खेत-खलियान पर आपका स्‍वागत है - शिवनारायण गौर, भोपाल, मध्‍यप्रदेश e-mail: shivnarayangour@gmail.com
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Monday, January 4, 2016

समर्थन मूल्य बढ़ाने और कम फीसदी ब्याज दर पर कर्ज की मांग

दिल्ली की खबर है कि वित्त मंत्री अरुण जेटली ने किसान प्रतिनिध‍ियों के साथ 4 जनवरी को दिल्ली में बैठक की। इस बैठक में किसान प्रतिनिधियों ने मांग रखी कि किसानों को 4 फीसदी ब्याज पर 5 लाख रुपए तक कर्ज दिया जाए। उन्होंने समर्थन मूल्य बढ़ाने और फसल बीमा योजना तथा स्थाई निर्यात नीति बनाने की भी मांग वित्त मंत्री के सामने रखी है। गौरतलब है कि अभी किसान 7% ब्याज पर 3 लाख तक ही कर्ज ले सकते हैं और यदि वे समय पर कर्ज चुका देते हैं तो उन्हें ब्याज में 3 % छूट मिलती है।

दो घंटे की इस बैठक के बाद कंसोर्टियम ऑफ इंडियन फार्मर्स एसोसिएशन (सिफा) के सेक्रेटरी जनरल बीडी रामी रेड्‍डी ने कहा, “किसानों की हालत बेहद खराब है। सरकार उचित कदम नहीं उठा रही। वहीं वित्त मंत्री ने कहा कि संकट के दौर से गुजर रहे कृषि क्षेत्र उबारने के लिए सरकार लगातार प्रयास कर रही है। हमने किसानों को फसल के लिए 4 फीसदी ब्याज पर 5 लाख रुपए तक कर्ज उपलब्ध कराने की मांग की है। किसान प्रतिनिध‍ियों ने सरकार को कृषि उपज की लागत में 50% मुनाफा जोड़कर समर्थन मूलय तय करने की भी सलाह दी है।  वित्त मंत्री अरुण जेटली ने प्रतिनिधियों से कहा कि कृषि क्षेत्र संकट के दौर से गुजर रहा है। इससे बाहर निकालने के लिए सरकार कृषि क्षेत्र को सबसे अधिक महत्व दे रही है।

किसान संगठन भारत कृषक समाज (बीकेएस) के चेयरमैन अजय वीर जाखड़ के मुताबिक सरकार को दो लाख रुपए तक कर्ज पाने वाले किसानों की संख्या बढ़ाकर दोगुनी करनी चाहिए और इसके लिए एक फीसदी ब्याज लेना चाहिए। सरकार को कृषि कर्ज पर ब्याज में दी जाने वाली छूट खत्म करनी चाहिए और छोटे किसानों को बैंकों से कर्ज उपलब्ध कराने में की पहल करनी चाहिए। फर्टिलाइजर उद्योग की संस्था एफएआई ने बैठक के दौरान कहा कि किसानों को सीधे यूरिया सब्सिडी ट्रांसफर करने की सुविधा शुरू होनी चाहिए। 50,000 करोड़ रुपए से ज्यादा बकाया के भुगतान के लिए अगले तीन साल तक बजट में अधिक राशि का आवंटन होना चाहिए। बैठक में सिफा, बीकेएस के अलावा नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड, फर्टिलाइजर को-ऑपरेटिव इफको, फर्टिलाइजर एसोसिएशन ऑफ इंडिया आदि संगठनों के प्रतिनिधियों और विशेषज्ञ शामिल हुए।

Jan 05, 2016

Wednesday, January 1, 2014

खेती में रोजगार



समय समय पर हुए तमाम अध्‍ययनों से दो बातें सामने आती रही हैं। एक तो है कि लोग खेती के ज़रिए अपनी आज़ीविका नहीं चला पा रहे हैं मसलन वे खेती छोड़ रहे हैं और दूसरा हर साल शहरों में बस्तियों की संख्‍या में इज़ाफा हो रहा है। यद्यपि इन दोनों तरह के अध्‍ययनों के बीच के सम्‍बन्‍ध को जानना थोड़ा मुश्किल हैं क्‍योंकि यह बात तो सामने आती है कि बस्तियों में रहने वाले लोगों का जीवन कैसे चल रहा है। उनके प्रमुख रोजगार क्‍या है इत्‍यादि। लेकिन इस बात को लेकर मुझे कोई अध्‍ययन नहीं दिखाई दिया जो यह बताए कि बस्तियों में आने वाले नए लोग कौन हैं ? वे शहर की इस मुश्किल जिन्‍दगी को कम से कम खुशी-खुशी तो स्‍वीकार नहीं ही कर सकते। यानी ये वे लोग हैं जो कि बस्तियों में आने से पहले अपने जीवन के संघर्षों से हारे हुए लोग हैं और विकल्‍प की तलाश में इस तरह के जटिल हालातों में हैं।
खैर खेती छोड़कर शहरी बस्तियों में आकर मज़दूरी करने वाली बात को हम सीधे तौर पर स्‍वीकार न भी करें तो भी इस बात से नहीं नकारा जा सकता है कि खेती पर संकट है। वर्तमान खेती-किसानी के विकल्‍प तलाशना फिलहाल किसानों की मजबूरी है। चूँकि खेती दरअसल केवल एक रोजगार ही नहीं है बल्कि वह एक जीवनशैली है। और जीवनशैली होने के कारण खेती से बाहर जाना किसानों के लिए खुशी की बात नहीं होती। पर यदि हम खेती पर पड़ते दबाबों को देखें तो असल में खेती से बाहर जाना ही खेती को सशक्‍त करने का एक तरीका हो सकता है। हम जानते हैं कि खेती का रकबा आए दिन कम हो रहा है और खेती पर दबाब लगातार बढ़ता जा रहा है। पर असल में खेती को छोड़कर रोजगार के अच्‍छे अवसर उपलब्‍ध कराने की महत्‍ती आवश्‍यकता है जिस पर अभी कोई खास काम नहीं हो पा रहा है। मैं एक खबर पड़ रहा था जिसमें एक अध्‍ययन के हवाले से कहा गया है कि 2014 में खेतीहर व्‍यवसाय में रोजगार के ज्‍यादा अवसर उपलब्‍ध होंगे। हालांकि इस बात को समझना भी जरूरी है कि ये खेतीहर व्‍यवसाय किस तरह के होंगे और क्‍या वे खेती-किसानी से जुड़े तबके को रोजगार के अवसर मुहैया करा पाने में समर्थ होंगे ?  खैर जो भी हमें शायद इस दिशा में सोचने की इस समय आवश्‍यकता है कि खेती के इतर रोजगार के मौके अधिक से अधिक कैसे उपलब्‍ध कराए जा सकते हैं और वह भी बिना शहरी बस्तियों में रहने वाले लोगों की संख्‍या में इजाफा किए
आप सभी को नए साल की शुभकामनाएं। 
शिवनारायण गौर

Tuesday, December 4, 2007

कर्ज का दलदल

सुरेंद्र कुमार शर्मा
भूरिया ने पिछले दिनों लोकसभा के एक सवाल के जवाब में बताया कि देश में बारह करोड़ तिहत्तर लाख किसान और दस करोड़ सड़सठ लाख खेतिहर श्रमिक हैं।
केन्द्रीय कृषि राज्यमंत्री कांति लाल दुर्भाग्य से देश में लगभग आधे यानी 48.6 प्रतिशत किसान परिवार कर्ज के बोझ से दबे हुए हैं। राज्यवार आंकड़ों को देखें तो आंध्र प्रदेश में सर्वाधिक बयासी फीसदी किसान परिवार कर्जदार हैं। इसके बाद तमिलनाडु में 75.5, पंजाब में 65.4, कर्नाटक में 61.6, महाराष्ट्र में 64.4, राजस्थान में 52, बिहार में 51.6, उत्तरप्रदेश में 51 और मध्यप्रदो में 50 फीसद किसान परिवार कर्ज के बोझ तले करा रहे हैं।
पिछले साल डेढ़ साल में किसानों की खुदकुशी के इतने ज्यादा मामले सामने आए हैं कि दिल दहल उठता है। हैरत का विषय है कि किसानों के मसीहा कहे जाने वाले पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा के गृह जिले हासन में किसानों की खुदकुशी के सर्वाधिक मामले सामने आए। केन्द्रीय कृषि मंत्रालय के आंकड़ों को ही लें तो कर्नाटक में वर्ष 2006-2007 में तीन सौ उनतालीस मामले हासन जिले के हैं।
महाराष्ट्र के विदर्भ इलाकों में जब कर्ज में बेतरह फंसे किसानों ने निराशा हताशा में आकर ताबड़तोड़ आत्महत्याएं कीं तो इससे चिंतित केन्द्र सरकार ने पिछले वर्ष जुलाई में 3750 अरब रुपए से ज्यादा के पैकेज की घोषणा की, मगर उसक ेबाद से तकरीबन सोलह सौ किसान खुदकुशी कर चुके हैं। विदर्भ के ग्यारह जिलों में लगभग सत्रह लाख किसान हैं जो मुख्य रूप से कपास की खेती पर आश्रित हैं, लेकिन सरकार की वसंगति र्पूण् कपास नीतियों के चलते उनकी हालत बिगड़ती जा रही है।
ऐसा नहीं है कि केवल दक्षिणी और पश्चिमी राज्यों में कर्ज में डूबे किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं। देश के मध्य क्षेत्र के सबसे महत्वपूर्ण प्रांत मध्यप्रदेश के विभिन्न जिलों में भी पिछले एक साल के भीतर दर्जन भर किसाने ने सल्फास खाकर या दूसरे तरीके अपना कर मौत को गले लगा लिया। मालवा क्षेत्र के छह जिलों में झाबुआ, धार, खरगौन, बड़वानी, खण्डवा और रतलाम के किसानों ने तो कुछ समय पूर्व अपने दर्द को लेकर न सिर्फ भोपाल में दस्तक दी थी, बल्कि तात्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम को पत्र लिखकर आत्महत्या करने की अनुमति तक मांगी थी।
राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर ने हर जिले में गोकुल ग्राम योजना क्रियान्वित की थी, जिसके तहत केवल शहडोल जिले में ढाई सौ किसानों को पांच सौ से ज्यादा हरियाणवी नस्ल की गाएं वितरित की गई। गोकुल ग्रामों में वितरित इन गायों में लगभग नब्बे फीसद असमय काल के गाल में समा गईं। दो गायों की यूनिट मानकर प्रत्येक हितग्राही को स्वर्ण जयंती ग्रामीण स्वरोजगार योजना के तहत तैंतीस हजार का कर्ज स्वीकृत कराया गया। इसमें पन्द्रह हजार रुपए का अनुदान दिया गया, तब भी प्रत्येक हितग्राही बैंक का अठारह हजार रुपए का कर्जदार बन गया। असल में पिछले दो वर्षों में किसानों की माली हालत सुधारने के बजाय और बिगड़ती चली गई। कर्ज की राशि दिनोंदिन बढ़ती जा रही है और यही स्थित रही तो किसानों को जमीन जायदाद भी बचने पड़ सकती हैं। इस प्रकार योजना तो विफल हुई, किसानों को भी जिंदगी भर के लिए कर्जदार बना दिया।
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान स्वीकार करते हैं कि राज्य में किसानों की स्थिति अच्छी नहीं है। इसीलिए उन्होंने ऋण वसूली पर रोक लगा दी है। इसके बावजूद ऋण अदायगी न करने वाले किसानों के टै्रक्टर आदि कुर्क करने के समजाचार मिले हैं।
एक तरफ देश के तकरीबन आधे किसान कर्ज के बोझ तले इस कदर दबे हैं कि कोई रास्ता न देख आत्मघाती कदम उठा रहे हैं, वहीं देश में शहरीकरण के चलते कृषि भूमि कम होती जा रही है। वर्ष 2001-2002 में जहां कृषि योग्य भूमि अठारह करोड़ इकतीस लाख चालीस हजार हेक्टेयर थी, वहीं वर्ष 2005-2006 में घट कर अठारह करोड़ पच्चीस लाख सत्तर हजार रह गई। अब तो कृषि योग्य भूमि को बहुराष्ट्रीय कंपनियों को देने की साजिस भी रची जा रही है। नंदीग्राम और सिंगूर में भीषण रक्तपात के बाद सरकार ने किसानों की भूमि जबरिया न लेने और उन्हें मुआवजे के रूप में उचित धनराशि देने का निश्चय किया था। पर इस आशय का प्रस्ताव कैबिनेट में नहीं आ सका।
बहरहाल, कृषि प्रधान देश भरत में कृषि के धंधे में लगे कृषकों की ऐसी दुर्दशा हमारे विकास और आर्थिक समृध्दि के दावों की पोल खोलती है। जिस देश के सत्तर फीसद लोग खेती पर आश्रित हों, अन्नदाता कहे जाने वाले आधे किसान खुद कर्ज के दलदल में फंसे हुए हों, दो जून की रोटी के लिए मोहताज और निराश होकर आत्महत्या कर रहे हों, उस देश की भावी तस्वीर कैसी होगी, इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। ,
जनसत्ता 30 नवम्बर, 2007