खेत-खलियान पर आपका स्‍वागत है - शिवनारायण गौर, भोपाल, मध्‍यप्रदेश e-mail: shivnarayangour@gmail.com
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Saturday, April 23, 2011

वितरण और बर्बादी

अनाज के गोदाम भरे रहने के बावजूद देश के कई इलाकों में भूख से होने वाली मौतों पर सर्वोच्‍च न्‍यायालय की ताजा टिप्‍पणी से एक बार फिर रकारी रीति-नीतियों की कलई खुली है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली में व्‍याप्‍त भ्रष्‍टाचार के मामले में दाखिल एक याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत ने देश को गरीब और अमीर में बांटने के कुत्सित प्रयासों की सख्‍त आोचना की। जजों ने कहा कि एक तरफ हम मजबूत अर्थव्‍यवस्‍था की दुहाई देते हुए खुद को एक शक्तिशाली राष्‍ट्र के रूप में उभरने का दावा करते हैं, दूसरी ओर कुपोषण और भूख के कारण लोगों के मरने की खबरें अक्‍सर आती रहती हैं। दरअसल, कुपोषण और गरीबी से निपटने का पूरा नजरिया ही विरोधाभासी है। जब भी खाद्य पदार्थों की आसमान छूती कीमतों के मद्देनजर अनाज की उपलब्‍धता को लेकर सवाल उठाए जाते हैं, सरकार दावा करती है कि खाद्यान्‍न की कमी नहीं है, गोदाम भरे पड़े हैं। मगर सवाल है कि वह आम लोगों की पहुंच या बहुत ारे गरीबों की खरीद क्षमता से बाहर क्‍यों होता जा रहा है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के रूप में रिाती दर पर अनाज खरीदने की जो एकमात्र ुविधा बची हुई है उे भी खुद रकार की ओर से लगातार कमजोर करने की कोशिश की जा रही है। एक तरफ गोदाम में अनाज सड़ रहा होता है, वहीं बेहद गरीब इलाकों में लोगों को एक वक्‍त का भोजन मिलना भी दूभर है। भूख स ेहोने वाली मौतों की खबरें आने के बाद उन्‍हें बीमारी के कारण हुई मौत बताकर संबंधित अधिकारी अपना पल्‍ला झाड़ लेते हैं।

पिछले साल अगस्‍त में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा था कि अगर सरकार अनाज को सड़ने से नहीं बचा सकती तो वह उसे गरीबों के बीच मुफ्त बांट दे। लेकिन समस्‍या पर काबू पाने के बजाय रकार इका हल मीडिया और अदालातों में पिफ इस रूप में पेश करती है कि देश में गरीबों की ंख्‍या में कमी आई है1 मलन, योजना आयोग ने एक बार फिर अपनी ताजा रपट में बताया है कि गरीबों की तादाद में पांच फीसद से ज्‍यादा की कमी दर्ज की गई है। और अब यह आंकड़ा गिर कर बत्‍ती फीद पर आ गया है। इ पर अदालत ने पूछा कि 1991 की जनंख्‍या के आधार पर 2011 में गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करने वाले परिवारों की संख्‍या त करने के क्‍या पैमाने हैं। हाल ही में अदालत ने यह कहते हुए रकार को आड़े हाथों लिया था कि आज ग्रामीण इलाकों में बारह रुपए और शहरों में सत्रह रुपए रोजाना आय को गरीबी रखा के निर्धारण का पैमाना बनाने को कैसे वाजिब ठहराया जा सकता है। विडंबना ह है कि एक ओर राज्‍यों के हलफनामों में गरीबी रेखा से नीचे के यानी बीपीएल परिवारों की तादाद में बढ़ोत्‍तरी की बात कही जाती हैं और दूसरी ओर योजना आयोग फरमान जारी करता है कि राज्‍य इनकी संख्‍या छत्‍तीस फीसद के नीचे रखें। गरीबों की दशा में सुधार के लिए आय के स्रोत मुहैया कराने और सार्वजनिक वितरण प्रणाली की गड़बडि़यों को दुरुस्‍त करने के बजाय ऐेसे फरमान क्‍या समस्‍याओं से निपटने में अपनी अक्षमता छिपाने की कोशिश नहीं हैं ? यह समझना मुश्किल है कि जो काम सरकारों को खुद संजीदगी से निपटाने चाहिए उनके लिए अदालतों से बार-बार फटकार मिलने के बाद भी उनकी नींद क्‍यों नहीं खुलती!

साभार: सम्‍पादकीय जनसत्‍ता

Monday, April 6, 2009

हारवेस्टर की देन नरवाई की आग

होशंगाबाद जिले के गोलगांव के खेतों में पिछले दिनों लगी आग से 40 किलोमीटर के खेत जल गए। गेहूं को काटने के बाद खेत में छूटा गेहूं का निचला हिस्सा जिसे नरवाई कहते हैं, में लगी इस आग से छोटे-बड़े सैकड़ों झाड़-पेड़ जल गए। आग हवा के साथ फैलती गई और बीच में आने वाले कई गांवों से होती हुई आगे बढ़ गई। सिचाई पंपों और ट्रेक्टर से खेत को बखरने वाली एक मशीन कल्टीवेटर के सहारे गांवों को जलने से बचा लिया गया। खेत में आग लगने की ये पहली घटना नहीं है बल्कि यह इन दिनों अमूमन पूरे मध्य प्रदेश के गेहूं की खेती वाले इलाके की आम घटना हो गई है। हर साल कुछ गांवाेंं और जानवरों का जलना सामान्य-सी बात है। इस साल तो एक व्यक्ति के भी होशंगाबाद जिले में जलने की खबर भी अखबारों के अन्दर के पन्नों पर छपी। मसलन अब नरवाई से लगने वाली खेतों की आग बड़ा रूप लेने लगी है।
गौरतलब है कि खेतों में आग लगाने की ये घटनाएं पिछले दशेक सालों में बढ़ना शुरू हुई हैं। तीन साल पहले से तो सरकार ने भी इन घटनाओं को गम्भीरता से लिया है। अब स्थानीय प्रशासन हर साल निर्देश जारी करता है कि नरवाई में आग नहीं लगाई जाए। यदि आग लगाने वाले के बारे में जानकारी मिले तो फिर सरकार कानूनी कार्यवाही करने की बात भी करती है। किन्तु असल में ये मुद्दा इतना आसान नहीं हैं। एक बात तो यह है कि आग लगाने वाले की तलाश करना लोहे के चने चबाना जैसा है। जिस खेत से आग लगी है केवल उसके बलबूते इस बात को तय नहीं किया जा सकता है कि आग किसने लगाई है। वैसे तो ये आग खेत की नरवाई को जलाने के लिए लगाई जाती है लेकिन जब खेत में आग लगती है तो केवल नरवाई ही नहीं जलती बल्कि इससे उस जगह पर आने वाले तमाम जीव-जन्तु, पक्षी और यहां तक की जमीन तक जल जाती है। खेती के जानकार कहते हैं कि खेतों की आग के कारण जमीन की उर्वरा शक्ति को बढ़ाने वाले जीवाणु दम तोड़ रहे हैं। यही नहीं इससे वातावरण भी प्रदूषित हो रहा है।
यदि असली समस्या की जड़ को पहचानने की कोशिश की जाए तो असल में खेती में आधुनिक मशीनों का उपयोग इसका एक बड़ा कारण दिखाई देता है। हार्वेस्टर के विकास ने इस समस्या को बढ़ाया हैं। पहले जब गेहूं की फसल को हाथों से काटा जाता था तब तो नरवाई का केवल चार पांच इंच का बहुत छोटा हिस्सा जमीन में रहता था जो कि बखरनी के समय खत्म हो जाता था। इसे अलग से हटाने की जरूरत नहीं होती थी। लेकिन हार्वेस्टर से कटाई के कारण नरवाई का एक बड़ा भाग, तकरीबन दस से बारह इंच का जमीन में छूट जाता है। इस बड़े भाग के कारण खेतों को बखरना आसान नहीं होता इसलिए इस समस्या से निजात पाने के लिए किसान इस नरवाई को जला देता है। जब इसमें आग लगाई जाती है तो उसे नियंत्रित करना मुश्किल काम होता है। इसका अच्छा खासा उदाहरण गोलगांव में लगी आग है जो कि चालीस किलोमीटर तक फैल गई। केवल नरवाई की आग का ही मसला नहीं है असल में हार्वेस्टर की कटाई ने जानवरों के लिए उपलब्ध होने वाले भुसे का संकट भी पैदा किया है। चूंकि जिस नरवाई से भुसा बनता था उसे अब जमीन में छोड़ना पड़ रहा है। आजकल एक नई भुसे बनाने की मशीन को भी इजाद किया गया है जिसका इस्तेमाल खेती में किया जा रहा है। किन्तु नरवाई की समस्या का समाधान इस मशीन से भी पूरी तरह से सम्भव नहीं हैं। असल में एक तो हर किसान इस मशीन का उपयोग नहीं करता और दूसरा इसका खर्चा अलग से लगता है।
फसल चक्र में आया बदलाव भी आग का एक बड़ा कारण है। दरअसल पहले मिश्रित खेती की जाती थी। इससे आग लगने का खतरा कम रहता था। यदि आग लगती भी थी तो एक खेत से दूसरे खेत में आग लगने का कोई खतरा नहीं रहता था। परन्तु वर्तमान समय में एकल खेती करने के कारण रबी के सीजन में चारों तरफ गेंहू ही गेंहू नजर आता है। कटाई के बाद किसान को सबसे अच्छा तरीका नरवाई में आग लगाना ही सूझता है।
मशीन का अंधाधुन्ध इस्तेमाल कई समस्याओं को पैदा कर रहा है ऐसे में इस पर विचार करने की आवश्यकता है कि मशीन का कितना व कैसा उपयोग किया जाए। मशीनों के निर्माण के काम में लगे लोग प्रयोग करके देखकर नई मशीनों को तैयार करें तो इस तरह के भावी संकट से बचा जा सकता है। किसानों को भी इस दिशा में सोचना चाहिए कि अपनी जमीन की उर्वरा शक्ति को नष्ट होने और पर्यावरण को कैसे प्रदूषित होने से कैसे बचाया जाए?
शिवनारायण गौर

गर्मी के दिनों में ग्रामीण इलाकों की एक बड़ी खबर आग लगने की घटनाओं की होती है। इन दिनों खेतों में गेहूं की नरवाई में आग लगाना आम बात है और इससे कई तरह की विकराल समस्‍याएं पैदा हो रही हैं। खेत खलियान की ओर से शिवनारायण गौर

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Friday, January 30, 2009

समर्थन मूल्य की घोषणा

केन्द्र सरकार ने गत 29 जनवरी को रबी फसलों के न्युनतम समर्थन मूल्य घोषित कर दिए। कुछ फसलों के समर्थन मूल्य में वृध्दि की गई है। जैसे गेहूं का समर्थन मूल्य 1000 रुपए से बढ़ाकर 1080 रुपए प्रति क्विंटल कर दिया गया है। इसी तरह चने के मूल्य में वृध्दि की गई है। अब चना 1600 के बजाय 1730 रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से खरीदे जाएंगें। कुछ और फसलों के दाम भी बढ़ाए गए हैं। सरकार ने जान बूझकर या अनजाने में इस साल काफी देरी से समर्थन मूल्य की घोषणा की है। यदि आपको याद हो तो पिछले साल अक्टूबर के महिने में सरकार ने समर्थन मूल्य की घोषणा कर दी थी। खैर देर से ही सही थोड़ी बढ़ोत्तरी के साथ मूल्यों की घोषणा की गई है।
पिछले साल जब गेहूं का समर्थन मूल्य घोषित किया गया था तो इसमें 250 रुपए की वृध्दि की गई थी। 750 से बढ़ाकर 1000 रुपए समर्थन मूल्य किया गया था। असल में किसान की एक बड़ी समस्या फसलों का उचित दाम नहीं मिलना है। स्वयं सरकार इस बात को स्वीकार करती है कि उत्पादन लागत से कम समर्थन मूल्य दिया जा रहा है। यदि समर्थन मूल्य को नियंत्रण में रखना है तो कम से इस बात की ओर तो ध्यान दिया ही जाना चाहिए कि उत्पादन लागत को कैसे कम किया जा सकता है। आज स्थिति है कि फसलों की उत्पादन लागत लगातार बढ़ रही है। उत्पादन में ठहराव आते जा रहा है। एक समय में पंजाब में खूब उत्पादन हुआ लेकिन अब वहां हालात ठीक नहीं है जमीन अपनी उर्वरा शक्ति खो चुकी है। किसान परेशान हैं। अब दूसरे कई राज्यों में भी वैसी ही स्थिति बनने की नौबत आ रही है। यदि हम मध्यप्रदेश की बात करें तो वहां भी लागत में अनवरत वृध्दि जारी है। बात केवल गेहूं की ही नहीं हर फसल के साथ यह हो रहा है।
कई देशों में किसानों को सब्सिडी सीधे दी जाती है जिससे वे अपनी उत्पादन लागत पर नियंत्रण रख सकें लेकिन भारत में तो वह भी सम्भव नहीं है यहां जो भी सब्सिडी मिलती है वो कम्पनियों को दी जाती है जिसका सीधा फायदा किसानों को नहीं मिलता और उत्पादन लागत पर कोई नियंत्रण नहीं हो पाता। यह एक गम्भीर मसला है जिस पर खेती का भविष्य टिका हुआ है। हमें सामूहिक रूप से इस पर विचार करना चाहिए।
किसान को फसल के उत्पादन का उचित मूल्य मिले यह एक गम्भीर मसला है इस पर गहन चिन्तन की ज़रूरत है। सवाल यह भी है कि वास्तविक लागत का आंकलन करने के लिए किसानों को प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। आमतौर पर किसान उत्पादन लागत में उसके श्रम और जमीन के मूल्य को कभी नहीं जोड़ता। होशंगाबाद जिले में कार्यरत एक स्वयं सेवी संस्था ग्राम सेवा समिति ने इस दिशा मेें एक पहल की थी उसने किसानों से फसल के उत्पादन की लागत निकालने के लिए सर्वे और प्रशिक्षण दोंनो किए थे। इसका कुछ प्रभाव क्षेत्र के किसानों में दिखाई भी दिया। पर ऐसे काम को व्यापक स्तर पर किए जाने की आवश्यकता है।
शिवनारायण गौर

हर साल सरकार कोई 25 फसलों के समर्थन मूल्य घोषित करती है। सरकार का उद्देश्य किसानों को उचित दाम दिलाना और लोगों को नियंत्रित दामों पर खाद्यान्न उपलब्ध कराना है। पर यदि किसानों को लागत से कम मूल्य मिलता है तो यह चिन्तनीय है। इस पर सोचा जाना चाहिए।

Thursday, December 13, 2007

गेहूं की अवहेलना


भारत में गेहूं का उत्पादन लगभग 75 मिलिसल टन होता है। भारत का स्थान पूरे विश्व में गेहूं उत्पादन के क्षेत्र में द्वितीय है। साथ ही चीन के बाद भारत गेहूं का सबसे बड़ाा उपभोक्ता भी है। 1960 में शुरू हुई हरित क्रांति के बाद गेहूं के मामले में हम किसी हद तक आत्मनिर्भर बने थे। परंतु जनसंख्या की वृध्दि 2 प्रतिशत प्रतिवर्ष रही जिसके कारण खाद्यान्न की जरूरत साल दर साल बढ़ती गई। 1980-81 के बाद खाद्यान्न फसलों के क्षेत्र में वृध्दि रूक गई बल्कि खाद्यान्न के अलावा अन्य नकदी फसलों की पैदावार के कारण खाद्यान्न फसलों का क्षेत्र प्रतिवर्ष घटता गया। यह ठीक है कि 1950-51 में देश का खाद्यान्न उत्पादन 522 किलो प्रति हेक्टेयर था जो 1999-2000 में बढ़कर 1704 किलो प्रति हेक्टेयर तक पहुंच गया।
देश की कृषि भूमि के 65 प्रतिशत हिस्से में खाद्यान्न फसलें होती हैं। जहां तक गेहूं का सवाल है इसका फसली क्षेत्र 35 प्रतिशत है। देश के दक्षिणी इलाकों मं गेहूं का उत्पादन नगण्य है। उत्तरप्रदेश, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और मध्यप्रदेश गेहं उत्पादन के प्रमुख प्रदेश हैं। इके अलावा गुजरात और बिहार के कुछ इलाकों में गेहूं पैदा किया जाता है।
पैदावार के आंकड़ों का विश्लेषण किया जाए तो गेहूं के उत्पादन में प्रतिवर्ष गिरावट आ रही है जो कि चिंता का विषय है। जहां पंजाब और हरियाणा में गेहूं का उत्पादन 3660 किलो प्रति हेक्टेयर होता है वहीं मध्यप्रदेश मध्यप्रदेश और बिहार में 1625 किलो प्रति हेक्टेयर का औसत उत्पादन होता है। उत्पादन की इस खाई को पाटने के लिए सरकार के पास कोई ठोस नीति भी नहीं है और न ही शोध की कोई उपयुक्त व्यवस्था। इस वर्ष देश में 6 मिलियन टन गेहूं का उत्पादन कम हुआ है जिसके कारण उपभोक्ताओं को अधिक मूल्य पर गेहूं खरीदना पड़ रहा है।
भारत सरकार ने विभिन्न खाद्यान्न फसलों और उनके उत्पादन को नियंत्रित करने, सहायता देने और कीमतों में स्थिरता लाने के मद्देनजर कृषि मूल्य और लागत आयोग, भारतीय खाद्य निगम, खाद्यान्न वितरण विभाग की स्थापना की थी। करीब 4 लाख उचित मूल्य की दुकानें सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत स्थापित की गई। वितरण और संग्रह की प्रणाली काफी दोषपूर्ण रही है क्योंकि गेहूं का बड़ा हिस्सा पंजाब और हरियाणा से क्रय किया जाता है। परन्तु इसका वितरण पूरे देश में होता है। संग्रह का खर्च और वितरण के व्यवस्थागत खर्च में भौगोलिक विरोधाभास होने के कारण सार्वजनिक वितरण प्रणाली कारगर साबित नहीं हुई है। ऐसी स्थिति में निजी क्षेत्र और व्यापारियों को लूट की काफी छूट मिली।
गेहूं के व्यापार का नियंत्रण अधिकतम 30 प्रतिशत सरकार के द्वारा होता रहा है परन्तु 70 प्रतिशत गेहूं का व्यापार निजी कंपनियों और व्यापारियों द्वारा होता है। चालू वर्ष में तो लगभग 95 प्रतिशत गेहूं निजी कंपनियों और व्यापारियों द्वारा खरीदा गया। गेहूं जो खाद्यान्न सुरक्षा में चावल के बाद दूसरे स्थान पर आता है, का व्यापार पूरी तरह से निजी कम्पनियों को सौंप देना कहां तक उचित है? गांव व शहरों के मजदूर तथा छोटे किसान गेहूं को खुले बाजार से खरीदते हैं। इस साल खुले बाजार में गेहूं की कीमत 1200 रुपए प्रति क्विंटल रही। राशन की दुकानों से पर्याप्त गेहूं न मिलने के कारण भी लोग बाजार पर निर्भर हैं।
केन्द्र सरकार द्वारा घोषित समर्थन मूल्य का पूरा ढांचा ही विवादास्पद है। आमतौर से पंजाब, हरियाणा के किसानों के उत्पादन के आंकड़ों के आधार पर समर्थन मूल्य घोषित होते हैं। भारत सरकार महंगी कीमत पर गेहूं का आयात तो कर सकती है परंतु देश के अंदर किसानों को उचित मूल्य देने में आनाकानी करती है। इस बार अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूं की कीमतें स्थानीय बाजार से काफी अधिक रहीं। अत्यावश्यक वस्तु कानून में ढिलाई देने के कारण भी गेहूं की जमाखोरी हुई। इस समय निजी गोदामों में भारी मात्रा में गेहूं है परंतु बाजार में इसकी उपलब्धता महंगे दामों पर है। एक प्रकार से नकली संकट भी पैदा किया गया है। गेहूं का आयात कहां से किया जाए-आस्ट्रेलिया से या अमेरिका से। इसको लेकर भी राजनैतिक दांवपेंच चलता रहता है। अमेरिकन कंपिनयों का अप्रत्यक्ष दबाव है कि गेहूं केवल उन्हीं से खरीदा जाए। यह भी पता चला हे कि जिस आस्ट्रेलियन कंपनी से भारत गेहूं आयात किया वही कंपनी भारत से गेहूं का निर्यात करती है।
गेहूं के आयात से 1125 अरब रुपए की विदेशी मुद्रा का बोझ सरकारी खजाने पर पड़ेगा। इन सब विसंगतियों को देखते हुए गेहूं पर एक ठोस नीति बनाने की जरूरत है तब ही हमारी खाद्यान्न सुरक्षा बरकरार रह सकती है।