खेत-खलियान पर आपका स्‍वागत है - शिवनारायण गौर, भोपाल, मध्‍यप्रदेश e-mail: shivnarayangour@gmail.com
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Tuesday, January 5, 2016

खर्चीली खेती के खतरे


नए साल के तीसरे ही दिन मध्य प्रदेश के सागर जिले के एक गांव के एक किसान के आत्महत्या करने की कोश‍िश की खबर एक अँग्रेज़ी अखबार के पहले पन्ने पर दिखी। ढाई एकड़ की अपनी जमीन पर खेती करने के लिए इस किसान ने महज तीस हजार रुपयों का कर्ज लिया था। फसल पैदा नहीं होने के कारण उसे यह कठोर कदम उठाने की ओर अग्रसर होना पड़ा। यह खबर दुखद है।
स्कूल की पाठ्यपुस्तकों में कभी पढ़ते थे कि खेती मानसून का जुआ है। कई बार यह सवाल भी परीक्षा में आता था कि खेती मानसून का जुआ है इस बात की व्याख्या कीजिए। इस सवाल की व्याख्या में केवल इस बात को लिखते थे कि यदि मौसम साथ न दे तो खेती में उपज पैदा नहीं होगी। इसी प्रमुख बात के इर्द-गिर्द अपनी बात कही जाती थी। लेकिन यह मानसून का जुआ अब वास्तव कई तरह से मुश्कि‍ल पैदा करने वाला हो गया है। आज किसान की हालात यह हो गई है कि पैदावार नहीं होने पर उसे आत्महत्या जैसे कदम भी उठाने के लिए मज़बूर होना पड़ रहा है।
खेती आज बहुत ही खर्चीला धन्धा हो गई है। जमीन में लगातार उर्वरक और कीटनाशक के इस्तेमाल के चलते जमीन की उर्वरा शक्ति‍ लगातार कम होते जा रही है। और ऐसी स्थिति में उसके सामने एक ही विकल्प बचता है कि लगातार इन तत्वों की मात्रा बढ़ाते जाए। यानी खेती पर और और खर्च करते जाए। ऐसी स्थ‍िति में यदि किसी भी प्राकृतिक कारण से यदि पैदावार नहीं हो पाती है तो फिर किसान का हाल क्या होगा इसे समझना बहुत कठिन है।
इस खर्चीली खेती से किसी तरह से हमें मुक्ति‍ का रास्ता ढूँढना होगा। यह काम केवल सरकार अकेले के बस का नहीं है। इसमें किसान और सरकार तथा समाज सभी को एक साथ आकर रास्ते तलाशना पड़ेंगे।

श‍िवनारायण गौर,
भोपाल 5 जनवरी, 2016

Friday, January 1, 2016

किसान की गर‍िमा

खेती की बात आते ही हमारे मन में एक गांव की तस्वीर बनने लगती है। बैलगाड़ी, लहलहाती फसल नज़र आने लगती है। एक तथाकथ‍ित सभ्य समाज खेतीहर लोगों को थोड़ा फर्क किस्म से देखने लगता है। मसलन एक कम पढ़ा-लिखा, सिर पर एक गमछा बांधा हुए व्यक्ति‍ की अवधारणा बना लेता है। दिक्कत यह है कि उसे बराबरी का दर्जा दिया जा सके, ऐसी छबि बिरले ही आती होगी। 

कभी इस बात का आंकलन भी नहीं होता कि जिस सिर पर गमछा या अँगोछा ओड़े व्यक्त‍ि की अवधारणा आपके जेहन में बन रही है, हमारा जीवन उसकी बदौलत ही चल रहा है। हमारे हर खाने-पीने, ओड़ने-बिछाने की सामग्री उसके सौजन्य से ही प्राप्त हो रही है। यानी मसला है कि उसकी गरिमा के बारे में हम लगभग नहीं ही सोचते हैं। एक तबका नए साल का स्वागत करने में खूब खर्चा कर रहा है। बड़ी बड़ी होटलों में पार्टी चल रही हो जिसके एक दिन पार्टी में एक किसान के परिवार के दो-तीन माह या उससे भी ज्यादा का गुज़ारा चल सकता था। वहीं यदि हम देखें तो इस समय वही किसान खेती के संघर्षपूर्ण काम में जुटा है। और यदि वह न जुटा हो तो केवल पैसे से जीवन का संचालन कर पाना सम्भव ही नहीं है। 

क्या नए साल के इस जश्न के साथ हम उस मेहनतकश को कम से कम गरिमा के साथ स्वीकार कर सकेंगे। यदि हमारी नज़र में उसका सम्मान जागता है तो इतना भी पर्याप्त है, क्योंकि इस सम्मान के चलते हम उसे अपने जीवन में जगह दे पाएंगे। 

तो नए साल 2016 की आप सभी को ढेर सारी शुभकामनाएं !!!

श‍िवनारायण गौर,
भोपाल 1 जनवरी, 2016

Wednesday, October 1, 2014

बगैर जुते खेत ठंडक पैदा करते हैं



प्रोसीडिंग्‍स ऑफ नेशनल एकेडमी आफसाइन्‍सेज़ में प्रकाशित एक शोध पत्र में बताया गया है कि यदि खेत में जुताई न की जाए तो फसल क्षेत्र के आसपास के तापमान में 2 डिग्री सेल्सियस तक की कमी आती है। एक प्रकार की प्राकृतिक खेती में बीज बोने से पहले खेत की जुताई नहीं की जाती।
यह अध्‍ययन स्विस फेडरल इंस्‍टीट्यूटआफ टेक्‍नॉजॉली की जलवायु विशेषज्ञ सोनिया सेनेविरत्‍ने और उनके साथियों ने फ्रांस के दक्षिण-पूर्व में स्थित प्रोवेंस क्षेत्र में किया है।
आमातोर पर गैर-जुताई खेती इसलिए अपनाई जाती है ताकि भूक्षरण कम से कम हो। जब खेत में जुताई नहीं की जाती और पिछली फसल के अवशेषों को वहीं छोड़ दिया जाता है तो मिट्टी में नमी बनी रहती है। मगर पानी के वाष्‍पन की वजह से मिट्टी का तापमान भी कम होता है। मगर हाल के अध्‍ययन से पता चलता है कि बिना जुते खेतों के आसपास का तापमान अपेक्षाकृत कम रहता है।
सेनेविरत्‍ने का कहना है कि बिना जुते खेतों का तापमान कम रहने का कारण यह है कि ऐसे खेत धूप को ज्‍यादा मात्रा में परावर्तित कर देते हैं। इसे एल्‍बीडो प्रभाव कहते हैं। उन्‍होंने पाया कि गर्मी के महीनों में बगैर जुते खेत सामान्‍य खेतों की अपेक्षा 50 प्रतिशत ज्‍यादा परावर्तक होते हैं।
पहले किए गए अध्‍ययनों में पता चला था कि यह ठंडक बहुत अधिक नहीं होती है। मगर सेनेविरत्‍ने और उनके साथियों के अध्‍ययन से पता चलता है कि ठंडक का असर गर्मियों के महीनों में और वह भी सबसे गर्म दिनों में सबसे ज्‍यादा होता है। उन्‍होंने पाया कि साल भर का औसत देखेंगे तो बिना जुते खेतों का तापमान अन्‍य खेतों की अपेक्षा मात्र 1 डिग्री सेल्सियस कम रहता है मगर यदि कर्मी के सबसे कर्म दिनों का तापमान 1.6 डिग्री सेल्सियस तक कम रहता है। शोधकर्ताओं के मुताबिक दक्षिणी यूरोप में तो 2 डिग्री सेल्सियस तक का फर्क पड़ सकता है।
शोधकर्ताओं के मुताबिक होता यह है कि आम दिनों में धूप के कारण तापमान बढ़ता है और मिट्टी से पानी के वाष्‍पन की वजह से कम होता है। चूँकि जुते हुए खेतों में वाष्‍पन अधिक होता है इसलिए दोनों तरह के खेतों में तापमान में अंतर ज्‍यादा नहीं होता। मगर बहुत गर्म ‍दिनों में धूप और उसके परावर्तन काअसर हावी हो जात है और इन परिस्‍थतियों में बिना जुते खेत जयादा धूप को परावर्तित करके अपेक्षाकृत ठंडे बने रहते हैं।
इस अध्‍ययन से तो लगता है कि जितने बड़े क्षेत्र में गैर-जुताई खेती की जाएगी, तापमान को कम रखने में उतनी ही मदद मिलेगी। और नमी बनाए रखने व भूमि-क्षरण रोकने जैसे अन्‍य फायदे तो हैं ही। (स्रोत फीचर्स से)

Wednesday, January 1, 2014

खेती में रोजगार



समय समय पर हुए तमाम अध्‍ययनों से दो बातें सामने आती रही हैं। एक तो है कि लोग खेती के ज़रिए अपनी आज़ीविका नहीं चला पा रहे हैं मसलन वे खेती छोड़ रहे हैं और दूसरा हर साल शहरों में बस्तियों की संख्‍या में इज़ाफा हो रहा है। यद्यपि इन दोनों तरह के अध्‍ययनों के बीच के सम्‍बन्‍ध को जानना थोड़ा मुश्किल हैं क्‍योंकि यह बात तो सामने आती है कि बस्तियों में रहने वाले लोगों का जीवन कैसे चल रहा है। उनके प्रमुख रोजगार क्‍या है इत्‍यादि। लेकिन इस बात को लेकर मुझे कोई अध्‍ययन नहीं दिखाई दिया जो यह बताए कि बस्तियों में आने वाले नए लोग कौन हैं ? वे शहर की इस मुश्किल जिन्‍दगी को कम से कम खुशी-खुशी तो स्‍वीकार नहीं ही कर सकते। यानी ये वे लोग हैं जो कि बस्तियों में आने से पहले अपने जीवन के संघर्षों से हारे हुए लोग हैं और विकल्‍प की तलाश में इस तरह के जटिल हालातों में हैं।
खैर खेती छोड़कर शहरी बस्तियों में आकर मज़दूरी करने वाली बात को हम सीधे तौर पर स्‍वीकार न भी करें तो भी इस बात से नहीं नकारा जा सकता है कि खेती पर संकट है। वर्तमान खेती-किसानी के विकल्‍प तलाशना फिलहाल किसानों की मजबूरी है। चूँकि खेती दरअसल केवल एक रोजगार ही नहीं है बल्कि वह एक जीवनशैली है। और जीवनशैली होने के कारण खेती से बाहर जाना किसानों के लिए खुशी की बात नहीं होती। पर यदि हम खेती पर पड़ते दबाबों को देखें तो असल में खेती से बाहर जाना ही खेती को सशक्‍त करने का एक तरीका हो सकता है। हम जानते हैं कि खेती का रकबा आए दिन कम हो रहा है और खेती पर दबाब लगातार बढ़ता जा रहा है। पर असल में खेती को छोड़कर रोजगार के अच्‍छे अवसर उपलब्‍ध कराने की महत्‍ती आवश्‍यकता है जिस पर अभी कोई खास काम नहीं हो पा रहा है। मैं एक खबर पड़ रहा था जिसमें एक अध्‍ययन के हवाले से कहा गया है कि 2014 में खेतीहर व्‍यवसाय में रोजगार के ज्‍यादा अवसर उपलब्‍ध होंगे। हालांकि इस बात को समझना भी जरूरी है कि ये खेतीहर व्‍यवसाय किस तरह के होंगे और क्‍या वे खेती-किसानी से जुड़े तबके को रोजगार के अवसर मुहैया करा पाने में समर्थ होंगे ?  खैर जो भी हमें शायद इस दिशा में सोचने की इस समय आवश्‍यकता है कि खेती के इतर रोजगार के मौके अधिक से अधिक कैसे उपलब्‍ध कराए जा सकते हैं और वह भी बिना शहरी बस्तियों में रहने वाले लोगों की संख्‍या में इजाफा किए
आप सभी को नए साल की शुभकामनाएं। 
शिवनारायण गौर

Sunday, April 20, 2008

सबसे बड़े कृषि संकट का दौर - पी. साईनाथ

वरिष्ठ पत्रकार पी. साईंनाथ ने इस दौर में पत्रकारिता की प्रासंगिकता का सवाल खड़ा करते हुए गत 17 अप्रैल को दिल्ली में आयोजित एक व्याख्यान में कहा कि हम इस वक्त सबसे बड़े कृषि संकट से गुजर रहे हैं। 80 लाख लोगों ने पिछले 10 वर्षों में खेती-किसानी छोड़ी है। ये लोग आखिर कहां गए, इस पर हमने कोई खबर की? विस्थापन की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि इस शहर दिल्ली में एक से दो लाख आदिवासी लड़कियां आई हैं घरेलू नौकरानी का काम करने के लिए। पिछले छह महीनों में जो खाद्य संकट खड़ा हुआ है वैसा पहले कभी नहीं हुआ। नौ साल में डेढ़ लाख से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की है। साईनाथ यहां चिन्मय मिशन के सभागार में मीडिया एंड एग्रेरियन क्राईसेस विषय यपर एडिटस्र गिल्ड ऑफ इंडिया की ओर से आयोजित राजेन्द्र माथुर स्मृति व्याख्यान दे रहे थे। साईनाथ ने कहा कि इस वक्त असमानता सबसे तेजी से बढ़ी है। पिछले 15 साल म4ें अमीर और गरीब की खाई नाटकीय तौर पर चौड़ी हुई है। देश में कुपोषण के शिकार बच्चें की स्थिति को भी उन्होंने गंभीर बताते हुए कहा कि इस मामले में हमाराा देश नीचे से 10 वें नंबर पर है। कई और मामलों में देश में असमानता का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि इस मामले में जिन देशों में आर्थिक विकास दर नौ प्रतिशत नहीं है और जो आईटी क्षेत्र में महाशक्ति होने का दावा नहीं कर रहे हैं उनकी स्थिति हमसे बेहतर है। मोटे तौर पर मीडिया के रवैये का उल्लेख करते ेहुए उन्होंने कहा कि आज मीडिया का कारपोरेट अपहरण हो गया है। इस दौर में मीडिया की नैतिक दुनिया काफी बदल गई है। इन सारी स्थितियों के बीच पत्रकारों की बीट को लेकर कटाक्ष करते हुए उन्होंने कहा कि एक अखबार में दस-पन्द्रह लोग मार्केट कवर कर रहे हैं, फैशन डिजाइन और ग्लैमर संवाददाता हैं, लेकिन ग्रामीण या शहरी गरीबी को कवर करने वाला कोई पूर्णकालिक संवाददाता नहीं है। श्रमिकों और उनकी समस्याओं की कवरेज के लिए कोई संवाददाता नहीं है। इसका मतलब है कि जो 75 प्रतिशत जनता खबर नहीं उसके बारे में बात करने में हमारी कोई रुचि नहीं है। सामाजिक क्षेत्र की समस्याएं जिस अनुपात में बढ़ रही हैं, इस क्षेत्र को कवर करने वाले संवाददाताओं की बीट उस अनुपात में घट रही है। उन्होंने गरीबी और ग्रामीण क्ष्ज्ञेत्र में खबरों की अपार संभावनाएं बताते हुए कहा कि उस वास्तविकता को कवर करना स्टॉक मार्केट से ज्यादा प्रासंगिक है। उन्होंने कहा पत्रकारिता दो तरह की होती है एक पत्रकारिता पत्रकारिता होती और दूसरी स्टेनोग्राफी होती हैं आज हम सामर्थ्यवानों की स्टेनोग्राफी कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि ग्रामीण भारत में खबर ढूंढने की जरूरत नहीं है, खबर आपको ढूंढती है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे केन्द्रीय पंचायती राज मंत्री मणिशंकर अय्यर ने कहा कि मीडिया ने जिस एक और चीज की अनदेखी की है वह पंचायती राज संस्थाओं की है। हमारे पास वेसे विकल्प नहीं हैं जैसे विकसित लोकतंत्र वाले देशों में हैं, यह बताते हुए उन्होंने कहा कि पंचायती राज संस्थाओं की मजबूती से समूचे भारतीय समाज में बदलाव आएगा। कार्यक्रम की शुरुआत में एडीटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के अध्यक्ष आलोक मेहता ने राजेन्द्र माथुर की पत्रकारिता का स्मरण करते हुए कहा कि उनके लेखन की छाप समूची नई पीढ़ी पर रही है। खेती के संकट की चर्चा करते हुए उन्होंने माना कि किसानों का और कृषि का संकट हमारे पूरे समाज का संकट है।