खेत-खलियान पर आपका स्‍वागत है - शिवनारायण गौर, भोपाल, मध्‍यप्रदेश e-mail: shivnarayangour@gmail.com

Tuesday, December 11, 2007

खुदरा बाज़ार में बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ

शिवनारायण गौर

करीब दो साल पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने वर्ल्ड इकॉनॉमिक फोरम की बैठक को सम्बोधित करते हुए कहा था कि यदि हम आर्थिक सम्भावनाओं को साकार करने में कामयाब नहीं हुए तो इतिहास हमें माफ नहीं करेगा। उनका कहना था कि नीतियों के स्तर पर हमें कठोर निर्णय लेने होंगे। नए रोजगार के अवसर सृजित करने के लिए विदेशी निवेश ज़रूरी है। खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश की ओर भी उन्होंने इशारा किया था। और तब से ही बिना इसके नफा नुकसान को जाने तमाम तरह के निवेशों का रास्ता खोला जा रहा है। हाल ही में वित्तमंत्री ने तीन सौ अरब डालर के खुदरा बाज़ार को बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिए खोलने की घोषणा की है।
उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों जब रिलायंस कम्पनी ने खुदरा व्यापार में शुरुआत की तो इसका काफी विरोध हुआ। इस विरोध की झलक से लोगाें के आक्रोश को सहजता से देखा जा सकता था। उड़ीसा और मध्यप्रदेश में रिलायंस फ्रेश के विरोध ने उग्र रूप धारण कर लिया। यही नहीं खुदरा व्यापार को बचाने के लिए देशभर के छोटे व्यापारी विरोध के लिए लामबंद हुए। इन सब दबावों के चलते मध्यप्रदेश सरकार ने एग्री बिजनेस मीट में खुदरा व्यापार में बड़ी कम्पनियों को सीधे दरवाजे से प्रवेश न देने की घोषणा की। यह अलग बात है कि भोपाल में ही अंतत: रिलायंस की ये सब्जी की दुकाने बिना तामझाम के खुल गईं और ग्राहकों को रिझाने की कोशिश में लगी हुई हैं।
वित्तमंत्री का खुदरा व्यापार में तीन सौ अरब डालर के निवेश को हरी झण्डी दिखाना असल में कम्पनियों को नए सिरे से प्रवेश का न्योता नहीं है बल्कि जो कुछ भारत में हो रहा है उसे और ज्यादा व्यापाक पैमाने पर करने की मंसा प्रतीत होती है। क्योंकि भारत में बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ खुदरा व्यापार में पहले से ही आ चुकी हैं। भारती, बिग बाज़ार, री बोक, फ्युचर ग्रुप, रिलायंस, एबोनी, पैटलून और सुभिक्षा जैसी बड़ी कम्पनियां खुदरा व्यापार में लगी हुई हैं। यही नहीं बाल-मार्ट और डेल-मोंटे आदि भी बाजार में भारी निवेश करके हावी हो रही हैं। दरअसल भारत ऐशिया का दूसरा बड़ा बाज़ार है। चीन के बाद यही वह देश है जहां 12 लाख करोड़ रुपए का सालाना बाज़ार होता है।
एक अनुमान के मुताबिक भारत का खुदरा व्यापार 180 बिलियन डालर का है जो देश के घरेलू उत्पाद का लगभग दस फीसद है। देश भर में करीबन एक करोड़ पचास लाख छोटी दुकाने हैं जिन्हें परिवार के लोग चलाकर गुजर बसर करते हैं। शायद यह एक बड़ा कारण है कि यहां तमाम देशी-विदेशी बड़ी कम्पनियां अपनी पैठ जमाना चाहती हैं। सरकार का एक ही नारा होता है कि इनके आने से रोजगार के अवसर पैदा होंगे। पर इसके पीछे की सच्चाई को जानने या दबावों के चलते जान बूझकर अनजान बनने की कोशिश की जाती है। हालात यह है कि आज छोटे व्यापारी बाज़ार से लुप्त होकर मज़दूर बनते जा रहे हैं। और आगे की स्थिति इससे भी बदतर होगी। छोटे-छोटे दुकानकार कभी भी विशालकाय कम्पनियों का मुकाबला नहीं कर पाएंगें और अंतत: वे इस प्रतिस्पर्धा में मात खाकर बाज़ार से बाहर हो जाएंगें। रिसर्च फाउंडेशन फार साइंस टेक्नोलॉजी एंड इकोलॉजी 'नवदान्य' का ताजा अध्ययन भी इस ओर इशारा करता है। इस अध्ययन में कहा गया है कि सुपर मार्केट चेन और खुदरा बाजार में बड़ी कम्पनियों के प्रवेश से न केवल सब्जी, फल बेचने वाले बल्कि रेहड़ी पटरी कारोबार से जुड़े लगभग 3.8 करोड़ लोग तबाही की कगार पर पहुंच गए हैं। अध्ययन में कहा गया है कि खुदरा क्षेत्र से लगभग चार करोड़ लोग जुड़े हुए हैं और देश में कुल रोजगार में इस क्षेत्र से जुड़े लोगों का हिस्सा लगभग 8 फीसदी तथा कुल जनसंख्या का 4 फीसदी है। एक ओर तो देश में गरीबी, अशिक्षा व बेराजगारी की समस्या है वहीं दूसरी ओर खुदरा क्षेत्र में बड़ी व बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के प्रवेश से देश के 65 करोड़ किसानों व खुदरा क्षेत्र से जुड़े लोगों के रोजगार पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ेगा।
नवदान्य संस्था की अध्यक्ष वंदना शिवा कहती हैं कि खुदरा क्षेत्र में प्रवेश करने वाली ये बहुरारष्ट्रीय कम्पनियां अपने स्टोरों के जरिए लोगों को लुभावनी छूट देकर अपने जाल में फंसा रही है और इससे छोटे खुदरा कारोबारी तथा रेहड़ी पटरी वालों का कारोबार बर्बाद हो रहा है। कनफेडरेशन आफ आल इंडिया ट्रेडर्स के महामंत्री प्रवीन खण्डेलवाल कहते हैं कि शुरुआत में ये कंपनियां अपने विशाल संसाधनों के बूते बाजार में स्थानीय व्यापारियों की प्रतिस्पर्धा को खत्म करने में जुटी हैं और कम दामों पर अपना सामान बेच रही हैं और जब उन्हें प्रतिस्पर्धा देने वाला कोई नहीं रहेगा तो वे मनमाने दामों पर अपना सामान बेचकर मुनाफा कमाएंगी।
जो कम्पनियां आज खुदरा क्षेत्र में आ रही हैं उनमें से कई तो सीधे अपने फार्म बनाने के लिए जमीन भी खरीद रही हैं। केरल सरीखे प्रगतिशील सोच वाले राज्य में रिलायंस कम्पनी जमीन खरीदने के लिए पूरे राज्य में चक्कर लगा रही है। इस कम्पनी ने केरल में सभी प्रकार के मसाले किसानों से सीधे खरीदकर अपने शोरूमों के ज़रिए बेचने की तैयारी की है। मध्यप्रदेश में भोपाल से करीब 65 किलोमीटर दूर बुदनी नाम की जगह में कुछ बड़ी कम्पनियों ने सैकड़ों एकड़ जमीन खरीद ली है। इस उपजाउ खेतीहर जमीन का इस्तेमाल अब गैर खेतीहर कार्यो के लिए किया जा रहा है। बड़े बड़े कारखाने बनाने की तैयारियां चल रही हैं।
कम्पनियों के प्रवेश की यह प्रक्रिया दिन व दिन तेज होते जा रही है। इन कम्पनियों की कार्यप्रणाली की यदि सामान्य व्यापार से तुलना करें तो निश्चित ही ये कम्पनियां छोटे छोटे व्यापारियों का जल्दी ही सफाया कर देगीं। फिलहाल असल में ग्राहकों रिझाना भी उनके निवेश का ही हिस्सा है। जब दूसरे छोटे व्यापारी बाजार से खत्म हो जाएंगे तब वे अपनी मनमानी करके न केवल फायदा उठाएंगी बल्कि उपभोक्ताओं का शोषण भी होगा। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को भारत के उपभोक्ताओं की मनोवैज्ञानिक स्थिति का पूरा अन्दाजा है इसलिए वे क्रमश: बाजार पर नियंत्रण की तैयारी में लगी हुई हैं। गौरतलब है कि भारत में अभी ऐसा कोई कानून भी नहीं है जो उपभोक्ताओं के हित को ध्यान में रखते हुए वस्तुओं के मूल्यनिर्धारण के लिए किसी कम्पनी को बाध्य करे। यह एक ऐसा हथियार है जिससे कम्पनियों द्वारा तय किए जाने वाले मूल्य पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं होगा। वे बाजार को नियंत्रित करने की क्षमता भी रखती हैं। वे चाहें तो किसानों से सीधे उत्पाद खरीदकर मण्डी में उत्पाद की आवक को ही रोक सकती हैं। यानी कुल मिलाकर बाजी कम्पनियों के ही हाथ में है।
सरकार ने कम्पनियों के खुदरा व्यापार में प्रवेश को स्वीकृति तो दे दी है लेकिन उनपर नियंत्रण के लिए कोई कानूनी तैयारी नहीं की है। वस्तुत: इससे भविष्य में संकट पैदा हो सकता है। जिस रोजगार के अवसरों की दुहाई देकर उनके प्रवेश का रास्ता आसान बनाया जा रहा है स्थिति उसके विपरीत भी बन सकती है। देश में बेरोजगारी और अपराध के बढ़ने की स्थितियां निर्मित हो सकती हैं। सरकार यदि वास्तव में जनहित में सोचती है तो उसे अपने इस तरह के फैसले पर अंकुश लगाने की महती ज़रूरत है।

ई मेल shivnarayangour@gmail.com

2 comments:

संजय तिवारी said...

टिप्पणियों से अंदाज लग जाना चाहिए कि हमारा पढ़ा-लिखा समाज कितना संवेदनशील है इस मुद्दे पर.

बाल किशन said...

"हालात यह है कि आज छोटे व्यापारी बाज़ार से लुप्त होकर मज़दूर बनते जा रहे हैं। और आगे की स्थिति इससे भी बदतर होगी। छोटे-छोटे दुकानकार कभी भी विशालकाय कम्पनियों का मुकाबला नहीं कर पाएंगें और अंतत: वे इस प्रतिस्पर्धा में मात खाकर बाज़ार से बाहर हो जाएंगें।"
नतीजा
"जिस रोजगार के अवसरों की दुहाई देकर उनके प्रवेश का रास्ता आसान बनाया जा रहा है स्थिति उसके विपरीत भी बन सकती है। देश में बेरोजगारी और अपराध के बढ़ने की स्थितियां निर्मित हो सकती हैं। सरकार यदि वास्तव में जनहित में सोचती है तो उसे अपने इस तरह के फैसले पर अंकुश लगाने की महती ज़रूरत है। "

मैं समर्थन करता हूँ आपकी बात का.
यही सब देखकर लगता है कि हमलोग गूंगे, अंधे और बहरे समाज मे रह रहे है.