खेत-खलियान पर आपका स्‍वागत है - शिवनारायण गौर, भोपाल, मध्‍यप्रदेश e-mail: shivnarayangour@gmail.com

Tuesday, April 22, 2008

खाद्यान्न संकट का सवाल

हाल ही में संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (ए.एफ.ओ.) के महानिदेशक जैक्स डायफ ने अपनी भारत यात्रा के दौरान खाद्य मंत्री शरद पवार से मुलाकात की और बाद में संवाददाताओं के साथ बातचीत में जो बातें कहीं उनसे खाद्यान्न की स्थिति को लेकर चिन्ता पैदा हो गई। श्री डायफ ने कहा कि दुनिया भर में खाद्य मोर्चे पर हालात गंभीर हैं। इस वक्त दुनिया में अनाज का स्टॉक काफी कम है और यह पूरी दुनिया की आबादी का सिर्फ 8 से 12 हफ्तों तक ही पेट भर सकती है। वे कहते हैं कि मिस्र, कैमरून, हैती, बुर्कीना फासो और सेनेगल जैसे देशों में इसे लेकर काफी संघर्ष भी हुए हैं। यह संघर्ष अन्य देशों में भी फैल सकते हैं।
श्री डायफ की आंकड़ों वाली सच्चाई पर ध्यान न भी दिया जाए तो भी खाद्यान्न सुरक्षा का सवाल आज दुनियाभर में उठाया जा रहा है। खेती का रूझान बदल रहा है। अब खाद्य फसलों की जगह अखाद्य फसलों का रकबा और उत्पादन दोनों ही बढ़ रहा है। भारत में भी प्रायोजित और गैर प्रायोजित दोनों तरीके से नकदी फसलों की ओर किसानों की रुचि बढ़ी है या बढ़ाई गई है। एक तरफ यह हल्ला भी मचाया जा रहा था, जो असल सच्चाई भी है, कि लगातार उर्वरकों और कीटनाशकों के इस्तेमाल से जमीन की उर्वरा शक्ति समाप्त हो रही है और अब रही सही कसर नकदी फसलों की खेती पूरी कर देगी। गौरतलब है कि नगदी फसलों में पानी और खाद दोनों की ज्यादा जरूरत होती है। पर जो भी हो, अखाद्य फसलों का उत्पादन तो बढ़ ही रहा है।
भारत सरकार का वर्ष 2007-2008 का आर्थिक सर्वेक्षण कहता है कि 1990 से 2007 के दौरान खाद्यान्न उत्पादन 1.2 प्रतिशत कम हुआ है, जो कि जनसंख्या की औसतन 1.9 प्रतिशत वार्षिक बढ़ोत्तरी की तुलना में कम है। अनाज तथा दालों की प्रति व्यक्ति उपलब्धताओं में भी इस अवधि के दौरान गिरावट हुई है। अनाजों की खपत 1990-91 में प्रतिदिन प्रति व्यक्ति 468 ग्राम थी जो कि 2005-2006 में प्रतिदिन 412 ग्राम प्रति व्यक्ति हो गई है। मसलन अनाज की उपलब्धता में 13 प्रतिशत की गिरावट आई है। इसी अविध में दालों की खपत प्रतिदिन 42 ग्राम प्रति व्यक्ति से घटकर 33 ग्राम प्रतिदिन प्रति व्यक्ति रह गई है। उल्लेखनीय है कि 1956-57 में दालों की उपलब्धता 72 ग्राम प्रति व्यक्ति थी।
उपरोक्त आंकड़े बताते हैं कि खाद्यान्न की उपलब्धता में कमी आ रही है। इसका असर व्यक्ति के स्वास्थ्य पर भी दिखाई देता है। वर्ष 2005-2006 में कराए गए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे के आंकड़े अपनी अलग ही कहानी कहते हैं। सर्वे के मुताबिक देश में कुपोषित लोगों की तादाद काफी ज्यादा है। सर्वे में कहा गया है कि देश में 5 साल से कम उम्र के बच्चे शारीरिक रूप से अविकसित हैं और इसी उम्र के 43 फीसदी बच्चों का वजन (उम्र के हिसाब से) कम है। इनमें से 24 फीसदी शारीरिक रूप से काफी ज्यादा अविकसित हैं और 16 फीसदी का वजन बहुत ही ज्यादा कम है। वहीं व्यस्कों की हालत भी कुछ ज्यादा ठीक नहीं है। देश में 15 से 49 साल की उम्र के बीच की महिलाओं का बॉडी मांस इंडेक्स (बीएमआई) 18.5 से कम है, जो उनमें पोषण की गंभीर कमी की ओर इशारा करता है और इन महिलाओं में से 16 फीसदी तो बेहद ही पतली हैं। इसी तरह देश में 15 से 49 साल की उम्र के 34 फीसदी पुरुषों का बीएमआई भी 18.5 से कम है और इनमें से आधे से ज्यादा पुरुष बेहद कुपोषित हैं। यदि कुपोषण और गिरते स्वास्थ्य का सीधा सम्बन्ध अखाद्य फसलों के उत्पादन से न भी हो तो भी कम से कम यह भविष्य के लिए चिंता का विषय तो है। ऐसा माना जाता है कि नकदी फसलों से आर्थिक सम्पन्नता आ रही है किन्तु वहीं उसका स्वास्थ्य से जुड़ा दूसरा पक्ष भी है जिसकी ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
एक जानकारी के मुताबिक वर्ष 1882-83 में गैर खाद्य फसलों की हिस्सेदारी 37.1 प्रतिशत थी जो कि 2005-06 तक 46.7 फीसदी तक पहुंच चुकी है। आज गेहूं-चावल की तुलना में फल-सब्जी, मछली आदि के उत्पादन में बढ़ोत्तरी हो रही है। 2000-01 और 2005-06 के बीच गेहूं व चावल समेत अनाजों का उत्पादन 21.63 फीसदी बढ़ा जबकि फल-सब्जी उत्पादन में 33.74 फीसदी और मछली के उत्पादन में 61 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है। कुल मिलाकर देखा जाए तो जहां खाद्य फसलों के उत्पादन में 2 प्रतिशत की वृध्दि हुई है वहीं अखाद्य फसलों के उत्पादन में 4 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट कहती है कि उँची कीमतों वाली फसलों की मांग बढ़ रही है शायद यही कारण है कि अखाद्य फसलों का उत्पादन बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं।
क्रिसिल के मुख्य अर्थशास्त्री डी.के. जोशी कहते हैं कि किसान अब ऊँची कीमतों वाली फसलों की तरफ बढ़ रहे हैं। वे कहते हैं कि इसमें किसानों को ज्यादा मुनाफे की उम्मीद रहती है और वह पूरी भी होती है लेकिन वहीं वे यह भी कहते हैं कि अनाज की कमी चिंता का विषय हो सकता है और ऐसे में इनकी मांग पर ध्यान देते हुए नीति निर्धारकों को हस्तक्षेप करने की जरूरत है।
पर असल में हालात इससे विपरीत ही हैं। नीति निर्धारकों को इस बात की कोई चिंता नहीं है कि लोगों की खाद्यान्न की पूर्ति भी एक मुद्दा है! गौरतलब है कि देश में फूलों के कारोबार में काफी वृध्दि पिछले कुछ वर्षों में हुई है। वर्ष 2004-05 में फूलों का निर्यात 221 करोड़ रुपयों का था जो कि 2006-07 में 650 करोड़ रुपयों का हो गया। मसलन इसमें 194 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है। फल-सब्जी का निर्यात 1363 करोड़ रुपयों के मुकाबले आज 2411 करोड़ रुपयों पर पहुंच गया है। यानि इसमें 77 प्रतिशत की वृध्दि हुई है। इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च (आईसीएआर) की 2006-07 की रिपोर्ट के मुताबिक कुल उत्पादन में ऊँची कीमत वाली फसल की बढ़ती हिस्सेदारी बताती है कि भारतीय कृषि जगत में खाद्य फसलों की हिस्सेदारी कम हो रही है।
कारण जो भी हों लेकिन यह तो स्पष्ट है कि अखाद्य फसलों का रकबा और उत्पादन बढ़ रहा है। तात्कालिक रूप से भलेही यह फायदेमन्द दिखाई दे लेकिन निश्चित ही भविष्य में इसके खतरे हैं। इस ओर गंभीरता से ध्यान देने की महती जरूरत है ताकि समय रहते स्थिति को सुधारने की दिशा में पहल की जा सके।
शिवनारायण गौर
ई 7/70 अशोका सोसायटी
अरेरा कॉलोनी, भोपाल 462016 (म.प्र.)
मो. 094254 33229
ई मेल shivnarayangour@gmail.com

6 comments:

अनिल रघुराज said...

शिव नारायण जी, आपने बताया है कि, "2000-01 और 2005-06 के बीच गेहूं व चावल समेत अनाजों का उत्पादन 21.63 फीसदी बढ़ा जबकि फल-सब्जी उत्पादन में 33.74 फीसदी और मछली के उत्पादन में 61 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है।" यह तो अच्छी बात है कि किसान गेहूं-चावल से निकलकर दूसरी लाभप्रद चीजों के उत्पादन में जा रहे हैं। असली दोष सरकार की procurement policy और फसलों के मूल्य-निर्धारण नीति का है। गेहूं निजी कंपनियां ले जा रही हैं और सरकार नहीं खरीद पा रही है तो दोष सरकार का ही हुआ न। हां, यह अलग बात है आज दुनिया भर में खाद्यान्नों की खपत बढ़ गई है, जबकि सप्लाई घट रही है। ये ज़रूर चिंता का विषय है। लेकिन इसके लिए किसानों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

अतुल said...

काफ़ी जानकारी मिली.

anil said...

informative post

शिवनारायण गौर said...

Dear Anil Raghu Ji

Salam

Thanks for your comments on my article. Actually you are saying right. There are major problems in government policies. I am not blaming to farmers I also recognised these things that govt is responsible for the same.

For last few months I was involved in studying about procurement systems of wheat and rice in Madhya Pradesh. I found that after amendment of APMC Act procurement have affected. Madhya Pradesh Govt. allows to procure wheat for Private campanies. In seoni district of Madhya Pradesh govt. have given permission to NBHC to procure rice from Mandi and you know there is only one player in these Mandis.

There the government procurement system had failed last year. Most of wheat procure by ITC, kargil and AWB from Madhya Pradesh and FCI and civil supply corporation was unable to procure wheat for PDS. that is why we planned to do the study for this issue.

Thanks a lot. I will try to keep in touch with you.

Shivnarayan Gour

शिवनारायण गौर said...

Atul ji and Anil ji

Thanks for you comments.

Shivnarayan

प्रो० डा. जयजयराम आनंद said...

Dear Shri Gour,
Really your articles/ data regrding various issues concerning
agriculture & so on are very informative in generaland especially for planners/researchers &so on.Ididn't go deeply,but on cursory glance Iconcluded as under:
khet aur khaliyan blog se gujraa
naap naa paayaa mai kitnaa hai gahraa
pr itnaa to bhaap liyaa
Gour ko khetkhaliyan ka gyaan hai
sachmuch men gahraa ---gahraa--gahraa
Prof.Dr Jai jai ram Anand
Bhopal