खेत-खलियान पर आपका स्‍वागत है - शिवनारायण गौर, भोपाल, मध्‍यप्रदेश e-mail: shivnarayangour@gmail.com
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Friday, January 1, 2016

किसान की गर‍िमा

खेती की बात आते ही हमारे मन में एक गांव की तस्वीर बनने लगती है। बैलगाड़ी, लहलहाती फसल नज़र आने लगती है। एक तथाकथ‍ित सभ्य समाज खेतीहर लोगों को थोड़ा फर्क किस्म से देखने लगता है। मसलन एक कम पढ़ा-लिखा, सिर पर एक गमछा बांधा हुए व्यक्ति‍ की अवधारणा बना लेता है। दिक्कत यह है कि उसे बराबरी का दर्जा दिया जा सके, ऐसी छबि बिरले ही आती होगी। 

कभी इस बात का आंकलन भी नहीं होता कि जिस सिर पर गमछा या अँगोछा ओड़े व्यक्त‍ि की अवधारणा आपके जेहन में बन रही है, हमारा जीवन उसकी बदौलत ही चल रहा है। हमारे हर खाने-पीने, ओड़ने-बिछाने की सामग्री उसके सौजन्य से ही प्राप्त हो रही है। यानी मसला है कि उसकी गरिमा के बारे में हम लगभग नहीं ही सोचते हैं। एक तबका नए साल का स्वागत करने में खूब खर्चा कर रहा है। बड़ी बड़ी होटलों में पार्टी चल रही हो जिसके एक दिन पार्टी में एक किसान के परिवार के दो-तीन माह या उससे भी ज्यादा का गुज़ारा चल सकता था। वहीं यदि हम देखें तो इस समय वही किसान खेती के संघर्षपूर्ण काम में जुटा है। और यदि वह न जुटा हो तो केवल पैसे से जीवन का संचालन कर पाना सम्भव ही नहीं है। 

क्या नए साल के इस जश्न के साथ हम उस मेहनतकश को कम से कम गरिमा के साथ स्वीकार कर सकेंगे। यदि हमारी नज़र में उसका सम्मान जागता है तो इतना भी पर्याप्त है, क्योंकि इस सम्मान के चलते हम उसे अपने जीवन में जगह दे पाएंगे। 

तो नए साल 2016 की आप सभी को ढेर सारी शुभकामनाएं !!!

श‍िवनारायण गौर,
भोपाल 1 जनवरी, 2016

Wednesday, October 1, 2014

बगैर जुते खेत ठंडक पैदा करते हैं



प्रोसीडिंग्‍स ऑफ नेशनल एकेडमी आफसाइन्‍सेज़ में प्रकाशित एक शोध पत्र में बताया गया है कि यदि खेत में जुताई न की जाए तो फसल क्षेत्र के आसपास के तापमान में 2 डिग्री सेल्सियस तक की कमी आती है। एक प्रकार की प्राकृतिक खेती में बीज बोने से पहले खेत की जुताई नहीं की जाती।
यह अध्‍ययन स्विस फेडरल इंस्‍टीट्यूटआफ टेक्‍नॉजॉली की जलवायु विशेषज्ञ सोनिया सेनेविरत्‍ने और उनके साथियों ने फ्रांस के दक्षिण-पूर्व में स्थित प्रोवेंस क्षेत्र में किया है।
आमातोर पर गैर-जुताई खेती इसलिए अपनाई जाती है ताकि भूक्षरण कम से कम हो। जब खेत में जुताई नहीं की जाती और पिछली फसल के अवशेषों को वहीं छोड़ दिया जाता है तो मिट्टी में नमी बनी रहती है। मगर पानी के वाष्‍पन की वजह से मिट्टी का तापमान भी कम होता है। मगर हाल के अध्‍ययन से पता चलता है कि बिना जुते खेतों के आसपास का तापमान अपेक्षाकृत कम रहता है।
सेनेविरत्‍ने का कहना है कि बिना जुते खेतों का तापमान कम रहने का कारण यह है कि ऐसे खेत धूप को ज्‍यादा मात्रा में परावर्तित कर देते हैं। इसे एल्‍बीडो प्रभाव कहते हैं। उन्‍होंने पाया कि गर्मी के महीनों में बगैर जुते खेत सामान्‍य खेतों की अपेक्षा 50 प्रतिशत ज्‍यादा परावर्तक होते हैं।
पहले किए गए अध्‍ययनों में पता चला था कि यह ठंडक बहुत अधिक नहीं होती है। मगर सेनेविरत्‍ने और उनके साथियों के अध्‍ययन से पता चलता है कि ठंडक का असर गर्मियों के महीनों में और वह भी सबसे गर्म दिनों में सबसे ज्‍यादा होता है। उन्‍होंने पाया कि साल भर का औसत देखेंगे तो बिना जुते खेतों का तापमान अन्‍य खेतों की अपेक्षा मात्र 1 डिग्री सेल्सियस कम रहता है मगर यदि कर्मी के सबसे कर्म दिनों का तापमान 1.6 डिग्री सेल्सियस तक कम रहता है। शोधकर्ताओं के मुताबिक दक्षिणी यूरोप में तो 2 डिग्री सेल्सियस तक का फर्क पड़ सकता है।
शोधकर्ताओं के मुताबिक होता यह है कि आम दिनों में धूप के कारण तापमान बढ़ता है और मिट्टी से पानी के वाष्‍पन की वजह से कम होता है। चूँकि जुते हुए खेतों में वाष्‍पन अधिक होता है इसलिए दोनों तरह के खेतों में तापमान में अंतर ज्‍यादा नहीं होता। मगर बहुत गर्म ‍दिनों में धूप और उसके परावर्तन काअसर हावी हो जात है और इन परिस्‍थतियों में बिना जुते खेत जयादा धूप को परावर्तित करके अपेक्षाकृत ठंडे बने रहते हैं।
इस अध्‍ययन से तो लगता है कि जितने बड़े क्षेत्र में गैर-जुताई खेती की जाएगी, तापमान को कम रखने में उतनी ही मदद मिलेगी। और नमी बनाए रखने व भूमि-क्षरण रोकने जैसे अन्‍य फायदे तो हैं ही। (स्रोत फीचर्स से)

Tuesday, February 17, 2009

किसान को नहीं लुभाता बजट

वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने अपने भाषण में किसानों को असली नायक बताया। किसानों के लिए बजट में कुछ प्रावधान रखते हुए उन्होंने ये बात कही। हालाँकि यह अलग बात है कि केवल इसी साल कोई नई बात नहीं कही है। सरकार समय समय पर किसानों के लिए ऐसे उद्बोधन करती रहती है जिसमें उन्हें कई तरह की उपमाएं दी जाती है। लेकिन असल में केवल उपमाओं के भरोसे बजट को किसान हितैषी नहीं कहा जा सकता। जब उसके अन्य पहलुओं को देंखे तो लगता है कि यह बजट भी हर साल प्रस्तुत किए जाने वाले बजटों की भांति ही किसानों के लिए है।
इस साल के बजट में प्रमुख रूप से दो बातों की ध्यान दिया गया है। एक तो किसानों के लिए ऋण की राशि बढ़ाई गई है। और दूसरा उर्वरकों पर दी जाने वाली सब्सिडी की राशि में बढ़ोत्तरी की गई है। इसके अलावा बजट में जो प्रावधान किए गए हैं वो किसान को उतना प्रभावित नहीं करते। कर्ज की राशि में पिछले 2003-2004 के आबंटन की तुलना में तीन गुना वृद्धि कर 25 लाख करोड़ किया गया है। सरकार का कहना है कि सीमान्त और छोटे किसानों के 65,500 रुपयों की कर्जमाफी की है। गौरतलब है कि जब भी किसानों के हित की बात होती है तो उसके लिए सस्ती दर पर ऋण उपलब्ध करा देने को आसान का समाधान माना जाता है। और बजट में फिर उसी तरह के प्रावधान किए जाते हैं। असल में इस देश में सरकारी ऋण प्राप्त करने वाले किसानों से कहीं ज्यादा ऐसे किसानों की है जो कि साहूकारों से कर्ज लेते हैं। उन्हें किसी भी तरह की छूट का लाभ नहीं मिलता। और इससे भी फर्क किस्म की बात पर तटस्थता से विचार नहीं किया जाता कि असल में खेती घाटे का सौदा क्यों हो रही है? किसान को हर साल ऋण की आव6यकता क्यों होती है? यदि इनके कारणों को तलाशें तो आप पाएंगे कि असल में सरकार फसलों को वाजिब मूल्य दे पाने में असमर्थ है। उत्पादन लागत लगातार बढ़ते जा रही है। लागत को कम करने का प्रावधान कभी बजट में दिखाई नहीं देता।
केवल गेहूं की ही बात करें तो सरकार का आर्थिक सर्वेक्षण इस बात को स्वीकार करता है कि गेहूं की कीमत लागत से कम दी जा रही है। पंजाब, उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश के अलावा भी कई राज्य घाटे में गेहूं की खेती कर रहे हैं। इस साल 1080 रुपए समर्थन मूल्य तक किया गया है लेकिन एक आंकलन के मुताबिक यदि गेहूं का समर्थन मूल्य 1500 रुपए होता है तो किसानों को कुछ राहत हो सकती है। मसलन केवल ऋण की राशि बढ़ा देने से खेती का उपकार नहीं किया जा सकता। सरकार जिन 25 फसलों का समर्थन मूल्य घोषित करती है वह पर्याप्त नहीं होता। उसमें जो वृद्धि की जाती है वो लागत की तुलना में हमेशा कम ही होती है।
सरकार जोर शोर से कृषि विकास दर की बात करती है। बजट भाषण में भी इस बात का जिक्र किया गया कि यह 37 प्रति6ात रही। लेकिन असल में इस विकास दर का असली आधार नकदी फसलें हैं। और जब भी कृषि विकास दबढ़ाने की बात कही जाती है तो उसका सीधा सा मतलब है कि सरकार नकदी फसलों को और प्रोत्साहित करने की कोशिश कर रही है। पिछले पांच साल में नकदी फसलों का रकबा बढ़ा है। ये ही ऐसी फसलें है जिनमें कीटनाशकों और उर्वरकों को खूब इस्तेमाल किया जा रहा है। मसलन सब्सिडी भी नकदी फसलों की ओर ही जा रही है। नकदी फसलों की ही देर किसानों की आत्महत्या दर में भी वृद्धि है। ज्यादातर किसान आत्महत्या की घटनाएं नकदी फसल के क्षेत्रों में होती हैं। चाहे बात कर्नाटक, आन्धप्रदेश की हो या फिर महाराष्ट्र के विदर्भ इलाके की। मध्यप्रदेश में भी अब किसानों की आत्महत्याओं की खबरें यदा कदा आने लगीं हैं। एक जानकारी के मुताबिक पिछले साल तक मध्यप्रदेश में 1287 किसानों ने आत्महत्याएं की हैं। केवल सस्ती दरों पर ऋण उपलब्ध करा देने से इस समस्या का समाधान नहीं तलाश जा सकता जिसकी कोशिश प्रणव मुखर्जी कर रहे हैं।
उल्लेखनीय है कि सरकार का बजट हमेशा कार्पोरेट को बढ़ावा देने वाला होता है। सरकार ने खेती के मॉडल कानून बनाया है। इसमें प्रमुख रूप से खेती के कार्पोरेट के हाथों में जाने के रास्ते दिखाई देते हैं। मॉडल कानून के मुताबिक प्रदेश सरकारें भी मण्डी कानून में बदलाव कर रही है जिससे संविदा खेती आदि को बढ़ावा दिया जा सके। पिछले पांच साल में इसकी एक झलक आसानी से देखी जा सकती है। विरोधाभाष ये भी है कि एक तरफ रोजगार गारण्टी योजना के राशि बढ़ाई जा रही है दूसरी तरफ स्थाई रोजगार पैदा करने के लिए जरूरी खेती के वास्तविक विकास की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। कार्पोरेट खेती के चलते मजदूरों के रोजगार की सम्भावनाएं खेती में खत्म होती जा रही है। और इसके वगैर स्थाई रोजगार की बहुत सम्भावनाएं नहीं की जा सकती। खेती का असल में विकास करना है तो बजट को किसानों के हित में हाना ही चाहिए। जो असल में नहीं है।

शिवनारायण गौर


हर साल सरकार बजट बनाती है किसानों को बेचारा बनाने की कोशिश की जाती है परन्‍तु असल में किसानों के विकास की वास्‍तिवक योजनाएं नहीं बनती। इस दिशा में प्रयास किया जाना चाहिए। खेत खलियान की ओर से शिवनारायण गौर

Friday, October 10, 2008

कृषि क्षेत्र में भी अमरीका का प्रवेश

2006 से ही भारत अमरीका परमाणु करार पर बहस होती रही है। पर एक महत्‍वपूर्ण करार पर आवश्‍यक रू‍प से विचार नहीं किया गया जिस पर उसी समय दोनों देश के बीच हस्‍ताक्षर कर दिए गए। वह है कृषि शिक्षा, अनुसंधान, सेवा तथा वाणिज्यिक लिंकेज (अनुबंध) से संबंधित भारत अमरिका ज्ञान पहलकदी (केआईए)।

इस समझौते में यह व्‍यवस्‍था की गई है कि क्रष्ज्ञि अनुसंधान के क्षेत्र में निजी खिलाड़ियों की मुख्‍य भूमिका होगी जो भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ( आईसीएआर) तथा राज्‍य स्‍तरीय कृषि विश्‍वविद्यालयों में भावी प्राथमिकताओं का निर्धारण करेंगे। 2006 की संयुक्‍त घोषणा ने सार्वजनिक निजी भागीदारी का दर्शन प्रस्‍तुत किया, जहां निजी क्षेत्र अनुसंधान क्षेत्रों की पहचान करने में मदद देंगे जिनके पास दोनों देशों में कृषि विकास के लिए नई तथा वाणिज्यिक य्‍प से अक्षम टेक्‍नॉलॉजी को विकसित करने की क्षमता है।

एक मुकाम तय की गई भारतीय कृषि ो एक व्‍यावसायिक दिशा की ओर बढ़ना है जहां अमरीका की अधिकाधिक घुसपैठ होगी। इसके लिए यह आवश्‍यक होगा कि सार्वजनिक क्षेत्र के अनुसंधान क्षेत्रों में भी प्रवेश किया जाए। न केवल अनुसंधान के पुनर्निमाण के वास्‍ते वैज्ञानिक विशेषज्ञता के लिए दिशा-निर्देश भी दिया जाएगा जैसा कि उद्योग की मांग होगी, बल्कि किसानों के खेतों पर भी उसे लागू करने की बात कही जा रही है। विशाल भारतीय कृषि अनुसंधान व्‍यवस्‍था और उसके विस्‍तार सेवा नेटवर्क ने पहले ही फ्रेमवर्क प्रदान कर दिया है।

अनेक तरह से यह कोई नई वास्‍तवकिता नहीं है। अमरीकी तथा अन्‍य कार्पोरेट हितों ने इस नई किस्‍म की हरित क्रांति को प्रायोजित किया है। कृषि से संबंधित ज्ञान पहलकदमी (केआईए) जैसी पहलकदमी भारतीय कृषि को नया रूप देने में निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ाएगी।

केआईए अपने उद्देश्‍य को पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। इसके कार्यकलापों में शामिल हैं बायो टेक्‍नालॉजी के क्षेत्रों में इंटर्नशिप या भारती-वालमार्ट जैसे सहयोग के जरिए उसमें प्रवेश करना। अप्रैल 2008 में पिछली बैठक ने छात्रों के लिए सार्वजनिक निजी इंटर्नशिप की छानबीन करने के लिए एक दिश-निर्देश तय किया। बाया-टेक्‍नॉलोजी के सिलसिले में एक अरहर तूर जेनोमिक्‍स पहलकदमी की स्‍थापना की है। और चावल तथा गेहूँ पर सहयोग अनुसंधान प्रोजेक्‍ट संगठित किया है। उसने तेजपत्‍ता, पपीता, केला तथा आलू के संबंध में अनुसंधान प्रोजेक्‍ट को भी बढ़ावा दिया है।

जब कृषि प्रोसेसिंग और विपणन के क्षेत्र को गति प्रदान करने की बात आती है तो केआईए ठेका फार्मिंग तथा मूल्‍य वर्धित उत्‍पादों पर जोर देती है। जैव-ईंधन की अगली पीढ़ी पर फोकस भी इस कार्य क्षेत्र का एक महत्‍वतपूर्ण क्षेत्र है।

लेकिन इस सबके आधार पर ही सवाल किया जा रहा है् अब कृषि को नई दिशा देने की रणनीति में छोटे तथा सीमांत किसानों को एकदम किनारे कर दिया गया है। कृषि अनुसंधान के परिवर्तित चेहरे एवं किसान नव परिवर्तन को कोई जगह नहीं दी गई है, जिसने एक साफ सन्‍देश दिया है। जरूरत इस बात की है कि अनुसंधान को किसानोन्‍मुख बनाया जाए और उसे वैज्ञानिकों की सहायता दी जाए न कि उसे राजनैतिक रूप दिया जाए।

इसके साथ ही यह द्रष्टिकोण ऐसा है जो अनुसंधान को संस्‍थागत रूप नहीं देता। इसका नतीजा होगा कि अंततोगत्‍वा अनुसंधान संस्‍थानों को संस्‍थागत ढॉंचे से अनुसंधान पर अपने नियंत्रण को छोड़ना पड़ेगा। जाहिर है कि इस समझैते पर भी बहस होनी चाहिए।

"कांची कोहली एवं शांलिनी भूटानी द्वारा लिखित यह लेख साप्‍ताहिक मुक्तिसंघर्ष के 28 सितम्‍बर से 4 अक्‍टूबर 2008 के अंक में छपा है। यह एक महत्‍वपूर्ण मुद्दा है जिस पर कम जानकारी उपलब्‍ध है। यदि आप इस विषय में कुछ जानकारी रखते हैं तो इस मुद्दे पर समझ बनाने के लिए अपनी राय दें। बहस को आगे बढ़ाऍं - शिवनारायण गौर

Thursday, September 25, 2008

मध्यप्रदेश राज्य कृषक कल्याण आयोग ने दिए कृषि विकास के सुझाव

कृषि व इससे संबसंधित आधारभूत संरचनाओं के विकास की सबसे ज्यादा अहमियत देने की सलाह देते हुए मध्यप्रदेश राज्य कृषक कल्याण आयोग ने कहा है कि इसके लिए सरकार को उपलब्ध संसाधनों व योजनाओं की समीक्षा करना चाहिए।
एक जानकारी के मुताबिक राज्य को भेजे सुझावों में राज्य कृषक कल्याण आयोग ने कहा हे कि केवल खेती किसानी और संबंधित व्यवसायों की संभावनाएं ही किसानों को खेती की ओर आकर्षित कर सकती हैं। इसके लिए जरूरी है कि खेती को निरंतर रोजगार की संभावना वाला बनाया जाए। सुझावों में यह भी कहा गया है कि कृषि स्नातकों के लिए इस तरह का पैकेज होना चाहिए कि वे अपनी विशेषज्ञता के फायदे संपर्क सीमा में आने वाले क्षेत्र के दूसरे किसानों को भी पहुंचा सकें।
कृषि व संबंधित विभागों की योजनाओं के लक्ष्यों में संबंधित फसल का क्षेत्र विस्तार या इसी तरह के बिंदु रहते हैं। सभी योजनाओं का क्रियान्वयन किसान आधारित एकीकृत परियोजना के मुताबिक होना चाहिए। कृषि सेवा केंद्र और कृषि क्लीनिक जैसी सेवाओं को कृषि स्नपातकों के लिए आरक्षित कर उनका ज्यादा से ज्यादा विस्तार करने की जरूरत है।
राज्य कृषक कल्याण आयोग ने राज्य सरकार को भेजे सुझावों में कहा हे कि भू जल के संवर्धन, नलकूपों के सुधार, बिजली सहायक और टे्रक्टरों की मरम्मत आदि के लिए शिक्षित युवकों को ज्यादा से ज्यादा प्रशिक्षण्ा दिया जाए और केमिस्टों की तरह कृषि इनपुट दुकान खोलने के लिए भी कृषि स्नातकों की योग्यता अनिवार्य की जानी चाहिए। सरकार को कृषि स्नातकों को कृषि उपकरणों के निर्माण और विपणन से जोड़ने की पहल करनी चाहिए। इन उपकरणों के उन्नयन और विकास की अनुसंधानकारी पहल और विभागीग योजनाओं के क्रियान्वयन, सर्वेक्षण, मूल्यांकन व प्रश्िािक्षण जैसे कार्यों से भी कृषि स्नातकों को जोड़ना जरूरी है। शिक्षित व कृषि स्नातक युवकों को उनकी योग्यता और रुचि के मुताबिक विधाओं में संलग्न कर ग्रामीण क्षेत्रों में उनका सघन नेटवर्क कायम किया जाए।
आयोग ने राज्य सरकार से अपेक्षा की है कि वेयरहाउस, ग्रेडिंग यूनिट और कोल्ड स्टोरेज जैसी सुविधाएं उत्पादन क्षेत्रों के पास ही होनी चाहिए जिससे किसानों को इससे ज्यादा से ज्यादा फायदा मिल सके। खेती के व्यावसायिक और वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन के लिए इन इकाइयों की स्थापना में उद्योगपतियों के बजाए शिक्षित किसान युवकों को प्राथमिकता देकर विशेष पैकेज दिया जाए। आयोग प्रारंभिक शिक्षा की कक्षाओं में विशेषकर विज्ञान व पर्यावरण की पाठयपुस्तकों में खेती किसानी को लेकर दी गई वैज्ञानिक जानकारी बहुत उपयोगी मानता है। आयोग ने इसकी लगातार समीक्षा और इस क्षेत्र में होने वाले नए नए अनुसंधानों व खोजों को भी इसमें शामिल करनी की सलाह दी है। उच्चतर माध्यमिक विद्यालय स्तर पर कृषि विषय यको केवल अच्छे अंक प्राप्त करने का साधन मानने की बजाए राज्य सरकार को इसकी सार्थक शिक्षा पर बल देने की जरूरत है। इस समय माध्यमिक शिक्षा मंडल की मान्यताओं व नियमों में कृषि विषय का अलग से कोई उल्लेख नहीं है जबकि इसे आवश्यक तौर पर शामिल करना चाहिए। आयोग ने अपने सुझावों में कहा हे कि खेती किसानी के लिए विशिष्ट प्रयोगशालाएं और कृषि प्रक्षेत्र स्थापित करने चाहिए। विपणन की तार्किक, उन्नत, वैज्ञानिक और शोषणविहीन व्यवस्था युवकों को कृषि की ओर जोड़ने में मददगार होगी। इसके अलावा कृषि उपज आधारित उद्योग को अपने प्रदायकर्ता उत्पादकों के लिए प्रेरक की भूमिका निभानी चाहिए।

Thursday, September 11, 2008

संकट की खेती

एशिया की खाद्य सुरक्षा की स्थिति दो देशों के उदाहरण से समझी जा सकती है। पहला, फिलीपीन जहां खाद्य सुरक्षा बुरी तरह टूट चुकी है। दूसरा देश चीन है जहां खाद्य सुरक्षा को काफी मजबूत रखा गया है, पर ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि अगर कुछ महत्वपूर्ण कमियों की ओर ध्यान नहीं दिया गया तो भविष्य में गंभीर समस्याएं उत्पन्न हो सकती है। फिलीपीन की मुख्य फसल चावल है। और यह देश कुछ वर्ष पहले तक चावल उत्पादन में आत्मनिर्भर था। अब यह विश्व का सबसे अधिक चावल आयात करने वाला देश बन चुका है।
पिछले तीन दशकों के दौरान अंतरराष्ट्रीय वित्त संस्थाओं की ओर से विदेशी कर्ज वापसी की बड़ी किस्तें जमा करने और जरूरी घरेलू खर्च को कम करने के लिए फिलीपीन पर बहुत दबाव डाला गया। कृषि की प्रगति और किसानों की सहायता के अनेक सरकारी कार्यक्रम ठप्प हो गए या उनमें काफी कटौती हुई। किसानों की कठिनाइयां बढ़ गईं और पैदावार कम होने लगी। इसी दौरान विश्व व्यापार संगठन के नियमों के अंतर्गत फिलीपीन आयातों से संख्यात्मक प्रतिबंध हटाने और आयात शुल्क कम करने के लिए दबाव बनाया गया। इस कारण चावल के अतिरिक्त मक्के की खेती, सब्जी उत्पादन, मुर्गी पालन आदि पर भी प्रतिकूल असर पड़ा।
दूसरी ओर चीन ने चावल, गेहूं मक्का जैसे मुख्य खाद्यान्नों में आत्मनिर्भरता बनाए रखी है। लेकिन अपने यहां भोजन की सबसे महत्वपूर्ण फसल सोयाबीन के मामले में वह मार खा गया और आयात पर उसकी निर्भरता काफी बढ़ गईं। विश्व व्यापार संगठन से हुई वार्ता के दौरान चीन सोयाबीन पर आयात शुल्क तीन प्रतिशत तक कम करने को राजी हो गया। इसके बाद वह सोयाबीन का सबसे बड़ा आयातक बन गया। इसका चीन के सोयाबीन किसानों पर बहुत प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।
दूसरी समस्या यह है कि खाद्याान्न और अन्य कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए कई स्थानों पर रासायनिक खाद और कीटनाशकों को अंधाधुंध उपयोग हुआ है जो आगे चलकर समस्याएं पैदा करेगा। सिंचाई की कुछ बड़ी परियोजनाएं भी पर्यावरण के लिए समस्याएं बढ़ाने वाली हैं। तेज औघेगीकरण और शहरीकरण के कारण कृषि क्षेत्र का बड़ा हिस्सा हमेशाा के लिए लुप्त हो गया है। इन सब कारणों से भविष्य में चीन में खाद्य उत्पादन बढ़ाना कठिन हो सकता है।
इसी तरह एशिया के अधिकतर देशों में पहले से खाद्य संकट मौजूद है या उत्पादन बढ़ाने के ऐसे तौर-तरीके अपनाए गए हैं जिनसे भविष्य में खाद्य आवश्यकताओं को पूरा करने में कठिनाई आ सकती है। अंतरराष्ट्रीय वित्त और व्यापार संस्थानों की नियमों और शर्तों के कारण भी इन देशों के जरूरतमंद लोगों की कठिनाइयां बढ़ रही हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियों का तेजी से प्रसार कृषि और खाद्य क्षेत्र के संकट को और उग्र कर रहा है। इन चिंताजनक परिस्थितियों में यह जरूरी है कि एशिया के देश आपस में खाद्य सुरक्षा संबंधी मुद्दों पर सहयोग और सहायता बढ़ाने के प्रयास करें। बहुराष्ट्रीय कंपनियों, धनी देशों और उनके द्वारा नियंत्रित संस्थानों से बातचीत में एशिया के किसानों को अपने हितों की रक्षा के लिए एकजुट होना चाहिए।
दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि कृषि को पर्यावरण की रक्षा से जोड़ने के साथ-साथ टिकाऊ तकनीकों का प्रसार करना चाहिए। गांवों में जल-संरक्षण और हरियाली पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है। इससे वह बुनियाद तैयार होगी जिससे रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर निर्भर हुए बिना ही पर्याप्त खाद्य उत्पादन हो सकेगा। इस प्रयास में कृषि के परंपरागत ज्ञान और परंपरागत बीजों से बहुत मदद मिल सकती है। विशेषकर चावल के मामले में परंपरागत बीजों और धान की बहुत-सी किस्मों की जैव-विविधता का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है।
जब चावल के संदर्भ में सरकार द्वारा बहुप्रचारित हरित क्रांति की विफलता और रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर अत्यधिक निर्भरता हानिकारक सिध्द होने लगी तो देश की इस सबसे महत्वपूर्ण फसल के बारे में चिंतित सरकार को वर्षों से उपेक्षित महान कृषि वैज्ञानिक डॉ. आरएच रिछारिया की याद आई। सन 1983 में इंदिरा गांधी के कार्यकाल में प्रधानमंत्री कार्यालय ने उन्हें चावल का उत्पादन बढ़ाने के लिए एक कार्ययोजना बनाने का आग्रह किया। डॉ. रिछारिया ने एक कार्ययोजना तैयार की, पर इंदिरा गांधी की मृत्यु के बाद यह दस्तावेज उपेक्षित ही रह गया।
इस दस्तावेज में उन्होंने उन कारणों की पहचान की थी, जिनकी वजह से पिछले लगभग बीस वर्षों में खाद, कीटनाशकों, सिचाईं, अनुसंधान, प्रसार आदि पर बहुत खर्चा करने बावजूद उत्पादकता वृध्दि की दर में वांछित तेजी नहीं लाई जा सकी है। उसके बाद उन्होंने मुख्य रूप से तीन भाग में अपनी योजना सामने रखी थी। पहली, चावल का विकास समृध्द देशी जनन द्रव्य पर आधारित होगा, जिनका अन्वेषण और संरक्षण होना चाहिए। दूसरी, एक अति विकेंद्रित प्रसार नीति और तीसरी, कृंतक प्रसार विधि का सुधरी किस्मों के प्रसार के लिए व्यापक स्तर पर उपयोग।
हालांकि यह योजना भारत के संदर्भ में बनाई गई, पर इससे एशिया के कई अन्य देश भी लाभान्वित हो सकते हैं।
भरत डोंगरा

Wednesday, July 23, 2008

पिछले पचास सालों में कृषि क्षेत्र में आए कुछ बड़े परिवर्तन

खेती में यद्यपि तो सतत रूप से विभिन्न बदलाव आते रहे हैं लेकिन यदि आजादी के बाद से हुए बदलावों को सूचीबध्द किया जाए तो कुछ इस तरह का दृश्य सामने आता है। यहां हम प्रमुख रूप से मध्यप्रदेश राज्य की खेती के बारे में जिक्र कर रहे हैं लेकिन कुछ बदलाव तो ऐसे हैं जो कि राष्ट्रीय स्तर पर भी प्रभाव छोड़ने वाले होते हैं। कुछ का असर स्थानीय स्तर पर ज्यादा दिखाई देता है। यह एक मोटी लिस्ट है इसमें कई बातें जोड़ी जा सकती हैं।

1- महिला और खेती:- मशीनीकृत खेती का आरंभ हरितक्रान्ति के दौरान (60 के दशक) शुरू हुआ जिससे महिलाओं के श्रम की अवहेलना हुई और महिालाओं के श्रम के दिन घटे। महिला मजदूरों में बेरोजगारी बढ़ी!
2- आयाकट कार्यक्रम:- आयाकट एक तमिल शब्द है जिसका अर्थ होता है - समग्र और समन्वित। 1974 से होने वाले बड़े बाँधों द्वारा सिंचाई को आयाकट कहा गया। जैसे तवा आयाकट, बारना आयाकट, चम्बल आयाकट आदि। कृषि उत्पादन में जुटे सभी विभागों को एक ही छत के अंतर्गत लाया गया। यद्यपि यह कार्यक्रम सफल नहीं रहा क्योंकि विभिन्न विभागों में आपसी तालमेल नहीं बैठ सका।
3- भूमि सुधार:- जोत की सीमा निर्धारण करने हेतु सिंचित और असिंचित क्षेत्र में भूमि सीलिंग एक्ट शुरू किया गया था। सीलिंग एक्ट में निर्धारित सीमा अधिक भूमि होने पर ऐंसी जमीन राज्य अपने अधिकार में कर लेगा। यद्यपि इस कानून का क्रियान्वयन ठीक से नहीं हो सका।
4- हरित क्रान्ति:- हरित क्रांति 1960 के बाद खाद्यान्न फसलों का स्थान नगदी फसलों ने लिया।
5- मिश्रित खेती:- सिंचाई पूर्व मिश्रित खेती होती थी। एक ही खेत में कई प्रकार की फसलें ली जाती थीं। धीरे-धीरे इसका स्थान एकल फसल चक्र ने ले लिया।
6- गेरूआ पर नियंत्रण:- 1960 के पूर्व गेहूं में लाल और काले गेरूआ रोग का व्यापक तौर से प्रकोप होता था। साठ के दशक में गेहूं अनुसंधार केन्द्र पंवारखेड़ा ने 65 नंबर गेहूं का नया बीज निकाला जो गेरूआ निरोधक था।
7- विपणन:- पूर्व में खरीदी हेतु निजी आढ़तों की व्यवस्था थी। इसमें गोपनीय तरीके से अनाज नीलाम किया जाता था। बाद में सरकार द्वारा नियंत्रित मंडियों की स्थापना हुई इसके लिए मंडी कानून बनाए गए जिसके तहत निर्वाचित पदाधिकारी मंडी का संचालन करते हैं।
8- भूमिहीनता:- नब्बे के दशक से गांवों में भूमिहीनता लगातार बढ़ रही है तथा जोतों का रकबा वर्ष प्रतिवर्ष घट रहा है।
9- कीटनाशक:- 1965 के पूर्व यदा कदा कीटों व इल्लियों को प्रकोप सुनने को आता था। 1965 से व्यापक तौर से कीटनाशक दवाओं का इस्तेमाल शुरू हुआ। इल्ली और कीटों व अन्य रोगों का प्रकोप बढ़ा।
१० दलहन व तिलहन:- 1970 के बाद से तिलहनी और दलहनी फसलों का रकबा हर साल कम होता गया।
11- खरतपवार:- सिंचाई के बाद नए-नए खरपतवार का व्यापक रूप से प्रकोप हुआ। रासायनिक खाद और नए बीजों से खरपतवार बढ़े। (यद्यपि कांस नामक खरपतबार समाप्त हो गया है)
1२ पड़त भूमि:- चारागाह और पड़त भूमि किसानों ने सिंचाई के बाद पड़ती भूमि तोड़ ली और कास्त करना शुरू की। इससे पशु चारे का अभाव हुआ।
13- सोयाबीन:- सोयाबीन से किसानों का मोहभंग हुआ और वैकल्पिक रूप से धान का रकबा क्रमश: बढ़ रहा है।