मध्य प्रदेश के होशंगाबाद ज़िले के बनखड़ी ब्लाक के एक गांव कुर्सीढाना के कृषक अमान सिंह ने अप्रैल के पहले हप्ते में जहरीली दवा पी ली जिससे अमान सिंह की मृत्यु हो गई। अमान सिंह पचास हजार ने 50 हजार का कर्ज सतपुड़ा क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक से एवं करीब एक लाख साहूकारों से ले रखा था। इस वर्ष अमान सिंह के खेतों में 35 क्विंटल गेहूं पैदा हुआ जो अपेक्षा से कहीं कम था। कर्ज की चिन्ता ने अमान को आत्महत्या जैसा निर्णय लेना पड़ा। यही नहीं बनखेड़ी के दो और गांवों के किसानों ने भी आत्महत्या जैसा कठोर कदम उठाने की कोशिश अप्रैल के पहले हप्ते में ही की। इन घटनाओं ने मध्य प्रदेश में किसानों के सामने आने वाले एक भावी संकट की ओर इशारा किया है।
गौरतलब है कि बनखेड़ी ब्लाक के ही ग्राम नांदना के एक किसान ने भी जहरीली दवा पी ली। किसान को तत्काल स्वास्थ्य केन्द्र ले जाया गया जहां उससे किसी तरह से मरने से बचाया जा सका। इस किसान ने कहा कि उसके खेत में इस साल केवल 12 क्विंटल गेहूं हुआ है जबकि उसे एक लाख पच्चीस हजार रुपयों का कर्ज पटाना था। विद्युत समस्या के कारण इस किसान को जनरेटर से सिंचाई करनी पड़ी जो कि काफी महंगी पड़ी। इन तमाम समस्याओं के चलते इस किसान ने आत्महत्या का रास्ता अख्तियार किया। लोगों की जागरूकता से इस किसान को बचाया जा सका। बात केवल इन दो किसानों की ही नहीं है। बनखड़ी के पास ग्राम भैरापुर के युवा किसान 22 वर्षीय मिथलेश रघुवंशी ने कर्ज में डूबने के कारण आत्महत्या कर ली थी। इस किसान की मां का कहना है कि फसल अच्छी नहीं हुई थी और और उसके बेटे पर कर्ज था जिसकी चिंता में मिथलेश ने अपनी जान दे दी। समाजवादी जन परिषद के गोपाल राठी कहते हैं कि सरकार की किसान विरोधी नीतियां ही आत्महत्या का प्रमुख कारण हैं। एक तरफ सरकार उद्योगपतियों को न्यौता दिया जा रहा है उनके साथ बिजली की आपूर्ति के लिए अनुबंध किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ किसानों को खेती के लिए पर्याप्त बिजली उपलब्ध नहीं करवाई जा रही है। किसान को क्रेडिट कार्ड बनवाने के लिए भी भटकना पड़ता है।
किसान के आत्महत्या की ये घटनाएं खेती पर मंडरा रहे खतरे के लिए आगाह करने वाली हैं। मध्य प्रदेश के कई इलाके सिंचाई के साधनों से महरूम है। छोटे-छोटे किसान सिंचाई के लिए पंपो का इस्तेमाल करते हैं। बिजली कटौती के कारण किसानों को खेतों में डीजल पंपों का उपयोग करना पड़ता है। जिसमें न केवल लागत बढ़ जाती है बल्कि कई तरह की अन्य दिक्कतों का सामना भी करना पड़ता है। पर्याप्त पैदावार न होना और कर्जों की वसूली की सख्त प्रक्रिया किसानों को मुश्किल में डालती है। फसल का दाम लागत मूल्य से भी कम मिलना खेती को घाटे का सौदा बनाता है। इसका सामना छोटा किसान करने में अक्षम है और उसे आत्महत्या की राह अपनानी पड़ रही है।
भारत सरकार का आर्थिक सर्वेक्षण 2007-2008 की एक जानकारी कहती है कि भारत के कुछ राज्यों में गेहूं का समर्थन मूल्य लागत से कम है। उल्लेखनीय है कि मध्य प्रदेश भी इनमें से एक राज्य है। वस्तुत: किसान को कर्ज लेकर खेती करनी पड़ती है। मध्य प्रदेश में किसानों के कर्ज की स्थिति चौकाने वाली है। एक जानकारी के मुताबिक मध्य प्रदेश के 80 से 90 फीसदी किसान कर्जग्रस्त हैं। प्रदेश के हर किसान पर औसतन 14 हजार 218 रुपए का कर्ज है। प्रदेश के 32,20,600 किसान कर्ज में हैं। रासायनिक खादों, कीटनाशकों के लगातार बढ़ते इस्तेमाल और पैदावार में ठहराव के कारण खेती की लागत में लगातार वृध्दि हो रही है। यह एक चिन्ता का मुद्दा है। इसका एक परिणाम मध्य प्रदेश में किसानों की आत्महत्याओं की घटनाओं का बढ़ना है। पिछले साल भी कुछ किसानों की आत्महत्याओं की खबरें मिली थीं। छिंदवाड़ा, खरगौन, भोपाल, बनखेड़ी, पिपरिया और बड़वानी के किसानों ने पिछले साल आत्महत्या जैसा कदम उठाया। प्रदेश सरकार या केन्द्र सरकार दोनों ही किसानों को गुमराह करती रही हैं। पर असल में किसानों की समस्याओं को इनमें से किसी ने भी नहीं उठाया है। खेती के कंपनीकरण जैसे कदम जरूर उठाने की कोशिश पिछले दिनों की गई हैं। प्रदेश सरकार ने पिछले साल एग्री बिजनेस मीट का आयोजन करके कई कंपनियों को खेती में प्रवेश करने के लिए कई तरह के लालच देने की कोशिश की। मानसून का जुआ कही जाने वाली खेती को घाटे से उबारने के लिए तुरन्त प्रयास किए जाने की जरूरत है अन्यथा यदि खेती की तबाही को नहीं रोका गया तो अंतत: संकट पूरे देश के सामने आएगा!
गौरतलब है कि बनखेड़ी ब्लाक के ही ग्राम नांदना के एक किसान ने भी जहरीली दवा पी ली। किसान को तत्काल स्वास्थ्य केन्द्र ले जाया गया जहां उससे किसी तरह से मरने से बचाया जा सका। इस किसान ने कहा कि उसके खेत में इस साल केवल 12 क्विंटल गेहूं हुआ है जबकि उसे एक लाख पच्चीस हजार रुपयों का कर्ज पटाना था। विद्युत समस्या के कारण इस किसान को जनरेटर से सिंचाई करनी पड़ी जो कि काफी महंगी पड़ी। इन तमाम समस्याओं के चलते इस किसान ने आत्महत्या का रास्ता अख्तियार किया। लोगों की जागरूकता से इस किसान को बचाया जा सका। बात केवल इन दो किसानों की ही नहीं है। बनखड़ी के पास ग्राम भैरापुर के युवा किसान 22 वर्षीय मिथलेश रघुवंशी ने कर्ज में डूबने के कारण आत्महत्या कर ली थी। इस किसान की मां का कहना है कि फसल अच्छी नहीं हुई थी और और उसके बेटे पर कर्ज था जिसकी चिंता में मिथलेश ने अपनी जान दे दी। समाजवादी जन परिषद के गोपाल राठी कहते हैं कि सरकार की किसान विरोधी नीतियां ही आत्महत्या का प्रमुख कारण हैं। एक तरफ सरकार उद्योगपतियों को न्यौता दिया जा रहा है उनके साथ बिजली की आपूर्ति के लिए अनुबंध किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ किसानों को खेती के लिए पर्याप्त बिजली उपलब्ध नहीं करवाई जा रही है। किसान को क्रेडिट कार्ड बनवाने के लिए भी भटकना पड़ता है।
किसान के आत्महत्या की ये घटनाएं खेती पर मंडरा रहे खतरे के लिए आगाह करने वाली हैं। मध्य प्रदेश के कई इलाके सिंचाई के साधनों से महरूम है। छोटे-छोटे किसान सिंचाई के लिए पंपो का इस्तेमाल करते हैं। बिजली कटौती के कारण किसानों को खेतों में डीजल पंपों का उपयोग करना पड़ता है। जिसमें न केवल लागत बढ़ जाती है बल्कि कई तरह की अन्य दिक्कतों का सामना भी करना पड़ता है। पर्याप्त पैदावार न होना और कर्जों की वसूली की सख्त प्रक्रिया किसानों को मुश्किल में डालती है। फसल का दाम लागत मूल्य से भी कम मिलना खेती को घाटे का सौदा बनाता है। इसका सामना छोटा किसान करने में अक्षम है और उसे आत्महत्या की राह अपनानी पड़ रही है।
भारत सरकार का आर्थिक सर्वेक्षण 2007-2008 की एक जानकारी कहती है कि भारत के कुछ राज्यों में गेहूं का समर्थन मूल्य लागत से कम है। उल्लेखनीय है कि मध्य प्रदेश भी इनमें से एक राज्य है। वस्तुत: किसान को कर्ज लेकर खेती करनी पड़ती है। मध्य प्रदेश में किसानों के कर्ज की स्थिति चौकाने वाली है। एक जानकारी के मुताबिक मध्य प्रदेश के 80 से 90 फीसदी किसान कर्जग्रस्त हैं। प्रदेश के हर किसान पर औसतन 14 हजार 218 रुपए का कर्ज है। प्रदेश के 32,20,600 किसान कर्ज में हैं। रासायनिक खादों, कीटनाशकों के लगातार बढ़ते इस्तेमाल और पैदावार में ठहराव के कारण खेती की लागत में लगातार वृध्दि हो रही है। यह एक चिन्ता का मुद्दा है। इसका एक परिणाम मध्य प्रदेश में किसानों की आत्महत्याओं की घटनाओं का बढ़ना है। पिछले साल भी कुछ किसानों की आत्महत्याओं की खबरें मिली थीं। छिंदवाड़ा, खरगौन, भोपाल, बनखेड़ी, पिपरिया और बड़वानी के किसानों ने पिछले साल आत्महत्या जैसा कदम उठाया। प्रदेश सरकार या केन्द्र सरकार दोनों ही किसानों को गुमराह करती रही हैं। पर असल में किसानों की समस्याओं को इनमें से किसी ने भी नहीं उठाया है। खेती के कंपनीकरण जैसे कदम जरूर उठाने की कोशिश पिछले दिनों की गई हैं। प्रदेश सरकार ने पिछले साल एग्री बिजनेस मीट का आयोजन करके कई कंपनियों को खेती में प्रवेश करने के लिए कई तरह के लालच देने की कोशिश की। मानसून का जुआ कही जाने वाली खेती को घाटे से उबारने के लिए तुरन्त प्रयास किए जाने की जरूरत है अन्यथा यदि खेती की तबाही को नहीं रोका गया तो अंतत: संकट पूरे देश के सामने आएगा!
शिवनारायण गौर