍पन की वजह से मिट्टी का तापमान भी कम होता है। मगर हाल के अध्‍ययन से पता चलता है कि बिना जुते खेतों के आसपास का तापमान अपेक्षाकृत कम रहता है।
सेनेविरत्‍ने का कहना है कि बिना जुते खेतों का तापमान कम रहने का कारण यह है कि ऐसे खेत धूप को ज्‍यादा मात्रा में परावर्तित कर देते हैं। इसे एल्‍बीडो प्रभाव कहते हैं। उन्‍होंने पाया कि गर्मी के महीनों में बगैर जुते खेत सामान्‍य खेतों की अपेक्षा 50 प्रतिशत ज्‍यादा परावर्तक होते हैं।
पहले किए गए अध्‍ययनों में पता चला था कि यह ठंडक बहुत अधिक नहीं होती है। मगर सेनेविरत्‍ने और उनके साथियों के अध्‍ययन से पता चलता है कि ठंडक का असर गर्मियों के महीनों में और वह भी सबसे गर्म दिनों में सबसे ज्‍यादा होता है। उन्‍होंने पाया कि साल भर का औसत देखेंगे तो बिना जुते खेतों का तापमान अन्‍य खेतों की अपेक्षा मात्र 1 डिग्री सेल्सियस कम रहता है मगर यदि कर्मी के सबसे कर्म दिनों का तापमान 1.6 डिग्री सेल्सियस तक कम रहता है। शोधकर्ताओं के मुताबिक दक्षिणी यूरोप में तो 2 डिग्री सेल्सियस तक का फर्क पड़ सकता है।
शोधकर्ताओं के मुताबिक होता यह है कि आम दिनों में धूप के कारण तापमान बढ़ता है और मिट्टी से पानी के वाष्‍पन की वजह से कम होता है। चूँकि जुते हुए खेतों में वाष्‍पन अधिक होता है इसलिए दोनों तरह के खेतों में तापमान में अंतर ज्‍यादा नहीं होता। मगर बहुत गर्म ‍दिनों में धूप और उसके परावर्तन काअसर हावी हो जात है और इन परिस्‍थतियों में बिना जुते खेत जयादा धूप को परावर्तित करके अपेक्षाकृत ठंडे बने रहते हैं।
इस अध्‍ययन से तो लगता है कि जितने बड़े क्षेत्र में गैर-जुताई खेती की जाएगी, तापमान को कम रखने में उतनी ही मदद मिलेगी। और नमी बनाए रखने व भूमि-क्षरण रोकने जैसे अन्‍य फायदे तो हैं ही। (स्रोत फीचर्स से)

Wednesday, January 1, 2014

खेती में रोजगार



समय समय पर हुए तमाम अध्‍ययनों से दो बातें सामने आती रही हैं। एक तो है कि लोग खेती के ज़रिए अपनी आज़ीविका नहीं चला पा रहे हैं मसलन वे खेती छोड़ रहे हैं और दूसरा हर साल शहरों में बस्तियों की संख्‍या में इज़ाफा हो रहा है। यद्यपि इन दोनों तरह के अध्‍ययनों के बीच के सम्‍बन्‍ध को जानना थोड़ा मुश्किल हैं क्‍योंकि यह बात तो सामने आती है कि बस्तियों में रहने वाले लोगों का जीवन कैसे चल रहा है। उनके प्रमुख रोजगार क्‍या है इत्‍यादि। लेकिन इस बात को लेकर मुझे कोई अध्‍ययन नहीं दिखाई दिया जो यह बताए कि बस्तियों में आने वाले नए लोग कौन हैं ? वे शहर की इस मुश्किल जिन्‍दगी को कम से कम खुशी-खुशी तो स्‍वीकार नहीं ही कर सकते। यानी ये वे लोग हैं जो कि बस्तियों में आने से पहले अपने जीवन के संघर्षों से हारे हुए लोग हैं और विकल्‍प की तलाश में इस तरह के जटिल हालातों में हैं।
खैर खेती छोड़कर शहरी बस्तियों में आकर मज़दूरी करने वाली बात को हम सीधे तौर पर स्‍वीकार न भी करें तो भी इस बात से नहीं नकारा जा सकता है कि खेती पर संकट है। वर्तमान खेती-किसानी के विकल्‍प तलाशना फिलहाल किसानों की मजबूरी है। चूँकि खेती दरअसल केवल एक रोजगार ही नहीं है बल्कि वह एक जीवनशैली है। और जीवनशैली होने के कारण खेती से बाहर जाना किसानों के लिए खुशी की बात नहीं होती। पर यदि हम खेती पर पड़ते दबाबों को देखें तो असल में खेती से बाहर जाना ही खेती को सशक्‍त करने का एक तरीका हो सकता है। हम जानते हैं कि खेती का रकबा आए दिन कम हो रहा है और खेती पर दबाब लगातार बढ़ता जा रहा है। पर असल में खेती को छोड़कर रोजगार के अच्‍छे अवसर उपलब्‍ध कराने की महत्‍ती आवश्‍यकता है जिस पर अभी कोई खास काम नहीं हो पा रहा है। मैं एक खबर पड़ रहा था जिसमें एक अध्‍ययन के हवाले से कहा गया है कि 2014 में खेतीहर व्‍यवसाय में रोजगार के ज्‍यादा अवसर उपलब्‍ध होंगे। हालांकि इस बात को समझना भी जरूरी है कि ये खेतीहर व्‍यवसाय किस तरह के होंगे और क्‍या वे खेती-किसानी से जुड़े तबके को रोजगार के अवसर मुहैया करा पाने में समर्थ होंगे ?  खैर जो भी हमें शायद इस दिशा में सोचने की इस समय आवश्‍यकता है कि खेती के इतर रोजगार के मौके अधिक से अधिक कैसे उपलब्‍ध कराए जा सकते हैं और वह भी बिना शहरी बस्तियों में रहने वाले लोगों की संख्‍या में इजाफा किए
आप सभी को नए साल की शुभकामनाएं। 
शिवनारायण गौर

Thursday, April 9, 2009

किसानों की आत्महत्या से उठे सवाल

मध्य प्रदेश के होशंगाबाद ज़िले के बनखड़ी ब्लाक के एक गांव कुर्सीढाना के कृषक अमान सिंह ने अप्रैल के पहले हप्ते में जहरीली दवा पी ली जिससे अमान सिंह की मृत्यु हो गई। अमान सिंह पचास हजार ने 50 हजार का कर्ज सतपुड़ा क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक से एवं करीब एक लाख साहूकारों से ले रखा था। इस वर्ष अमान सिंह के खेतों में 35 क्विंटल गेहूं पैदा हुआ जो अपेक्षा से कहीं कम था। कर्ज की चिन्ता ने अमान को आत्महत्या जैसा निर्णय लेना पड़ा। यही नहीं बनखेड़ी के दो और गांवों के किसानों ने भी आत्महत्या जैसा कठोर कदम उठाने की कोशिश अप्रैल के पहले हप्ते में ही की। इन घटनाओं ने मध्य प्रदेश में किसानों के सामने आने वाले एक भावी संकट की ओर इशारा किया है।
गौरतलब है कि बनखेड़ी ब्लाक के ही ग्राम नांदना के एक किसान ने भी जहरीली दवा पी ली। किसान को तत्काल स्वास्थ्य केन्द्र ले जाया गया जहां उससे किसी तरह से मरने से बचाया जा सका। इस किसान ने कहा कि उसके खेत में इस साल केवल 12 क्विंटल गेहूं हुआ है जबकि उसे एक लाख पच्चीस हजार रुपयों का कर्ज पटाना था। विद्युत समस्या के कारण इस किसान को जनरेटर से सिंचाई करनी पड़ी जो कि काफी महंगी पड़ी। इन तमाम समस्याओं के चलते इस किसान ने आत्महत्या का रास्ता अख्तियार किया। लोगों की जागरूकता से इस किसान को बचाया जा सका। बात केवल इन दो किसानों की ही नहीं है। बनखड़ी के पास ग्राम भैरापुर के युवा किसान 22 वर्षीय मिथलेश रघुवंशी ने कर्ज में डूबने के कारण आत्महत्या कर ली थी। इस किसान की मां का कहना है कि फसल अच्छी नहीं हुई थी और और उसके बेटे पर कर्ज था जिसकी चिंता में मिथलेश ने अपनी जान दे दी। समाजवादी जन परिषद के गोपाल राठी कहते हैं कि सरकार की किसान विरोधी नीतियां ही आत्महत्या का प्रमुख कारण हैं। एक तरफ सरकार उद्योगपतियों को न्यौता दिया जा रहा है उनके साथ बिजली की आपूर्ति के लिए अनुबंध किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ किसानों को खेती के लिए पर्याप्त बिजली उपलब्ध नहीं करवाई जा रही है। किसान को क्रेडिट कार्ड बनवाने के लिए भी भटकना पड़ता है।
किसान के आत्महत्या की ये घटनाएं खेती पर मंडरा रहे खतरे के लिए आगाह करने वाली हैं। मध्य प्रदेश के कई इलाके सिंचाई के साधनों से महरूम है। छोटे-छोटे किसान सिंचाई के लिए पंपो का इस्तेमाल करते हैं। बिजली कटौती के कारण किसानों को खेतों में डीजल पंपों का उपयोग करना पड़ता है। जिसमें न केवल लागत बढ़ जाती है बल्कि कई तरह की अन्य दिक्कतों का सामना भी करना पड़ता है। पर्याप्त पैदावार न होना और कर्जों की वसूली की सख्त प्रक्रिया किसानों को मुश्किल में डालती है। फसल का दाम लागत मूल्य से भी कम मिलना खेती को घाटे का सौदा बनाता है। इसका सामना छोटा किसान करने में अक्षम है और उसे आत्महत्या की राह अपनानी पड़ रही है।
भारत सरकार का आर्थिक सर्वेक्षण 2007-2008 की एक जानकारी कहती है कि भारत के कुछ राज्यों में गेहूं का समर्थन मूल्य लागत से कम है। उल्लेखनीय है कि मध्य प्रदेश भी इनमें से एक राज्य है। वस्तुत: किसान को कर्ज लेकर खेती करनी पड़ती है। मध्य प्रदेश में किसानों के कर्ज की स्थिति चौकाने वाली है। एक जानकारी के मुताबिक मध्य प्रदेश के 80 से 90 फीसदी किसान कर्जग्रस्त हैं। प्रदेश के हर किसान पर औसतन 14 हजार 218 रुपए का कर्ज है। प्रदेश के 32,20,600 किसान कर्ज में हैं। रासायनिक खादों, कीटनाशकों के लगातार बढ़ते इस्तेमाल और पैदावार में ठहराव के कारण खेती की लागत में लगातार वृध्दि हो रही है। यह एक चिन्ता का मुद्दा है। इसका एक परिणाम मध्य प्रदेश में किसानों की आत्महत्याओं की घटनाओं का बढ़ना है। पिछले साल भी कुछ किसानों की आत्महत्याओं की खबरें मिली थीं। छिंदवाड़ा, खरगौन, भोपाल, बनखेड़ी, पिपरिया और बड़वानी के किसानों ने पिछले साल आत्महत्या जैसा कदम उठाया। प्रदेश सरकार या केन्द्र सरकार दोनों ही किसानों को गुमराह करती रही हैं। पर असल में किसानों की समस्याओं को इनमें से किसी ने भी नहीं उठाया है। खेती के कंपनीकरण जैसे कदम जरूर उठाने की कोशिश पिछले दिनों की गई हैं। प्रदेश सरकार ने पिछले साल एग्री बिजनेस मीट का आयोजन करके कई कंपनियों को खेती में प्रवेश करने के लिए कई तरह के लालच देने की कोशिश की। मानसून का जुआ कही जाने वाली खेती को घाटे से उबारने के लिए तुरन्त प्रयास किए जाने की जरूरत है अन्यथा यदि खेती की तबाही को नहीं रोका गया तो अंतत: संकट पूरे देश के सामने आएगा!
शिवनारायण गौर

होशंगाबाद जिले के बनखेड़ी ब्‍लाक के दो किसानों की आत्‍महत्‍या करने तथा एक किसान के आत्‍महत्‍या करने का प्रयास करने की घटनाएं एक चिन्‍तनीय मुद्दा है। प्रदेश में किसानों के आत्‍महत्‍या की घटनाएं झकझोरने वाली हैं निश्‍िचत ही इस बारे में गम्‍भीरता से सोचा जाना चाहिए।खेत खलियान की ओर से शिवनारायण गौर

Saturday, March 14, 2009

चार किसानों की विजय

रतलाम जिले के नयापुरा गांव में रहने वाले कृषक श्री दुलेसिंह इसी गांव के किसान धुलचन्द व अमरसिंह और रतलाम जिले के भवानीपुरा गांव के किसान मांगीलाल में एक समानता है। ये वे किसान हैं जो कपास की खेती करतहैं। इन चारों किसानों ने करीब चार साल पहले अपने खेत में कपास के बुलेट 707 नामक बीज को बोया था। लेकिन कम्पनी के वायदे के मुताबिक जब उनके कपास की पैदावार नहीं हुई तो चारों ने जिला उपभोक्ता फोरम में कम्पनी के विरूद्ध मुकदमा दायर कर दिया। शीघ्र ही वे यह मुकदमा जीत भी गए। लेकिन पैसा कम होने के कारण उन्हें राज्य स्तरीय आयोग में मुकदमा फिर से डाल दिया और वे जीत गए। इन चारों किसानों की एक जैसी कहानी उनकी जागरूकता और आम उपभोक्ताओं के लिए उपयोगी है।
इन चारों किसानों ने कपास के बीज रतलाम की ही एक मेसर्स मयुर एजेंसी से खरीदे थे। बीज को तैयार करने वाली सिकन्दराबाद की कावेरी सीड्स कंपनी लिमिटेड थी। जब किसानों ने ये बीज खरीदे थे तब कम्पनी ने वायदा किया था कि प्रत्येक पौधे में 120 से 150 डेण्डू (घेटे) एवं 20 से 25 क्विंटल कपास का उत्पादन होगा। लेकिन जब किसान ने इस बीज को लगाया तो उसके खेत में एक पौधे में केवल 12 से 19 डेण्डु ही लगे। डेण्डू कम लगने के कारण उत्पादन कम तथा घटिया होने की सम्भावना थी। इन किसानों ने इस बात की शिकायत अनुविभागीय अधिकारी, कृषि से की। उनकी इस शिकायत पर कार्यवाई करते हुए कपास की उक्त फसल का वैज्ञानिकों द्वारा निरीक्षण कियगया। वैज्ञानिकों की इस रिपोर्ट के मुताबिक उक्त प्रजाति के कपास के पौधों में शाखाएं सामान्य से काफी कम हैं तथा डेण्डू की औसत संख्या 10 से 12 प्रति पौधा है। फसल की वर्तमान स्थिति को देखते हुए इससे प्राप्त होने वाली उपज में से सामान्य 60 से 70 प्रतिशत तक कम होना सम्भावित है। उत्पादन कम होने की सम्भावना के बावजूद भी किसानों ने अपेक्षित कीटनाशक आदि का इस्तेमाल किया और इसके सबूत के लिए कीटनाशकों की खरीदी रसीद व खेत में डालने के बाद उसका पंचनामा बनवाया ताकि जरूरत होने पर वे इसका उपयोग कर सकें।
गौरतलब है कि कावेरी कम्पनी ने अपने बीज के प्रचार प्रसार हेतु जो पंपलेट छपवाया था उसके अनुसार फसल की अवधि 140 से 150 दिन, पौधे की उंचाई 4 से 5 फिट, डेण्डु का वजन 6 ग्राम तथा डेण्डु की संख्या 120 से 150 प्रति पौधा आदि जानकारी दी गई थी। लेकिन जब इन वायदों के मुताबिक पौधे तैयार नहीं हुए तो किसानों को इस बात का एहसास हो गया कि ये बीज निम्न और घटिया किस्म का हैं। और अंतत: वैसा ही हुआ। जब कपास का उत्पादन हुआ तो न तो उसकी गुणवत्ता अच्छी थी और न ही पैदावर पर्याप्त हुई थी।
किसानों ने बीज खराब होने की शिकायत उप संचालक, कृषि रतलाम को भी इस बात की शिकायत की थी। उप संचालक की शिकायत के बाद वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी एवं अनुविभागीय अधिकारी, कृषि रतलाम ने कपा कका निरीक्षण किया। उन्होंने जो रिपोर्ट सौंपी उसके मुताबिक फसल के निरीक्षण में उन्होंने पाया कि कपास की पौधे में एक ही शाखा है। तथा डेण्डू गिनने पर औसतन 10 से 12 ही पाए गए हैं जिससे निश्चित ही उत्पादन प्रभवित हो रहा है।
उत्पादन अच्छा और उत्तम गुणवत्ता का नहीं होने पर ये चारों किसान अपनी शिकायत लेकर जिला उपभोक्ता फोरम में गए। किसानों द्वारा प्रस्तुत किए गए सभी दस्तावेजों और साक्ष्यों के आधार पर फोरम ने पाया कि किसान को कम्पनी के द्वारा बेचा गया बुलेट 707 शंकर कपास बीज उत्तम गुणवत्ता का न होने के कारण बीज के सम्बन्ध में कम्पनी के वायदे के मुताबिक उत्पादन नहीं हुआ। इसकी भरपाई के लिए फोरम ने कम्पनी को कहा कि वो चारों किसानों को अलग अलग दस से पन्द्रह हज़ार की राशि दे। पर बात यहीं खत्म नहीं हुई कम्पनी भी यह राशि देने के लिए तैयार नहीं हुई और उसने अपनी अपील मप्र राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतिपोषण आयोग में कर दी। लेकिन वहां से उनकी अपील खारिज हो गई। पर किसान भी उन्हें भरपाई के लिए मिलने वाली राशि से सन्तुष्ट नहीं थे उन्होंने इस राशि को बढ़ाए जाने के लिए अपनी अपील राज्य उपभोक्ता आयोग में की।
इस अपील को मप्र राज्य उपभोक्ता विवार प्रतिपोषण आयोग ने स्वीकार कर लिया। शीघ्र ही इसका फैसला भी हो गया। फैसला किसानों के पक्ष में था। आयोग ने माना कि घटिया बीज के कारण किसान को कपास की पैदावार पर्याप्त नहीं मिली। वस्तुत: फोरम ने कम्पनी को निर्देश दिए कि वो उक्त चारों किसानों को 20 से 25 हजार रुपए उनके घाटे के भरपाई के लिए दे। किसानों की ये विजय उनके संघर्ष और जागरूकता दोनों का बखान करती है।

विश्‍व उपभोक्‍ता दिवस के मौके पर विशेष। उक्त लेख की जानकारी म.प्र. राज्य/ उपभोक्ताक विवाद प्रतिपोषण आयोग, के निर्णय के आधार पर खेत खलियान की ओर से शिवनारायण गौर

Tuesday, February 17, 2009

किसान को नहीं लुभाता बजट

वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने अपने भाषण में किसानों को असली नायक बताया। किसानों के लिए बजट में कुछ प्रावधान रखते हुए उन्होंने ये बात कही। हालाँकि यह अलग बात है कि केवल इसी साल कोई नई बात नहीं कही है। सरकार समय समय पर किसानों के लिए ऐसे उद्बोधन करती रहती है जिसमें उन्हें कई तरह की उपमाएं दी जाती है। लेकिन असल में केवल उपमाओं के भरोसे बजट को किसान हितैषी नहीं कहा जा सकता। जब उसके अन्य पहलुओं को देंखे तो लगता है कि यह बजट भी हर साल प्रस्तुत किए जाने वाले बजटों की भांति ही किसानों के लिए है।
इस साल के बजट में प्रमुख रूप से दो बातों की ध्यान दिया गया है। एक तो किसानों के लिए ऋण की राशि बढ़ाई गई है। और दूसरा उर्वरकों पर दी जाने वाली सब्सिडी की राशि में बढ़ोत्तरी की गई है। इसके अलावा बजट में जो प्रावधान किए गए हैं वो किसान को उतना प्रभावित नहीं करते। कर्ज की राशि में पिछले 2003-2004 के आबंटन की तुलना में तीन गुना वृद्धि कर 25 लाख करोड़ किया गया है। सरकार का कहना है कि सीमान्त और छोटे किसानों के 65,500 रुपयों की कर्जमाफी की है। गौरतलब है कि जब भी किसानों के हित की बात होती है तो उसके लिए सस्ती दर पर ऋण उपलब्ध करा देने को आसान का समाधान माना जाता है। और बजट में फिर उसी तरह के प्रावधान किए जाते हैं। असल में इस देश में सरकारी ऋण प्राप्त करने वाले किसानों से कहीं ज्यादा ऐसे किसानों की है जो कि साहूकारों से कर्ज लेते हैं। उन्हें किसी भी तरह की छूट का लाभ नहीं मिलता। और इससे भी फर्क किस्म की बात पर तटस्थता से विचार नहीं किया जाता कि असल में खेती घाटे का सौदा क्यों हो रही है? किसान को हर साल ऋण की आव6यकता क्यों होती है? यदि इनके कारणों को तलाशें तो आप पाएंगे कि असल में सरकार फसलों को वाजिब मूल्य दे पाने में असमर्थ है। उत्पादन लागत लगातार बढ़ते जा रही है। लागत को कम करने का प्रावधान कभी बजट में दिखाई नहीं देता।
केवल गेहूं की ही बात करें तो सरकार का आर्थिक सर्वेक्षण इस बात को स्वीकार करता है कि गेहूं की कीमत लागत से कम दी जा रही है। पंजाब, उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश के अलावा भी कई राज्य घाटे में गेहूं की खेती कर रहे हैं। इस साल 1080 रुपए समर्थन मूल्य तक किया गया है लेकिन एक आंकलन के मुताबिक यदि गेहूं का समर्थन मूल्य 1500 रुपए होता है तो किसानों को कुछ राहत हो सकती है। मसलन केवल ऋण की राशि बढ़ा देने से खेती का उपकार नहीं किया जा सकता। सरकार जिन 25 फसलों का समर्थन मूल्य घोषित करती है वह पर्याप्त नहीं होता। उसमें जो वृद्धि की जाती है वो लागत की तुलना में हमेशा कम ही होती है।
सरकार जोर शोर से कृषि विकास दर की बात करती है। बजट भाषण में भी इस बात का जिक्र किया गया कि यह 37 प्रति6ात रही। लेकिन असल में इस विकास दर का असली आधार नकदी फसलें हैं। और जब भी कृषि विकास दबढ़ाने की बात कही जाती है तो उसका सीधा सा मतलब है कि सरकार नकदी फसलों को और प्रोत्साहित करने की कोशिश कर रही है। पिछले पांच साल में नकदी फसलों का रकबा बढ़ा है। ये ही ऐसी फसलें है जिनमें कीटनाशकों और उर्वरकों को खूब इस्तेमाल किया जा रहा है। मसलन सब्सिडी भी नकदी फसलों की ओर ही जा रही है। नकदी फसलों की ही देर किसानों की आत्महत्या दर में भी वृद्धि है। ज्यादातर किसान आत्महत्या की घटनाएं नकदी फसल के क्षेत्रों में होती हैं। चाहे बात कर्नाटक, आन्धप्रदेश की हो या फिर महाराष्ट्र के विदर्भ इलाके की। मध्यप्रदेश में भी अब किसानों की आत्महत्याओं की खबरें यदा कदा आने लगीं हैं। एक जानकारी के मुताबिक पिछले साल तक मध्यप्रदेश में 1287 किसानों ने आत्महत्याएं की हैं। केवल सस्ती दरों पर ऋण उपलब्ध करा देने से इस समस्या का समाधान नहीं तलाश जा सकता जिसकी कोशिश प्रणव मुखर्जी कर रहे हैं।
उल्लेखनीय है कि सरकार का बजट हमेशा कार्पोरेट को बढ़ावा देने वाला होता है। सरकार ने खेती के मॉडल कानून बनाया है। इसमें प्रमुख रूप से खेती के कार्पोरेट के हाथों में जाने के रास्ते दिखाई देते हैं। मॉडल कानून के मुताबिक प्रदेश सरकारें भी मण्डी कानून में बदलाव कर रही है जिससे संविदा खेती आदि को बढ़ावा दिया जा सके। पिछले पांच साल में इसकी एक झलक आसानी से देखी जा सकती है। विरोधाभाष ये भी है कि एक तरफ रोजगार गारण्टी योजना के राशि बढ़ाई जा रही है दूसरी तरफ स्थाई रोजगार पैदा करने के लिए जरूरी खेती के वास्तविक विकास की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। कार्पोरेट खेती के चलते मजदूरों के रोजगार की सम्भावनाएं खेती में खत्म होती जा रही है। और इसके वगैर स्थाई रोजगार की बहुत सम्भावनाएं नहीं की जा सकती। खेती का असल में विकास करना है तो बजट को किसानों के हित में हाना ही चाहिए। जो असल में नहीं है।

शिवनारायण गौर


हर साल सरकार बजट बनाती है किसानों को बेचारा बनाने की कोशिश की जाती है परन्‍तु असल में किसानों के विकास की वास्‍तिवक योजनाएं नहीं बनती। इस दिशा में प्रयास किया जाना चाहिए। खेत खलियान की ओर से शिवनारायण गौर

Tuesday, October 21, 2008

प्लास्टिक के तालाब: कृषि पर नया खतरा

केन्द्र सरकार महाराष्ट्र के सूखा-पीड़ित इलाकों के लिए एक नई विषैली योजना लेकर आई है जिसके अंतर्गत कपास उत्पादन वाले 16 जिलों के पन्द्रह सौ तालाबों का निर्माण और उनमें प्लास्टिक की चादरें बिछाकर पानी का जमीन में रिसाव रोककर समस्या सुलझाने की कोशिश की जानी है। ऐेसे तालाबों के निर्माण के लिए सौ प्रतिशत सब्सिडी की घोषणा भी की गई है। किन्तु सरकार सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता बढ़ाने का उत्तर औद्योगिक उत्पाद में ढूंढ रही है।
शुरुआती दौर में तो किसान समुदाय योजना के प्रति उदासीन था किन्तु जैसा कि ज्यादातर सरकारी नीतियों के साथ होता है, धीरे-धीरे इसे भी लोगों ने स्वीकार कर लिया। जैसे ही किसानों ने तालाब खोद लिए वैसे ही प्लास्टिक की चादरों की आपूर्ति करने वाली चुनिंदा कंपनियों ने इनकी कीमतों में 16 से 18 रुपए प्रति वर्ग मीटर की वृध्दि कर दी। इसके फलस्वरूप प्रति तालाब चादर की लागत में पचास से साठ हजार रुपयों की वृध्दि हो गई।
जिन किसानों को सब्सिडी के तहत अभी तक धन नहीं मिला है उन्हें डर है कि यह अतिरिक्त लागत उन्हें स्वयं ही वहन करना होगी। नाराज किसानों ने तालाबों की खुदाई भी रोक दी है। वाशिम जिले के कृषकों ने जिलाधीश को एक ज्ञापन सौंपकर मांग की है कि या तो सब्सिडी की राशि में वृध्दि की जाए अथवा कंपनियों को पूर्व घोषित मूल्य पर ही प्लास्टिक चादरों की आपूर्ति के निर्देश दिए जाएं।
अधिकारियों के पास अब स्थिति से निपटने के लिए अधिकारों की कमी का बहाना ही शेष बचा है। इस योजना को संचालित करने वाले राज्य उद्यानिकी मिशन ने बताया है कि उसने नाबार्ड को एक प्रस्ताव भेजा है, जिसमें सब्सिडी की राशि बढ़ोत्तरी की अनुशंसा की गई है।
खैर, यह तो हुआ सरकारी योजना के रवैये और चाल का हिस्सा किंतु एक महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि आखिर तालाबों में इस तरह से प्लास्टिक चादर बिछाने का औचित्य क्या है?
विदर्भ क्षेत्र में परम्परागत रूप से खेतीहर तालाब भू-जल भरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे है। सरकार तो विशाल आकार की संरचनाओं को ही प्रोत्साहित करती है जबकि यवतमाल के सावित्री ज्योति समाजकार्य महाविद्यालय के अविनाश शिर्के का कहना है कि पारंपरिक कृषि में खेतों में तालाब खुदवाने का एक मकसद भू-जलस्तर में वृध्दि करना भी है। पारम्परिक तकनीक में महज 200 वर्ग फीट क्षेत्रफल के दस फीट गहराई वाले छोटे तालाबों की श्रृख्ला हुआ करती थी। कम लागत की वजह से कृषक इन्हें खुद ही खुदवा लेते थे। इसकी लागत मात्र 5 से 10 हजार रुपए होती है।
नागपुर के गैर सरकारी संगठन युवा से जुड़े कृषि विशेषज्ञ नितिन माटे भी इस योजना के खिलाफ हैं। उनका कहना है कि प्लास्टिक चादरें बिछाने से दीर्घावधि में काई फायदा नहीं होगा। ज्यादा से ज्यादा यह एक फसल तक ही पानी का भंडारण कर पाएगी और चूंकि यह जलस्तर में बढ़ोत्तरी में भी मदद नहीं करती हैं। अत: इतनी ऊँची लागत भी तर्कसम्मत नहीं है।
वाशिम जिले में पारम्परिक जलस्रोतों के पुनरुध्दार के कार्य में लगे नीलेश हेड़ा भी इस विचार को अवैज्ञानिक करार देते हुए कहते हैं बड़े तालाबों में विशेषकर सूखे के दौरान वनस्पति की उपज में कमी की वजह से गाद भरने की प्रक्रिया तीव्र होती है। भले ही प्लास्टिक चादर की आयु पन्द्रह वर्ष होने के दावे किए जाएं, किंतु वास्तविकता है कि यह गाद हटाने के कार्य में ही फट जाएगी। वैसे भी रिसाव कम करने के लिए विदर्भ में किसान सिंचाई संरचनाओं में सदियों से काली मिट्टी का प्रयोग करते आ रहे हैं।
विदर्भ में पहले सफल खेतिहर तालाब प्रयोग के परिकल्पक गैर सरकारी संगठन पर्यावरण वाहिनी के योगेश अनेजा कहते हैं सरकार सामूहिकता के विचार को ठीक से समझ नहीं पाई है। इसमें हम छोटे तालाबों और जलस्रोतों के पुनरुध्दार और पौधारोपण पर ध्यान देते हैं। नागपुर के वालनि गांव में हमारे प्रयोग की वजह से पूरे क्षेत्र के जलस्तर में वृध्दि हुई है। यहां तक की विदर्भ के ताजा सूखे में भी गांव में फसल उत्पादन में कमी नहीं हुई।
प्लास्टिक चादर के प्रयोग से कृषकों की उद्योगों और तकनीक विशेषज्ञों पर निर्भरता हो जाएगी। क्योंकि इसके बिछाने से लेकर रखरखाव तक का कोई भी काम विशेषज्ञ के बगैर नहीं हो पाएगा।
वाशिम के गजानंद आंबेडकर जैसे आम किसान भी तकनीकी निर्भरता से असहज महसूस करते हुए कहते हैं हम सब्सिडी की वजह से तैयार हुए थे। किंतु ऐसा लगने लगा है कि अब स्थितियां बजाए किसान के उद्योगों के हित में निर्दिष्ट कर दी गई है।
अपर्णा पल्लवी


विकास के नाम पर तथाकथित प्रयास किस तरह लोगों के लिए घातक हैं इसका अच्छा-खासा नमूना है महाराष्ट्र की प्लास्टिक के तालाब की यह योजना। अपर्णा पल्लवी द्वारा लिखित यह आलेख सप्रेस/सीएसई, डाउन टू अर्थ फीचर्स द्वारा प्रसारित किया गया है। उम्मीद है यह चर्चा को आगे बढ़ाएगा। खेत खलियान की ओर से शिवनारायण गौर