Tuesday, January 19, 2016
ब्रिटेन के भोजन का ग्रीनहाउस प्रभाव
Friday, January 15, 2016
भूजल भण्डार की स्थिति
Tuesday, October 21, 2008
प्लास्टिक के तालाब: कृषि पर नया खतरा
शुरुआती दौर में तो किसान समुदाय योजना के प्रति उदासीन था किन्तु जैसा कि ज्यादातर सरकारी नीतियों के साथ होता है, धीरे-धीरे इसे भी लोगों ने स्वीकार कर लिया। जैसे ही किसानों ने तालाब खोद लिए वैसे ही प्लास्टिक की चादरों की आपूर्ति करने वाली चुनिंदा कंपनियों ने इनकी कीमतों में 16 से 18 रुपए प्रति वर्ग मीटर की वृध्दि कर दी। इसके फलस्वरूप प्रति तालाब चादर की लागत में पचास से साठ हजार रुपयों की वृध्दि हो गई।
जिन किसानों को सब्सिडी के तहत अभी तक धन नहीं मिला है उन्हें डर है कि यह अतिरिक्त लागत उन्हें स्वयं ही वहन करना होगी। नाराज किसानों ने तालाबों की खुदाई भी रोक दी है। वाशिम जिले के कृषकों ने जिलाधीश को एक ज्ञापन सौंपकर मांग की है कि या तो सब्सिडी की राशि में वृध्दि की जाए अथवा कंपनियों को पूर्व घोषित मूल्य पर ही प्लास्टिक चादरों की आपूर्ति के निर्देश दिए जाएं।
अधिकारियों के पास अब स्थिति से निपटने के लिए अधिकारों की कमी का बहाना ही शेष बचा है। इस योजना को संचालित करने वाले राज्य उद्यानिकी मिशन ने बताया है कि उसने नाबार्ड को एक प्रस्ताव भेजा है, जिसमें सब्सिडी की राशि बढ़ोत्तरी की अनुशंसा की गई है।
खैर, यह तो हुआ सरकारी योजना के रवैये और चाल का हिस्सा किंतु एक महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि आखिर तालाबों में इस तरह से प्लास्टिक चादर बिछाने का औचित्य क्या है?
विदर्भ क्षेत्र में परम्परागत रूप से खेतीहर तालाब भू-जल भरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे है। सरकार तो विशाल आकार की संरचनाओं को ही प्रोत्साहित करती है जबकि यवतमाल के सावित्री ज्योति समाजकार्य महाविद्यालय के अविनाश शिर्के का कहना है कि पारंपरिक कृषि में खेतों में तालाब खुदवाने का एक मकसद भू-जलस्तर में वृध्दि करना भी है। पारम्परिक तकनीक में महज 200 वर्ग फीट क्षेत्रफल के दस फीट गहराई वाले छोटे तालाबों की श्रृख्ला हुआ करती थी। कम लागत की वजह से कृषक इन्हें खुद ही खुदवा लेते थे। इसकी लागत मात्र 5 से 10 हजार रुपए होती है।
नागपुर के गैर सरकारी संगठन युवा से जुड़े कृषि विशेषज्ञ नितिन माटे भी इस योजना के खिलाफ हैं। उनका कहना है कि प्लास्टिक चादरें बिछाने से दीर्घावधि में काई फायदा नहीं होगा। ज्यादा से ज्यादा यह एक फसल तक ही पानी का भंडारण कर पाएगी और चूंकि यह जलस्तर में बढ़ोत्तरी में भी मदद नहीं करती हैं। अत: इतनी ऊँची लागत भी तर्कसम्मत नहीं है।
वाशिम जिले में पारम्परिक जलस्रोतों के पुनरुध्दार के कार्य में लगे नीलेश हेड़ा भी इस विचार को अवैज्ञानिक करार देते हुए कहते हैं बड़े तालाबों में विशेषकर सूखे के दौरान वनस्पति की उपज में कमी की वजह से गाद भरने की प्रक्रिया तीव्र होती है। भले ही प्लास्टिक चादर की आयु पन्द्रह वर्ष होने के दावे किए जाएं, किंतु वास्तविकता है कि यह गाद हटाने के कार्य में ही फट जाएगी। वैसे भी रिसाव कम करने के लिए विदर्भ में किसान सिंचाई संरचनाओं में सदियों से काली मिट्टी का प्रयोग करते आ रहे हैं।
विदर्भ में पहले सफल खेतिहर तालाब प्रयोग के परिकल्पक गैर सरकारी संगठन पर्यावरण वाहिनी के योगेश अनेजा कहते हैं सरकार सामूहिकता के विचार को ठीक से समझ नहीं पाई है। इसमें हम छोटे तालाबों और जलस्रोतों के पुनरुध्दार और पौधारोपण पर ध्यान देते हैं। नागपुर के वालनि गांव में हमारे प्रयोग की वजह से पूरे क्षेत्र के जलस्तर में वृध्दि हुई है। यहां तक की विदर्भ के ताजा सूखे में भी गांव में फसल उत्पादन में कमी नहीं हुई।
प्लास्टिक चादर के प्रयोग से कृषकों की उद्योगों और तकनीक विशेषज्ञों पर निर्भरता हो जाएगी। क्योंकि इसके बिछाने से लेकर रखरखाव तक का कोई भी काम विशेषज्ञ के बगैर नहीं हो पाएगा।
वाशिम के गजानंद आंबेडकर जैसे आम किसान भी तकनीकी निर्भरता से असहज महसूस करते हुए कहते हैं हम सब्सिडी की वजह से तैयार हुए थे। किंतु ऐसा लगने लगा है कि अब स्थितियां बजाए किसान के उद्योगों के हित में निर्दिष्ट कर दी गई है।
Friday, September 26, 2008
खतरनाक है गाजर घास
एलर्जी की समस्या पैदा करने वाली और जहरीली गाजर घास के तेजी से हो रहे फैलाव पर चिंता जाहिर करते हुए वैज्ञानिकों ने इसे पर्यावरण और जैव विविधता के लिए उभरता बड़ा खतरा बताया है। उड़ीसा यूनिवर्सिटी आफ एग्रीकल्चर व टेक्नॉलोजी के वरिष्ठ वैज्ञानिक सुधांशु शेखर मिश्र कहते है कि आमतौर पर गाजर घास कहलाने वाली इस वनस्पति का वैज्ञानिक नाम पार्थेनियम हिस्टेरोफोरस है। इसके परागकणों से एग्जीमा, अस्थमा और त्वचा की कई बीमारियां होती है।
वे कहते है कि यह एक जहरीली वनस्पति है जो एलर्जी पैदा करती है। इससे कालाजार की समस्या तक हो सकती है। मुख्य रूप से अमरीका में पाई जाने वाली गाजर घास देश में सबसे पहले 1956 में पुणे मेें देखी गई थी। धीरे धीरे यह देश के हर हिस्से में फैल गईं। आल इंडिया को:आर्डिनेटेड रिसर्च प्रोग्राम से जुड़े वैज्ञानिकों ने कहा कि गाजर घास का तेजी से फैलाव पर्यावरण और जैवविविधता के लिए खतरा बन गया है। कई फसलों के अंकुरण और विकास पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
गाजर घास के परागकणों की वजह से टमाटर, बैंगन, मिर्च जैसी सब्जियों के फूल गिर जाते हैं। दालों के फूलों पर गिरकर गाजर घास के परागकण एक ऐसा रसायन उत्सर्जित करते हैं जिससे पौधे की जड़ों में नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाले बैक्टीरिया निष्प्रभावी हो जाते हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक न केवल मनुष्यों में बल्कि गाजर घास, गाय और बकरी जैसे पशुओं में भी त्वचा की समस्या पैदा करती है। जब जानवर इसे खाते हैं तो उनके दूध का स्वाद कसैला हो जाता है। अगर लंबे समय तक ऐसे दूध का सेवन किया जाए तो मौत हो सकती है। गाजर घास के पौधे की लंबाई 1 से 1.5 मीटर तक होती है। इसकी पत्तियां गाजर की पत्तियों के जैसी होती हैं। हरेक पत्ती करीब 10 हजार बीज पैदा करती है। गाजर घास हर तरह की भूमि और जलवायु में उग सकती है। करीब 25 से 30 डिग्री सेल्सियस तापमान पर इसके बीजों का शीघ्रता से अंकुरण हो जाता है। (जनसत्ता 18 सितम्बर, 2008 से साभार)
Thursday, September 11, 2008
संकट की खेती
पिछले तीन दशकों के दौरान अंतरराष्ट्रीय वित्त संस्थाओं की ओर से विदेशी कर्ज वापसी की बड़ी किस्तें जमा करने और जरूरी घरेलू खर्च को कम करने के लिए फिलीपीन पर बहुत दबाव डाला गया। कृषि की प्रगति और किसानों की सहायता के अनेक सरकारी कार्यक्रम ठप्प हो गए या उनमें काफी कटौती हुई। किसानों की कठिनाइयां बढ़ गईं और पैदावार कम होने लगी। इसी दौरान विश्व व्यापार संगठन के नियमों के अंतर्गत फिलीपीन आयातों से संख्यात्मक प्रतिबंध हटाने और आयात शुल्क कम करने के लिए दबाव बनाया गया। इस कारण चावल के अतिरिक्त मक्के की खेती, सब्जी उत्पादन, मुर्गी पालन आदि पर भी प्रतिकूल असर पड़ा।
दूसरी ओर चीन ने चावल, गेहूं मक्का जैसे मुख्य खाद्यान्नों में आत्मनिर्भरता बनाए रखी है। लेकिन अपने यहां भोजन की सबसे महत्वपूर्ण फसल सोयाबीन के मामले में वह मार खा गया और आयात पर उसकी निर्भरता काफी बढ़ गईं। विश्व व्यापार संगठन से हुई वार्ता के दौरान चीन सोयाबीन पर आयात शुल्क तीन प्रतिशत तक कम करने को राजी हो गया। इसके बाद वह सोयाबीन का सबसे बड़ा आयातक बन गया। इसका चीन के सोयाबीन किसानों पर बहुत प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।
दूसरी समस्या यह है कि खाद्याान्न और अन्य कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए कई स्थानों पर रासायनिक खाद और कीटनाशकों को अंधाधुंध उपयोग हुआ है जो आगे चलकर समस्याएं पैदा करेगा। सिंचाई की कुछ बड़ी परियोजनाएं भी पर्यावरण के लिए समस्याएं बढ़ाने वाली हैं। तेज औघेगीकरण और शहरीकरण के कारण कृषि क्षेत्र का बड़ा हिस्सा हमेशाा के लिए लुप्त हो गया है। इन सब कारणों से भविष्य में चीन में खाद्य उत्पादन बढ़ाना कठिन हो सकता है।
इसी तरह एशिया के अधिकतर देशों में पहले से खाद्य संकट मौजूद है या उत्पादन बढ़ाने के ऐसे तौर-तरीके अपनाए गए हैं जिनसे भविष्य में खाद्य आवश्यकताओं को पूरा करने में कठिनाई आ सकती है। अंतरराष्ट्रीय वित्त और व्यापार संस्थानों की नियमों और शर्तों के कारण भी इन देशों के जरूरतमंद लोगों की कठिनाइयां बढ़ रही हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियों का तेजी से प्रसार कृषि और खाद्य क्षेत्र के संकट को और उग्र कर रहा है। इन चिंताजनक परिस्थितियों में यह जरूरी है कि एशिया के देश आपस में खाद्य सुरक्षा संबंधी मुद्दों पर सहयोग और सहायता बढ़ाने के प्रयास करें। बहुराष्ट्रीय कंपनियों, धनी देशों और उनके द्वारा नियंत्रित संस्थानों से बातचीत में एशिया के किसानों को अपने हितों की रक्षा के लिए एकजुट होना चाहिए।
दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि कृषि को पर्यावरण की रक्षा से जोड़ने के साथ-साथ टिकाऊ तकनीकों का प्रसार करना चाहिए। गांवों में जल-संरक्षण और हरियाली पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है। इससे वह बुनियाद तैयार होगी जिससे रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर निर्भर हुए बिना ही पर्याप्त खाद्य उत्पादन हो सकेगा। इस प्रयास में कृषि के परंपरागत ज्ञान और परंपरागत बीजों से बहुत मदद मिल सकती है। विशेषकर चावल के मामले में परंपरागत बीजों और धान की बहुत-सी किस्मों की जैव-विविधता का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है।
जब चावल के संदर्भ में सरकार द्वारा बहुप्रचारित हरित क्रांति की विफलता और रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर अत्यधिक निर्भरता हानिकारक सिध्द होने लगी तो देश की इस सबसे महत्वपूर्ण फसल के बारे में चिंतित सरकार को वर्षों से उपेक्षित महान कृषि वैज्ञानिक डॉ. आरएच रिछारिया की याद आई। सन 1983 में इंदिरा गांधी के कार्यकाल में प्रधानमंत्री कार्यालय ने उन्हें चावल का उत्पादन बढ़ाने के लिए एक कार्ययोजना बनाने का आग्रह किया। डॉ. रिछारिया ने एक कार्ययोजना तैयार की, पर इंदिरा गांधी की मृत्यु के बाद यह दस्तावेज उपेक्षित ही रह गया।
इस दस्तावेज में उन्होंने उन कारणों की पहचान की थी, जिनकी वजह से पिछले लगभग बीस वर्षों में खाद, कीटनाशकों, सिचाईं, अनुसंधान, प्रसार आदि पर बहुत खर्चा करने बावजूद उत्पादकता वृध्दि की दर में वांछित तेजी नहीं लाई जा सकी है। उसके बाद उन्होंने मुख्य रूप से तीन भाग में अपनी योजना सामने रखी थी। पहली, चावल का विकास समृध्द देशी जनन द्रव्य पर आधारित होगा, जिनका अन्वेषण और संरक्षण होना चाहिए। दूसरी, एक अति विकेंद्रित प्रसार नीति और तीसरी, कृंतक प्रसार विधि का सुधरी किस्मों के प्रसार के लिए व्यापक स्तर पर उपयोग।
हालांकि यह योजना भारत के संदर्भ में बनाई गई, पर इससे एशिया के कई अन्य देश भी लाभान्वित हो सकते हैं।
भरत डोंगरा