खेत-खलियान पर आपका स्‍वागत है - शिवनारायण गौर, भोपाल, मध्‍यप्रदेश e-mail: shivnarayangour@gmail.com
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Friday, February 19, 2010

सजीव खेती ही एकमात्र रास्ता है

“मैंने पहले रासायनिक खेती की और बाद में सजीव खेती। वर्ष 1994 तक मै रासायनिक खेती करता रहा। जिसमें मेरी जमीन की उर्वरक शक्ति गई, भूजल स्तर नीचे गया, देसी बीज खत्म हुए, फसलचक्र बदला और मजदूरों का रोजगार खत्म हुआ। लेकिन जब मेरा इस विनाशक खेती से मोहभंग हुआ और सजीव खेती अपनानी शुरू की तो मेरा जीवन ही बदल गया। इससे धीरे-धीरे भूमि की उर्वरक शक्ति बढ़ी, भूजल स्तर उपर आया और देसी बीज बचे और मजदूरों को रोजगार भी मिला। यानी सजीव खेती सिर्फ फसल उत्पादन की नहीं, समस्त जीव-जगत के पालन का विचार है। यह एक जीवन पद्धति है।” यह कहना है यवतमाल (महाराष्ट्र) जिले के किसान सुभाष शर्मा का।

हाल ही में इन्दौर में 7 से 9 फरवरी तक चले सजीव कृषि समाज मेला में बताया। इस मेले का उद्घाटन मध्यप्रदेश के कृषि मंत्री ने किया था। मेले में देश के कई कोनों से आए कृषि वैज्ञानिक, शोधकर्ता, किसान शामिल हुए। इस मेले का आयोजन भारतीय सजीव कृषि समाज (ओ.एफ.ए.आई.), किसान कल्याण एवं कृषि विकास विभाग, मध्यप्रदेश शासन, मध्यप्रदेश विज्ञान-प्रौद्योगिकी परिषद और शासकीय कृषि महाविद्यालय ने मिलकर किया था। इसमें कृषि विशेषज्ञों के अलावा सीधे खेती करने वाले किसानों ने भी अपने अपने अनुभव साझा किए।

यहां महाराष्ट्र के यवतमाल के छोटी गूंजरी के सजीव खेती करने वाले किसान सुभाष शर्मा ने कहा कि रासायनिक खेती विनाश करने वाली है जबकि सजीव खेती से निर्माण होता है। उन्होंने कहा कि सजीव खेती अपनाने से जमीन की उर्वरा शक्ति बढ़ गई है। गाय के गोबर से जमीन में केंचुओं और जीवाणुओं की संख्या बढ़ी जिन्होंने खेत को उर्वर बनाया। हमने खेत में वनस्पति भी लगाईं जिसकी पत्तियां जैव खाद में बदलीं। पेड़ों में पक्षी आए जिन्होंने फसलों की इल्लियों को खाया। यानी कीट नियंत्रण किया। और उन्होंने जो विश्ष्टा किया उससे जमीन उर्वर हुई। इससे अगले साल फसल में ज्यादा फल्लियां लगी। ज्यादा उत्पादन हुआ।

इसी प्रकार जीवाणुओं के कारण बारिश का पानी खेत में रूकेगा और भूजल स्तर ऊपर आएगा। अगर हमारे पास खुद का बीज होगा तो उसे हम बारिश आने के पहले ही बो देते हैं। यह प्रयोग पिछले 10 साल में सिर्फ एक बार ही फेल हुआ जब बोनी खराब हुई, अन्यथा हर बार सफल रहा। अगर हम खेत में मल्ंिचग करते हैं तो तुअर में फल्लियां ज्यादा लगती हैं। उसकी पत्तियां जैव खाद बनाती हैं। जमीन क्रमशः सुधरती जाती है। इस प्रकार सजीव खेती से मुनाफा भी कमाया। और इसमें हमने मशीन से नहीं, मजदूरों से काम लिया। उनकी क्षमता और ईमानदारी पर भरोसा किया। परिणामस्वरूप मुनाफा क्रमशः बढ़ रहा है। मजदूरों को अब दीपावली पर बोनस भी दिया जाता है।
यह कहानी सिर्फ सुभाष जी की नहीं है, सजीव खेती की ओर अब बहुतेरे किसानों का रूझान बढ़ रहा है।

हमारी खेती का जो नुकसान हजारों वर्षों में नहीं हुआ, उतना हमने पिछले 40 वर्षों में कर लिया। अब हालत यह है कि लागत बढ़ती जा रही है, उपज कम होती जा रही है। हर साल रासायनिक खाद की खपत बढ़ती जा रही है। प्यासे बीजों को पानी पिलाने के लिए बेहिसाब भूजल उलीचा जा रहा है। बिजली संकट बढ़ रहा है। यानी कुल मिलाकर खेती खत्म हो रही है। घाटा का धंधा बन गई है। और भोजन-पानी भी जहरीला हो गया है।

इधर हरित क्रांति की असफलता के समाधान के रूप में जैव तकनीक को सामने लाया जा रहा है, जो हरित क्रांति से भी ज्यादा खतरनाक है। हाल ही बीटी बैंगन का मामला सामने आया है, जिसका काफी विरोध हो रहा है। हमारे यहां बैंगन की हजारों किस्में हैं, फिर जीन परिवर्तित बीटी बैंगन को क्यों लाया जा रहा है, जिसके सुरक्षित होने पर वैज्ञानिकों में मतैक्य है। हालांकि फिलहाल, बीटी बैंगन को व्यावसायिक अनुमति नहीं दी गई है, लेकिन भविश्य में इस पर रोक लगी रहेगी, इस पर अब भी रहस्य बना हुआ है। यह तकनीक मानव स्वास्थ्य और पर्यावरणीय दृष्टि से सुरक्षित नहंी है, यह सवाल उठाया जा रहा है।

इसलिए हमें सजीव खेती की ओर बढ़ना चाहिए। मिट्टी -पानी के संरक्षण करना चाहिए। देसी बीज, हल-बक्खर और गोबर
खाद की खेती की ओर बढ़ना चाहिए। कम पानी वाले देसी बीज और जमीन की उर्वरक शक्ति बढ़ाकर कम्पोस्ट खाद के प्रयोग, हरी खाद के माध्यम से किसान असिंचित खेती या सीमित सिंचाई के माध्यम से अच्छा उत्पादन कर सकते हैं। यह सभी दृष्टि से सुरक्षित भी है। पर्यावरणविद् व प्रख्यात लेखक क्लाड अल्वारिस का कहना है कि सभी परंपरागत कृषि पद्धतियों को किसानों ने ही विकसित किया है, वैज्ञानिकों ने नहीं। इसलिए परंपरागत कृषि ज्ञान, पद्धतियों व जैविक खेती की ओर बढ़ना जरूरी है।

इस कार्यक्रम के संयोजक डा. भारतेन्दु प्रकाश का कहना है कि हमें कृश्षि को जैविक व प्राकृतिक स्वरूप की ओर परंपरागत ज्ञान तथा संसाधनों के संरक्षणात्मक शोध का आधार लेकर लौटाना होगा। किसानों को आत्मनिर्भरता, परस्पर सहयोग तथा शोषणकारी बाजार से मुक्ति के लिए गंभीरता से कार्य करना होगा।

बाबा मायाराम

Friday, July 31, 2009

जैविक खेती से किसानों में खुशी

साठ के दशक में शुरू हुई हरित क्रांति के बाद देश खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर ही नहीं बल्कि अग्रणी देश भी बन गया। हरित क्रांति के नाम पर खेती में कीटनाशकों और खाद के रूप में रसायनों के जमकर हुए प्रयोग ने हमारे किसानों का उत्पादन तो बढ़ाया लेकिन साथ ही हमारी प्राकृतिक संपदा का भरपूर दोहन भी किया। धीरे धीरे बंजर हुई ज़मीन का उत्पादन मात्रा में कम और निम्न गुणवत्ता वाला होने लगा और भारी कर्ज़ से दबने के बाद परेशान किसानों ने आत्महत्याएं करनी शुरू कर दीं। देश के नीति निर्धारकों को इस विपदा से निपटने का एकमात्र उपाय नज़र आया रासायनिक खेती के बजाय जैविक खेती कराना।

मिट्टी को जीवन यापन का आधार मानने वाले भारत के लिए जैविक खेती कोई नई बात नहीं है। देश की पुरानी पारंपरिक खेती में भी गाय और दूसरे पालतू पशुओं के गोबर से बनी खाद का उर्वरकों के रूप में इस्तेमाल होता था। पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए लाभदायक इस जैविक खेती ने फिर लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। जैविक खेती में रसायनों का प्रयोग करते हुए फसलों और मिट्टी को फायदा पहुंचाने वाले कृमियों और सूक्ष्म जीवों का संरक्षण होता है जिससे जमीन की उर्वरा शक्ति बनी रहती है। जैविक खेती रसायनों से होने वाले दुष्प्रभावों से पर्यावरण को बचाती है और इसके माध्यम से जैव पर्यावरण का भी संरक्षण होता है। सबसे बड़ी बात यह है कि जैविक खेती के जरिये ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में करीब 35 फीसदी की कमी की जा सकती है।

किसानों की सहकारी संस्था नैफ़ेड और आईटीएस यानी इंटरनेशनल ट्रेसिएबिलिटी सिस्टम्स लिमिटेड मिलकर पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप में राष्ट्रीय बागवानी मिशन और राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत उत्तर प्रदेश के 25 ज़िलों में 41 हज़ार हैक्टेयर क्षेत्र में जैविक खेती परियोजना चला रहे हैं। जैविक खेती का प्रमाणीकरण कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण यानी एपेडा से मान्यताप्राप्त इंडोसर्ट और एसजीएस संस्थाएं कर रही हैं।

राष्ट्रीय बागवानी मिशन के तहत उत्तर प्रदेश के 25 ज़िलों में 15 हज़ार हैक्टेयर क्षेत्रफल में 9225 पंजीकृत किसानों के खेतों पर फल और सब्ज़ियों की खेती अन्य फसल चक्रों में की जा रही है, जबकि ऱाष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत उत्तर प्रदेश के 24 ज़िलों में 26 हज़ार हैक्टेयर क्षेत्रफल में 12790 पंजीकृत किसानों के खेतों पर खाद्य, तिलहन और दलहन की खेती की जा रही है।

इन योजनाओं के तहत इन संस्थाओं के माध्यम से किसानों के समूहों को पहले जैविक फसल उत्पादन के लिए पंजीकृत किया जाता है फिर उन्हें उत्पादन की जैविक विधियों का प्रशिक्षण दिया जाता है। जैविक खेती प्रणाली अपनाने के लिए प्रेरित करने के साथ-साथ किसानों को कृमि खाद इकाई, जैविक खेती तथा जैविक प्रमाणीकरण के बारे में भी प्रशिक्षित किया जाता है। किसानों के खेतों से मिट्टी के नमूने लेकर भूमि स्वास्थ्य की जाँच करवाई जाती है। इन नमूनों से मिट्टी के लिए लाभदायक सूक्ष्म जीवाणुओं को अलग करके जैविक कल्चर तैयार किया जाता है। यह जैविक कल्चर किसानों में वितरित किया जाता है जिसे किसान गोबर की सड़ी खाद के साथ मिलाकर खेत में इस्तेमाल करते हैं। इससे भूमि की उर्वरा शक्ति और साथ ही फसल उत्पादन भी बढ़ता है।

किसान के खेत से प्राप्त सभी प्रकार के आँकड़े नैफ़ेड और आईटीएस को प्राप्त कराता है जिन्हें नैफ़ेड और आईटीएस की वेबसाइट पर देखा जा सकता है। ये आँकड़े किसानों की ट्रेसिएबिलिटी में काम आते हैं। ट्रेसिएबिलिटी इनके उत्पादों के पैदा होने से बाज़ार होते हुए उपभोक्ता तक पहुँचने और ज़रूरत पड़ने पर वापस उत्पादक तक पहुँचने की व्यवस्था है।

विशेषज्ञों का कहना है कि जैविक उत्पाद का स्वाद और गुणवत्ता पारंपरिक खेती के जरिए उगाये जाने वाले उत्पाद से ज्यादा बेहतर होता है। कीटनाशक हवा के साथ-साथ मीलों तक अपना दुष्प्रभाव छोड़ते हैं इसलिए इनका असर क्षेत्र के लोगों के स्वास्थ्य पर भी पड़ता है इसलिए जैविक खाद्य स्वास्थ्य के लिहाज से भी बेहतरीन होते हैं। विभिन्न शोधों से भी जाहिर हुआ है कि पारंपरिक खेती के जरिए उगाए गए उत्पादों के मुकाबले जैविक उत्पादों में विटामिन आदि की मात्रा ज्यादा होती है और इसमें रासायनिक कीटनाशक का अंश भी नहीं होता।

अब तक साधारण खेती कर रहे किसानों और अन्य जानकारों की आशंका थी कि जैविक खेती करने से उत्पादन पहले के मुक़ाबले कम हो जाएगा लेकिन उत्तर प्रदेश में जैविक खेती के प्रयोग के आँकड़े बताते हैं कि जैविक खेती के पहले साल में लगभग पहले के ही बराबर पैदावार मिली जबकि दूसरे साल में उनकी पैदावार पहले से क़रीब एक चौथाई बढ़ गई।

राष्ट्रीय बागवानी मिशन के मुख्य सलाहकार डॉ आरके पाठक का कहना है, "हमारे यहाँ जो रसायनों पर आधारित खेती हो रही थी उससे धीऱे धीरे उत्पादकता कम हो रही थी। उत्पादन की गुणवत्ता प्रभावित हो रही थी और पर्यावरण प्रदूषित हो रहा था। इस वजह से हमारे नीति निर्धारकों ने जैविक खेती को बढ़ावा देने के बारे में सोचा।" उन्होंने कहा, "जैविक खेती को जब शुरू किया गया तो लोगों को लगा कि क्या वाकई इससे उत्पादकता बढ़ेगी और खरपतवार ख़त्म हो जाएंगे? लेकिन हमने यह कर दिखाय। अब जो किसान जैविक खेती कर रहे हैं उनका उत्पादन रासायनिक फर्टिलाइज़रों का प्रयोग करने वाले किसानों से हर मायने में बेहतर है।"

खेतों को पूरी तरह जैविक के रूप में परिवर्तित करने के लिए किसानों को तीन साल तक पूरी तरह से जैविक खादों और जैविक कीटनाशकों का ही उपयोग करना होता है। तीन साल तक सफलता के साथ जैविक खेती करने के बाद किसानों और उनके खेतों का जैविक के रूप में किसी देशी या विदेशी सत्यापन एजेंसी से समूह प्रमाणीकरण कराया जाता है।

जैविक खेती और जैविक उत्पादों के लिए अब उपभोक्ताओं में भी जागरुकता आई है और दूसरे साधारण उत्पादों के मुक़ाबले ज़्यादा मूल्य होने के बावजूद उनका रुझान जैविक यानी ऑर्गेनिक खाद्य पदार्थो में बढ़ रहा है। जैविक खाद्य पदार्थों का अलग बाज़ार बनाने के लिए स्वयंसेवी संस्था मोरारका फ़ाउंडेशन ने मुंबई में अपनी आउटलेट "डाउन टू अर्थ" खोली है। हैफेड ने भी प्रारम्भिक तौर पर पंचकूला, चंडीगढ़ और दिल्ली के बाजारों में 500 मिलीलीटर की पैकिंग में प्रमाणित जैविक सरसों तेल और 25 किलोग्राम के थैलों में हैफेड जैविक गेंहू की बिक्री शुरू की है। जैविक खेती के लिए काम करने वाली संस्था आईटीएस भी रिलायंस फ़्रेश, मदर डेयरी और स्पेंसर्स आदि रिटेल आउटलेट के साथ मिलकर भारत में किसानों के जैविक उत्पादों का एक अलग बाज़ार बनाने की कोशिशों में लगी है।
ऋचा कुलश्रेष्ठ

ऋचा कुलश्रेष्ठ दिल्‍ली में रहती हैं उन्‍होंने यह लेख मेल से खेत खलियान के भेजा है।

Friday, February 27, 2009

पोस्‍टर प्रदर्शनी

हाल ही में होशंगाबाद के पास के एक गांव निटाया में ग्राम सेवा समिति की एक बैठक में जाने का मौका मिला। ग्राम सेवा समिति इन दिनों जैविक खेती को प्रोत्‍साहित करने के लिए जिले के करीब 20 गांवों में काम कर रही है। उन्‍होंने जैविक खेती पर एक पोस्‍टर प्रदर्शनी तैयार की है। ये पोस्‍टर हमें रासायनिक खेती के खतरे से आगाह कराते हैं।
देखिए कुछ पोस्‍टर






















ये पोस्‍टर कुछ नमूने भर हैं इस तरह के कई पोस्‍टरों के साथ एक प्रदर्शनी बनाई गई है जिसे संस्‍था क्षेत्र में होने वाले सांस्‍कृतिक कार्यक्रमों में प्रदर्शत i हाल ही में होशंगाबाद में सम्‍पन्‍न एक मेले में भी प्रदर्शनी लगाई गई। लोगों के लिए इस तरह के पोस्‍टर काफी शैक्षणिक हैं ऐसा संस्‍था मानती है।

रासायनिक खेती के खतरों को लोग अब गम्‍भीरता से ले रहे हैं। यही कारण है पिछले कुछ सालों में जैविक खेती का प्रचलन बढ़ा है। व्‍यक्‍ितगत स्‍तर पर कई किसान जैविक खेती कर रहे हैं। खेती पर रासायनिक खादों, कीटनाशकों से होने वाले असर पर एक बहस छिड़ने चाहिए। खेत खलियान की ओर से शिवनारायण गौर

Monday, October 13, 2008

रासायनिक खेती से भी जलवायु में बदलाव

रासायनिक खेती जलवायु परिवर्तन का बड़ा कारक हैं जबकि जैविक खेती से जलवायु तो बेहतर होता ही है इससे जमीन की उपजाऊ क्षमता भी बढ़ती है। नवधान्य संस्था की संस्थापक निदेशक डॉ. वंदना शिवा ने पिछले दिनों दिल्ली में आयोजित एक प्रेस कांफ्रेन्स में यह बातें कहीं। वे 'भोजन का भविष्य - जलवायु परिवर्तन' विषय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में बोल रही थीं इसमें देश विदेश से आए कई विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया।

डॉ. शिवा ने नवधान्य की ओर से हुए शोध के हवाले से बताया कि रासायनिक खेती की तुलना में जैविक खेती से कार्बन पृथक्करण में 25 फीसद बढ़ोत्तरी होती है। मिट्टी में पानी रोकने की क्षमता भी 17 फीसद बढ़ जाती है। जैविक खेती को लेकर भांति फैलाई जाती है कि इसमें उपज कम और रासायनिक खाद के प्रयोग से अधिक उत्पादन होता है। जबकि शोध में पाया गया कि जैविक खेती करने वालों की आमदनी भी ज्यादा होती है। आनुवंशिक रूप से परावर्धित रासायनिक बीटी कपास की खेती करने वालों की तुलना में जैविक खेती करने वाले किसानों की दस गुना अधिक आमदनी हुई।


उन्होंने बताया कि कीट पतंगों का बीटी कपास पर कोई प्रभाव नहीं होता ऐसा दावा किया जाता रहा है जबकि इस कपास में कीटनाशकों की कीमत सामान्य से 11 फीसद अधिक पड़ती है। जैविक खेती का प्रचार प्रसार करने वाले नारायण रेड्डी इथोपिया के टिकाऊ विकास संस्थान के सू एडवर्डस बेनवर्ड गेयर सहित कई वक्ताओं ने विचार रखे। वक्ताओं ने चिंता जताते हुए कहा कि जैविक खेती को जलवायु संवर्धन के लिए बढ़ावा देने की बजाय जलवायु परिवर्तन पर बनी राष्ट्रीय कार्य योजना आनुवंशिक रूप से परावर्धित फसल पर खासतौर से केंद्रित है। यह रणनीति सरासर गलत है। यह न केवल खाद्य सुरक्षा के लिए खतरनाक है बल्कि जलवायु संवर्धन के लिए घातक है।

डॉ. जॉनन फैगन, डॉ. माई वान हो, डॉ. इरिना एमीकोवा और डॉ. शिव चोपड़ा सहित कई वैज्ञानिकों ने बताया कि आनुवंशिक रूप से परावर्धित फसल और आनुवंशिक अभियांत्रिकी कितनी घातक है इस पर भरोसा नहीं किया जा सकता। इस तकनीक से उत्पादकता तो नहीं बढ़ी उल्टे उसने फसल और पशुओं की उत्पादन क्षमता को नष्ट कर दिया है।

रूस की विज्ञान अकादेमी के अध्ययन से पता चलता है कि साधारण सोया पर निर्भर चूहों की तुलना में आनुवंशिक रूप से परावर्धित सोयाय पर निर्भर चूहों की मृत्यु दर 50 फीसद अधिक है। जीएम सोयाय खिलाकर पाले गए चूहे बांझ हो गए थे और इमें टयूमर के ज्यादा मामले भी पाए गए। सम्मेलन में देशभर से प्रस्तुत किए गए परचों से पता चला कि आंध्रप्रदेश, उड़ीसा, ओर पंजाब में बीटी कपास के खेत में घास चरने वाली भेड़ों की बड़ी संख्या में मौत हो गई। इससे भी खतरनाक बात यह है कि खाद्य सुरक्षा नियमावली में इसकी अभी भी उनदेखी की जा रही है।

खाद्य सुरक्षा और आत्मनिर्भरता के लिए बीजों को पेटेंट भी घातक है। इससे किसानों की आत्मनिर्भरता खतरे में पड़ रही है। और बीज ही नहीं पूरी खेती पर बीज कंपनियों का एकाधिकार बढ़ रहा है। वक्ताओं ने बीज के पेटेंट रोकने की मांग की। जीएमओ और रासायनिक खादों पर अरबों रुपए की सबसिडी खत्म करने की मांग भी की।

रासायनिक खेती के बढ़ते संकट को लेकर इन दिनों एक चर्चा छिड़ी है। जमीन की उर्वरा शक्ति खत्म होने के अलावा जलवायु परिवर्तन के एक कारण के रूप में देखा जा रहा है। जब एक तरफ ग्लोबल वार्मिग दुनिया में चिंता का मुद्दा बना हुआ है। खेती और जलवायु परिवर्तन के इस रिश्ते को समझने की जरूरत है। प्रस्तुत रपट दिल्ली में हुए एक सम्मेलन की चर्चा का संक्षिप्त सार रखते हैं। उम्मीद है आपकी राय चर्चा को आगे बढाएगी। - शिवनारायण गौर

Tuesday, October 7, 2008

फसलों में पोषक तत्वों की कमी

मेरठ स्थित क्षेत्रीय भूमि परीक्षण प्रयोगशाला के सहायक निदेशक प्रदीप कुमार वर्मा के मुताबिक मेरठ व सहारनपुर मंडल में की गई वैज्ञानिक जांच में पाया गया हे गेहूं, दाल, चावल में पौष्टिक तत्वों की कमी आती जा रही हे। उन्होंने बताया कि किसानों के रासायनिक खाद का अधिक इस्तेमाल करने से जमीन केपोषक तत्वों का संतुलन गड़गड़ा रहा है। इसका असर यहां पर उगने वाली फसलों पर दिखाई दे रहा है। खाद्य पदार्थों मेें जहां आयरन व फास्फोस्रस की बेहद कमी सामने आई वहीं प्रोटीन, कैल्शियम, आयरन व कैलोरी में भी पोषक तत्वों की कमी आंकी गई है।
श्री वर्मा के मुताबिक विभिन्न इलाकों से ली गई मिट्टी के नमूनों में जांच में पाया गया कि अंधाधुध रासायनिक खादों के इस्तेमाल से जमीन की उर्वरा शक्ति कम होती जा रही है। कार्बन की मात्रा 70 से 75 फीसद कम पाई गई वहीं जिंक 60-65, नाइट्रोजन 28-33, सल्फर 25-28 और पोटेशियम 20-25 प्रतिशत तक कम पाया गया। जमीन के इन आवश्यक पोषक तत्वों की कमी का असर अब यहां उगने वाली फसलों की गुणवत्ता पर प्रभाव डाल रहा है।
इन फसलों से पकाए गए दाल, रोटी, चावल में पोषक तत्वों की काफी कमी पाई गई है। सौ ग्राम दाल में आयरन की मात्रा 6 ग्राम की जगह 2.7 पाई गई वहीं रोटी में इस जरूरी तत्व की मात्रा 4.9 की जगह 2.7 पाई गई। चावल में इसकी मात्रा 0.7 की जगह 0.5 मिली है। जांच के दौरान फोस्फोरस की मात्रा दाल में 304 मिलीग्राम की जगह 300, रोटी में 355 की जगह 306, चावल में 160 के मुकाबले 150 पाई गई। कैल्षियम दाल में 110 मिलीग्राम की जगह 73, रोटी में 48 की जगह 41 पाया गया। फाइबर, कैलोरी और प्रोटीन की मात्रा पर भी असर देखने को मिलो है। दाल में फाइबर (रेष) की मात्रा 1.5 ग्राम के बजाय 1.3 पाए गए, रोटी में 1.9 ग्राम की जगह 1.7 व चावल में मानक के अनुरूप् 2 ग्राम पाई गई। खाद्य पदार्थों से मिलने वाली कैलोरी की मात्रा भी घटती जा रही हे। दाल में 33.8 की जगह 31.1, रोटी में 34.8 की जगह 33.8 और चावल में 345 की जगह 341 पायी गई। विकास के लिए जरूरी तत्व प्रोटीन की मात्रा दाल में 22.3 की जगह 21.8, रोटी में 12.1 की जगह 11 व चावल में मानक के अनुरूप 6.8 पाई गई। खा पदार्थों में पोशक तत्वों की गिरावट आने से चिकित्सक भी खासे चिंतित हैं। उनका मानना है कि पौष्टिक तत्वों की कमी का असर आदमी के षरीर में रोगों से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता पर पड़ेगा। इसका खासा असर बच्चों व महिलाओं पर पड़ने की संभावना है।


"फसलों में पोषक तत्वों की कमी" ये खबर गत 18 सितम्‍बर को हिन्‍दी के अखबारों में प्रकाशित एक खबर पर आधारित है। ये समस्या केवल मेरठ और सहारनपुर की ही नहीं है बल्कि अमूमन हर इलाके में रासायनिक उर्वरक का बेतहाशा इस्तेमाल किया जा रहा है। कई क्षेत्र तो ऐसे हैं जहॉं अब उत्पाकदन में ठहराव आ गया है। मजबूरी में लोग अब रासायनिक खाद का इस्‍तेमाल कम करने लगे हैं। जैविक खेती की ओर भी अब कई लोग लौटने लगे हैं। सरकारी ढॉंचों की भूमिका को भी आलोचनात्‍मक ढंग से देखने की जरुरत है। हम जानते हैं कि रासायनिक खादों और कीटनाशकों के इस्‍तेमाल के लिए भी कई तरह से प्रलोभित करने की कोशिश की गई है। आज सरकार भी जैविक खेती करने की बात कर रही है। प्राक्रतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन तो अब भी जारी है। आप अपनी टिप्‍पणीं इस पोस्‍ट पर डाल सकते हैं। शिवनारायण गौर

Wednesday, July 23, 2008

जैविक खेती के अनुभव

रासायनिक खेती से जैविक खेती की ओर वापस लौटने का दौर शुरू हो गया है। कई किसान जो कि खेती में बढ़ती लागत से परेशान हो गए हैं वैकल्पिक रास्ते तलाश रहे हैं। इस विकल्प का एक रास्ता है कि बिना खाद की खेती की जाए। निश्चित ही इससे लागत तो कम होती ही है गुणवत्ता के रूप में भी जैविक अनाज का कोई मुकाबला नहीं है। मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले के कुछ गांवों के किसानों ने जैविक खेती करना शुरू किया है। गौरतलब है कि होशंगाबाद वह जिला है जहां तवा नदी पर एक बड़ा बांध बना है। सत्तर के दशक में बने इस बांध के बाद जिले की खेती में एक बड़ा बदलाव आया था। ज्यादा उत्पादन की होड़ ने किसानों को भरपूर रासायनिक खाद के इस्तेमाल की ओर धकेगा। कुछ समय के बाद उत्पादन में एक ठहराव आया और लागत बढ़ने लगी। अब कई किसान वापस जैविक खेती करने लगे हैं। पिछले दिनों ऐसे ही किसानों की एक बैठक होशंगाबाद के पास के एक गांव रोहना में आयोजित की गई यहां प्रस्तुत है इस बैठक में आए किसानों की कुछ बातें उनके ही शब्दों में:-

मैने अपनी एक एकड़ जमीन में रवि की गेहूं की फसल जैविक विधि से ली। इसमें मैंने नाडेप खाद का उपयोग किया। एक एकड़ जमीन में दो ट्राली नाडेप खाद डाला। साथ ही इसमें एक बोरी डीएपी एवं एक बोरी यूरिया डाला। इस रकबे में 14 क्विंटल गेहूं का उत्पादन हुआ।
लखन वर्मा, ग्राम बड़ोदिया कला

मैंने एक क्विंटल गेहूं में एक बारे डीएपी एवं 1.5 बोरी यूरिया डाला शेष नाडेप खाद एवं जीवमृत का उपयोग किया। इसमें 2.5 टैंक गेहूं निकला। 30 किलोग्राम चने की बोनी की थी जिसमें 7 क्विंटल चना निकला। इस चने की फसल पर मही एवं गोमूत्र का स्प्रे किया था। 2 एकड़ में गेहूं एवं आधा एकड़ में चना बोया था। इस 3 एकड़ में 3 ट्राली भू नाडेप खाद का उपयोग किया गया था।
शिवराम यादव, ग्राम पतलई

हम एक नई किस्म के सोयाबीन को बोने की तैयारी कर रहे हैं। यह किस्म पास ही के आगरा गांव के लक्ष्मीनारायण शर्मा नामक किसान ने बैतूल से लाए हैं। इसका औसत उत्पादन 16 क्विंटल प्रति एकड़ के लगभग है। मैंने गेहूं की फसल इस वर्ष ली। मैंने इन्दौर से गेहूं बीज लाया था, इसकी कीमत 1800 रुपए प्रति क्विंटल थी। इसका अच्छा उत्पादन रहा। इस उत्पादन को हमने इन्दौर की कंपनी को 3000 रुपए प्रति क्विंटल बेच दिया।
हमने सब्जी की खेती जैविक तरीके से की थी। सब्जी में फूलगोभी प्रमुख रूप से ली। जैविक खाद में वर्मी कम्पोस्ट डाला जिससे फूलगोभी का आकार बड़ा आया एवं उसका स्वाद भी अच्छा रहा। इसी जैविक के अनुभव को हमने गांव के दो तीन लोगों से करने को कहा वह भी आगामी समय में वर्मी कम्पोस्ट एवं नाडेप खाद बनाकर फसल पर इस्तेमाल करने का मन बना रहे हैं।
सीताबाई चौरे, बाईखेड़ी

मैंने अपने खेत में नाडेप खाद का उपयोग किया। हालांकि अभी मैंने रासायनिक खाद का भी उपयोग किया है। मेरा मानना है कि एक दम से जैविक खेती सम्भव नहीं है। धीरे धीरे ही रासायनिक खाद को कम किया जा सकता है। मैंने उन्द्राखेड़ी गांव की अनुसुईया बाई से जैविक के उपयोग करने की बात कही है। अनुसुईया बाई आगामी फसल में जैविक खाद का उपयोग करेंगी।
मैं अपने मकान के पीछे बाड़े में सब्जी में गोबर की खाद का ही उपयोग कर रही हूं। मैं अपने आस पड़ोस के लोगों से भी जैविक खाद का प्रयोग करने को कहती हूं।
दीपा यादव, रोहना

मैं आधा एकड़ जमीन में अर्धजैविक खेती कर रही हूं। इसमें मैंने गेहूं लगाए थे इससे रासायनिक खाद के उपयोग मे ंकमी हुई है।
विट्टन बाई, ग्राम देशमोहनी

Sunday, April 6, 2008

जैविक खेती अपनाते लोग

रामकुमार गौर
राजकुमार मोर्य मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले के सोहागपुर ब्लाक के बोरी गाँव के किसान हैं। पिछले कुछ सालों से वे अपने खेत में रासायनिक खाद का बिलकुल इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं। अब वे खेती को पूरी जैविक पद्धति से कर रहे हैं। वे किसी विचारधारा से प्रभावित होकर जैविक खेती नहीं कर रहे है। बल्कि खेती में लागत कम करने के उद्देश्य से लगातार खेती में नये नये प्रयोग करते रहते हैं। राजकुमार मार्य के पास आठ एकड़ जमीन है जिसमें वे गेहूँ 16 क्विं प्रति एकड़ एवं सोयाबीन 8-10 क्विं प्रति एकड़ के औसत से उत्पादन लेते हैं। जो रासायनिक खेती की तुलना में लगभग बराबर ही है और जब वे लागत के आधार पर उत्पादन देखते हैं खेती अब उनके लिए फायदे का सौदा हो गई है। राजकुमार भाई बताते है कि कुछ साल पहले जब वे अपने खेत में रासायनिक खाद का इस्तेमाल करते थे तो खेती करने में घाटा हो रहा था। उनका मानना है कि आजकल जमीन में जीवों की मात्रा कम हो गई है इस कारण हमारी जमीन ठोस हो गई है। यह जमीन हमने कीटनाशक एवं नींदानाशक के अधिक उपयोग के कारण खत्म कर दी है। इसलिए वे अपनी खेती में कभी भी नींदानाशक एवं कीटनाशक का उपयोग नहीं करते हैं। जमीन में खरपतवार की निंदाई कराते है। आपका कहना है कि जमीन में केंचुये होना बहुत जरूरी है। असल में केंचुये जमीन को खाद तो देते ही है जमीन कठोर होने से भी बचाते हैं।
श्री मोर्य साल भर कुछ ऐसे प्रयोग करते हैं जिससे कि जमीन की उर्वरकता बची रहे। जैसे कटाई के बाद वे खेत में दो बार बखरनी करते हैं जिससे कि नरवाई जमीन में मिल जाती है। उनका कहना है कि अधिकांश लोग खेत में नरवाई को जलाते हैं जिससे कि जमीन खराब होती है। आपके घर पर गोबर गैस संयंत्र लगा हुआ है जिसमें कि एक सीजन में 4-5 ट्राली स्लेरी (गोबर की खाद) इक्ट्ठा हो जाता है इस स्लेरी को आप बोनी से पहले पूरे खेत में विछाकर बखरनी करते हैं। इसके बाद बोनी करते हैं। खरपतवार की निंदाई करते है। खरपतवार के लिए किसी भी प्रकार के नींदानाशक का उपयोग नहीं करते हैं।वे मानते हैं कि लोग प्रति एकड एक क्विंटल अनाज बोते हैं जो कि ठीक नहीं है क्योंकि यदि ज्यादा मात्र में अनाज बोंएँगे तो जमीन उतना पोषक तत्व पौधे को नहीं दे पाएगी जिससे पौधा कमजोर होगा और अंतत: इसका असर उत्पादन पर पड़ता है।
श्री मार्य अपने खेत में गेहूँ में 75 किलो प्रति एकड़ बोनी करते हैं। आप कहते है कि जहाँ लोग ज्यादा बोनी करके कम मुनाफा लेते हैं वहीं मैं कम बोनी करके अच्छा मुनाफा लेता हूँ। रासायनिक खाद का इस्तेमाल आप कम करते हैं जिसमें कि डीएपी क़ी मात्रा तो कम रखते ही है पहले पानी पर केवल 15 बोरी प्रति एकड़ के हिसाब से यूरिया डालते हैं। आपका मानना है कि यदि व्यक्ति रासायनिक खादों का इस्तेमाल कम करे एवं जैविक खाद की मात्रा बढ़ाये तो उत्पादन तो अच्छा होगा ही लागत भी कम आएगी।निटाया ग्राम के नरेन्द्र चौधरी 25 एकड़ के किसान हैं वे 4 एकड़ खेत में पूर्णत: जैविक खेती करते हैं उनका कहना है कि गेंहू की फसल में कुल 4,000 रुपए एवं सोयाबीन की फसल में 3500 रुपए की प्रति एकड़ लागत शुरू से लेकर अंत तक आती है। यदि किसान जैविक खेती अपनाता है तो 1500 रुपए के लगभग गेंहू एवं 1000 रूपये के लगभग सोयाबीन की लागत बच जाती है जो कि रसायन एवं कीटनाशक पर खर्च होता है। जैविक खेती के बारे में ही होशंगाबाद जिले के रोहना गाँव के रूपसिंह राजपूत बताते है की हमारे खेतों की जमीन में से छोटे छोटे जीव जन्तु नष्ट हो गए हैं यदि जीव जन्तुओं की मात्रा जमीन में बढ़ जाए तो जमीन की उर्वरकता एवं उत्पादन दोनों ही बढ़ जाएँगें।जिन जीव जन्तुओं के पोषण रूपसिंह खेत में जीवामृत डालते हैं। यह जीवामृत वे 10 किलो गोबर, 10 लीटर गोमूत्र, 2 किलो गुड़ 2 किलो कोई भी दलहन एवं 1 किलो बड़ के पेड़ की मिट्टी 200 लीटर पानी में मिलाकर घोल तैयार करते हैं। घोल 7-8 दिन पुराना होने के बाद जब खेत में पानी होता है तब थोड़ा थोड़ा जीव अमृत मुख्य नाली से डालते हैं। रूपसिंह का मानना है कि इस जीवामृत का प्रयोग किसान करे तो उत्पादन एवं फसल को देखकर ही अन्तर साफ नजर आता है आपकी 8 एकड़ जमीन में आप इसी जीवामृत का प्रयोग करते है। आपने एक एकड़ खेत में 1200 केले पेड़ लगाये है जिसमें पिछले 1 वर्ष से जीवामृत का प्रयोग कर रहे है। आपका मानना है कि जीवामृत कम लागत का खाद है एवं इस एक वर्ष में आपने हजारों रुपए बचाया है जो कि रासायनिक खाद पर खर्च होता। केले की फसल के उत्पादन के बारे में आपका कहना है कि 1200 पेड़ में यदि 1 पेड़ से 100 रुपये का केला बिकता हैं तो 1,20,000 के केले बिकेगें जो कि 1 एकड़ जमीन में कोई भी फसल नहीं बिकती है। रूपसिंह भाई बताते हैं की केले की फसल एक बार लगाने पर तीन बार फल देती हैे। अभी तक 14 माह में आपने एक एकड़ में 35,000 रूपये की लागत लगा चुके हैं। जीवामृत के प्रयोग से आप खाद बनाने में काफी सरलता महसूस करते हैं यह जीवामृत आपने खैरी गाँव के कृषक सर्वज्ञ दीवान एवं जिन्वान्या गाँव के किसान अशोक खोरे के यहाँ भ्रमण कर सीखा
खैरी गाँव के सर्वज्ञ दीवान तो हमेशा ही जैविक खेती के प्रयोगधर्मी किसान रहे हैं आप नाडेप, कच्चा नाडेप, वर्मीकम्पोस्ट जीवामृत कल्चर आदि खाद का प्रयोग घर बनाकर तो करते ही हैं साथ ही गाय, बैल के मरने के बाद उसे बाहर न फेंककर जमीन में गाड़ देते हैं जिसके ऊपर से नमक एवं गोबर डाल देते है। आपका कहना है कि 6 माह बाद बहुत ही अच्छा खाद इससे तैयार हो जाता है। यह खाद एक एकड़ जमीन के लिये पर्याप्त है। जिसमें गौ समाधी बनी जगह को खोदकर खेत में डाल देते है।
हो6ांगाबाद जिले के एक अन्य गांव पलासडोह के किसान उमाशंकर शर्मा का कहना है कि यदि जमीन में कंचुये की मात्रा रहती है तो कच्चा नाडेप बनाने में भी केंचुये इसे वर्मी कम्पोस्ट बना देते हैं। आप खेती में वर्मीकम्पोस्ट, नाडेप एवं गोबर गैस स्लेरी का प्रयोग करते है।जैविक खेती के मुद्दे पर कृषि विस्तार अधिकारी श्री आरक़ेदीक्षित का कहना है कि किसानों ने जमीन का स्वास्थ्य खराब कर दिया है । इसके स्वास्थ्य खराब करने में नरवाई में आग लगानाअधिक पानी देना, अधिक उर्वरक डालना अधिक बोनी आदि शामिल हैं। आपका कहना है कि जिस जमीन पर र्इंट का भट्टा लगता है वहाँ पर 5 साल तक कोई पेड़ पौधा नहीं ऊंगता है। हमारी खेती में हम प्रतिवर्ष आग लगाकर धीमा जहर दे रहे हैं। किसान भाईयों को नरवाई मे आग लगाने का काम बिल्कुल बंद कर देना चाहिये। उर्वरक की मात्रा तो किसान भाई प्रतिवर्ष बढ़ा रहे हैं परन्तु किसी प्रकार का जैविक खाद नहीं डाल रहे हैं। जो किसान जैविक खाद डालते है उनका अनुपात बहुत ही कम है आपका कहना है कि खेतों में लोग पानी खेतों में खोलकर घर आ जाते है। पानी खेतों में बहता रहता है एवं फसल को अधिक पानी मिलता है यह भी ठीक नहीं है। बोनी करने के लिये भी किसान ज्यादा मात्रा में बोनी करता है जो कि ठीक नहीं है।
दीक्षित जी का कहना है खेती में गलत तरीकों से खेती करने में कई हानियाँ है जिनमें किसानों को बचना चाहिये एवं जमीन की उर्वरकता बचाये रखने के लिये एवं कम लागत में अच्छा उत्पादन करने के लिये किसान को सही तरीके से खेती करना चाहिये।पिछले कई सालों से रासायनिक खेती के उपयोग से किसान जमीन की उर्वरकता नष्ट करते हुये चले आ रहे हैं। खेती में प्रतिवर्ष उत्पादन लागत बढ़ती ही जा रही है। खेती में लगने वाली सामग्री का मूल्य बढ़ते जा रहा है सांथ ही रासायनिक उर्वरक एवं कीटनाशक का उपयोग भी बढ़ता जा रहा है। ऐसी स्थिति में ऐसे कम ही किसान है जो कि अपनी जमीन की उर्वरकता को बचाये रखे हैं।
आज की खेती की आवश्यकता है कि किसान को खेती की जरूरत भी मेहसूस करना चाहिये। किसान अपनी जरूरत को पूरा करने के लिये जमीन का दोहन करते हुये चला जा रहा है। हालाकि पिछले 4-5 सालों से कई किसान, किसान संगठन एवं संस्थायें (सरकारी एवं गैर सरकारी) जैविक खेती के प्रोत्साहन में लगे हैं। जिसके सार्थक परिणाम भी सामने आ रहे हैं। जरूरत है किसानों की मानसिकता बदलने की।
रामकुमार गौर
नर्मदा कालोनी
ग्वालटोली , होशंगाबाद ४६१००१
मो 098273 41570