खेत-खलियान पर आपका स्‍वागत है - शिवनारायण गौर, भोपाल, मध्‍यप्रदेश e-mail: shivnarayangour@gmail.com

Friday, January 11, 2008

किसानों की फिक्र किसे है

वेद प्रकाश अरोड़ा

सकल घरेलू उत्पाद के तीन घटकों - उद्योग, कृषि और सेवा-क्षेत्रों में जहां उद्योग और खासकर सेवा-क्षेत्र की प्रगति पर देश नाज कर सकता है, वहीं कृषि-क्षेत्र की उत्पादकता में ठहराव चिंताजनक है। भारत के आजाद होने के समय सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का हिस्सा उनहत्तर प्रतिशत था जो घटते घटते बीस प्रतिशत के आसपास रह गया है, लेकिन सेवा क्षेत्र ने पिछले चार पांच वर्षों में बावन प्रतिशत से अधिक योगदान कर नया कीर्तिमान स्थापित किया है। भारत सभ्यता के झुटपुटे से ही कृषि प्रधान देश रहा है। तो भी आज हमारी कृषि गर्दिश में है, क्योंकि कृषि उत्पादन का चार प्रतिशत के लक्षित स्तर तक पहुंचना एक टेढ़ी खीर बना हुआ है।
सभी उपायों और प्रोत्साहनों के बावजूद कृषि उत्पादन दो प्रतिशत के कुछ ऊपर या तीन प्रतिशत पहुंचते पहुंचते थक कर ढीली सांसें लेने लगता है। इस स्थिति से उबरने के लिए साठ के दशक में कृषि क्रांति के जनक माने गए एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में गठित राष्ट्रीय किसान आयोग ने वर्तमान राष्ट्रीय कृषि नीति में संशोधन कर उसे प्रभावशाली बनाने का प्रयास किया है। कृषक सेवा और कृषि सुरक्षा शीर्षक से आई आयोग की रिपोर्ट का जोर इस बात पर है कि ग्रामीण भारत के लिए जो भी योजना बनाई जाए, उसमें किसान की खुशी और खुशहाली को सर्वोच्च प्राथमिकता देना हमारा पहला प्रयत्न होना चाहिए। खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने और अनाज में देश की आत्मनिर्भरता के लिए कृषक और कृषि के प्रति दृष्टिकोण और मन:स्थिति में व्यापक बदलाव लाना होगा। किसान सुखी होगा तो कृषि उत्पादन भी बढ़ेगा, किसान दुखी होगा तो कृषि चौपट हो जाएगी।
रिपोर्ट के दस प्रमुख उद्देश्यों का अध्ययन करें या फिर उसके विभिन्न प्रस्तावों और सिफारिशों पर नजर डालें तो सभी में इस बात पर जोर दिया गया है कि खेतों में उपज बढ़ना या फसलों का लहलहाना ही काफी नहीं, किसानों के चेहरों पर अमिट मुस्कान लाना उससे भी अधिक आवश्यक है। खेती शरीर है तो किसान उसका प्राण। दस्तावेज में दी गई सिफारिशें, प्रस्ताव और समाधान देश की आधी से अधिक जनसंख्या वाले किसानों की पीड़ा, दयनीय स्थिति, उमंगों-अरमानों और हितों को केन्द्र में रख कर तैयार किए गए हैं। बताया गया है कि अनेक योजनाओं के क्रियान्वयन और सुविधाओं के विस्तार के बावजूद किसानों की आय इतनी नहीं कि वे पारिवारिक, सामाजिक और पारंपरिक दायित्वों और अपने रोजमर्या के खर्चों को पूरा करते हुए कुछ बचा जुटा ले और सुख चैन की जिन्दगी बसर कर सकें। कारण अनेक हैं। लेकिन मुख्य कारण है कृषि उत्पादन की तुलना में जनसंख्या और परिवार के सदस्यों का अधिक तेजी और अनुपात में बढ़ना। दूसरी तरफ कृषि भूमि का पीढ़ी दर पीढ़ी अधिक सन्तानों में बंटते जाना, फलस्वरूप आय के घटते-घटते जोतों का अलाभकारी होते जाना और इस तंगहाली से निकलने के लिए साहूकारों के शिकंजे में फंसते जाना।
आज स्थिति यह है कि ग्रामीण परिवारों में लगभग साढ़े ग्यारह प्रतिशत के पास कोई कृषि भूमि नहीं है और साठ प्रतिशत से भी अधिक परिवारों के पास एक एकड़ से भी कम भूमि है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन की रिपोर्ट में बताया गया है कि पिछले दस वर्षों के दौरान देहात में प्रति परिवार औसतन लगभग सत्ताईस प्रतिशत कृषि भूमि घट गई है। वैसे भी खेती नींद हराम कर देने वाला धंधा है। न दिन में जैन, न रात को आराम। वर्ष में कभी एक दो दिन भी मूसला धार वर्षो हो जाए, ओले पड़ जाएं, तेज तूफान आ जाए या फिर सूखा पड़ जाए तो साल भर तो क्या बरसों की मेहनत खाक हो जाती है। तब मोटा अनाज तक मिलने के लाले पड़ जाते हैं। यों भी प्रति व्यक्ति जोत कम हो जाने से बेराजगारी बढ़ती जा रही है। क्या यह गंभीर चिंता का विषय नहीं है कि 1993-94 से लेकर 1999 तक कृषि क्षेत्र में रोजगार के अवसर घटते घटते सिर्फ 0.2 प्रतिशत रह गए हैं।
स्वाधीनता प्राप्ति के साथ ही अर्थतंत्र में कृषि और कृषकों की महत्ता स्वीकारते हुए कृषि अनुसंधान, शिक्षा और विस्तार कार्यक्रमों के साथ साथ बीजों, उर्वरकों, हलों, कटाई मशीनों और बिजली आदि की वृध्दि के लिए अनेक कदम उठाए गए। सिंचाई की छोटी-बड़ी योजनाएं भी हाथ में ली गईं। हमारे कृषि वैज्ञानिकों ने अंतरराष्ट्रीय भागीदारी और सहयोग से गेहूं, चावल, मकई, ज्वार और बाजरा की ऐसी संकर किस्में विकसित कीं जो अधिक उपज और अधिक आय देने वाली थीं। नतीजतन, 1968 में उत्पादकता ओर उत्पादन का अनुपात जनसंख्या वृध्दि के अनुपात से अधिक होने लगा। यहीं से हरित क्रांति के युग का सूत्रपात हुआ और कृषि क्षेत्र ने उन्नति की राह पर तेज डग भरते हुए नए कीर्तिमान स्थापित किए। लेकिन आज उत्पादकता दो प्रतिशत के आसपास ही चक्कर काट रही है।
दूसरी हरित क्रांति लाने के लिए रिपोर्ट में दिए गए दस बड़े उद्देश्यों में किसानों की आर्थिंक स्थिति में सुधार को सर्वोच्चता दी गई है। कहा गया है कि किसानों की न्यूनतम विशुध्द आय बढ़ाई जाएं, आजीविका सुरक्षित की जाए, भूमि सुधारों का अधूरा एजेंडा पूरा किया जाए, किसानों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान की जाए, उनकी आजीविका के लिए सहायक सेवाएं शुरू की जाएं, प्रमुख कृषि उत्पादकता और लाभकारिता में वृध्दि के लिए भूमि, जल जैव-विविधता और जलवायु संसाधनों की रक्षा की जाए और उन्हें सुधारा जाए।
एमएस स्वामीनाथन सभी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य इस ढंग से निर्धारित करने के पक्ष में हैं कि यह मूल उत्पादन की औसत लागत से पचास प्रतिशत अधिक हो। वे चाहते हैं कि खुश्क, बंजर और कम पेड़ पौधों वाले इलाकों में ही विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाए जाएं और वहीं वृहद औद्योगिक परियोजनाएं शुरू की जाएं। कृषि प्रधान भूमि कृषि कार्यो के लिए ही सुरक्षित रखी जाए। राष्ट्रीय किसान आयोग कृषि को समवर्ती सूची में शामिल करने के पक्ष में है ताकि केन्द्र की कृषि से जुड़ी व्यापार, वित्त और निवेश की वृहद नीतियों और राज्यों की कृषि विकास नीतियों के बीच अधिक तालमेल हो सके। इससे अधिक निवेश के लिए तरसती खेती का चिरकाल सपना भी साकार हो सकेगा।
आयोग का विचार है कि कृषि और उद्योग के बीच चोली दामन का रिश्ता है, वे एक दूसरे के दुश्मन नहीं, पूरक हैं। वक्त की मांग है कि वे एक दूसरे का सहारा बनें। सकल घरेलू उत्पाद और निर्यात में प्रसंस्कृत कृषि उत्पादों की भागीदारी बढ़ाने के लिए आवश्यक है कि भूमि अधिग्रहण कानून की समीक्षा कर उसे अधिक कृषि और कृषक उन्मुख बनाया जाए। जमीन अधिग्रहीत करने के लिए मुआवजा नियम उदार बनाए जाएं और भूमिहीन कृषकों को खेती के लिए जमीन दी जाए। इसके अलावा देश की कृषि संबंधी व्यापार नीति, कृषक परिवारों की आर्थिक उन्नति और उनकी आजीविका सुरक्षा पर आधारित हो। इसके लिए अपना भाररतीय व्यापार संगठन बनाना अत्यंत आवश्यक है। किसानों की आय और परिसंपत्ति बढ़ाने के लिए आयोग की रिपोर्ट में कृषि के अंग के रूप में और उसे संबल प्रदान करने के उद्देश्य से पशु संपदा बढ़ाने पर जोर दिया गया है। वैसे भी भेड़ बकरियां, गाय, बैल और भैंसे आदि किसानों की आजीविका का दूसरा बड़ा साधन हैं। इतना ही नहीं, कृषि के सकल घरेलू उत्पाद में भी पशुधन का हिस्सा छब्बीस प्रतिशत रहता है।
राष्ट्रीय किसान आयोग का कहना है कि दूसरी हरित क्रांति खुश्क भूमि और वर्षों पर निर्भर भूमि में व्यापक और व्यवस्थित उत्पादन से आएगी। इसके अलावा हरित क्रांति के हृदय स्थल यानी पंजाब, हरियाणा ओर पश्चिमी उत्तरप्रदेश में कृषि के अधिक विकास के साथ साथ बिहार, आसाम, और पश्चिम बंगाल सहित पूर्वी भारत की विशाल अनछुई भूमि और उपेक्षित उत्पादन कर इस क्रांति को लाने में योगदान करना होगा। इसके साथ ही यह व्यवस्था करनी होगी कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली और खाद्य सुरक्षा भण्डारों का विस्तार कर उनके दायरे में नए इलाके और नई फसलें (विशेष रूप से जौ, ज्वार और दालें) भी शामिल की जाएं
आयोग का विचार है कि वितरण प्रणाली और खाद्यान्न भण्डारों के लिए अनाजों की खरीद सरकारी हाथ में होनी चाहिए। रिपोर्ट में सुझाया गया है कि किसानों को दिए जाने वाले कर्जों पर चार प्रतिशत ब्याज लिया जाए और इसके लिए अगर आवश्यक हो तो सरकार बैंकों को आर्थिक सहायता दे सकती है। सूखे से ग्रस्त होने वाले क्षेत्रों में फसल ऋणों का भुगतान चार पांच वर्षों में करने की छूट भी दी जा सकती है। राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक यानी नाबार्ड को सिानों का राष्ट्रीय बैंक बना दिया जाए और उसके कार्य क्षेत्र, भूमिका और कामकाजी मॉडल पर नए सिरे से विचार किया जाए। रिपोर्ट में कृषि के लिए एक अलग पानी नीति की सिफारिश की गई है ंअधिक उत्पादन और उत्पादकता के लिए फसलों की सिंचाई में भूगर्भीय पानी की निरन्तर बढ़ती कमी गम्भीर चिंता का विषय बनता जा रहा है। इसलिए नदियाें, नहरों, कुओं, तालाबों और जोहड़ों आदि के पानी का कुशल प्रबंधन अब निहायत जरूरी हो गया है। गांवों में पानी बराबर और न्यायसंगत मात्रा में उपलब्ध कराने के लिए पानी पंचायतें कारगर भूमिका निभा सकती हैं। साथ ही वर्षा के पानी का संग्रह यानी वाटर हारवेस्टिंग के जरिए भूजल की भराई से देश भर में पानी की कमी के बढ़ते संकट के समाधार में सहायता मिलेगी।
हमें नहीं भूलना चाहिए कि किसानी कभी सबसे उत्तम धन्धा मानी जाती थी, स्वयं साबरमती आश्रम का संत एक किसान के रूप में अपनी पहचान बनाना बेहतर समझता था। वर्ष 1927 में बंगलूर के राष्ट्रीय डेरी अनुसंधान संस्थान की अतिथि पुस्तिका पर हस्ताक्षर करते समय गांधी जी ने अपनी यह पसन्द बताई थी। वे भूखे के लिए खेती को भगवान मानते थे। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू कहते थे कि अन्य सब कामों के लिए इंतजार हो सकता है, कृषि के लिए नहीं हमें गांधीजी के इस विश्वास पर खरा उतरना होगा कि देश अपने किसानों की पहवाह और अधिक चिंता करेगा।
एमएस स्वामीनाथन के प्रस्ताव कमान कर किसानों को सस्ता ऋण दिया जाए, कृषि इतर वस्तुओं के बाजार मूल्य के अनुसार कृषि उत्पादों की कीमत देकर कृषि को मुनाफे वाला व्यवसाय बना दिया जाए, किसान परक भूमि सुधार किए जाएं, किसानों के लिए व्यापक राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा योजना लागू की जाए, कृषि में अधिक पूंजी निविेश हो और कृषि को समवर्ती सूची में शामिल कर लिया जाए तो कोई वजह नहीं कि सिकानों की आत्महत्याओं का सिलसिला समाप्त न हो और कृषि की विकास दर चार प्रतिशत के लक्षित स्तर को भी पार न कर जाए।

(साभार: युवा संवाद, जनवरी 2008)

1 comment:

महेंद्र मिश्रा said...

आपके विचारो से सहमत हूँ बढ़िया आलेख