खेत-खलियान पर आपका स्‍वागत है - शिवनारायण गौर, भोपाल, मध्‍यप्रदेश e-mail: shivnarayangour@gmail.com

Sunday, April 20, 2008

सबसे बड़े कृषि संकट का दौर - पी. साईनाथ

वरिष्ठ पत्रकार पी. साईंनाथ ने इस दौर में पत्रकारिता की प्रासंगिकता का सवाल खड़ा करते हुए गत 17 अप्रैल को दिल्ली में आयोजित एक व्याख्यान में कहा कि हम इस वक्त सबसे बड़े कृषि संकट से गुजर रहे हैं। 80 लाख लोगों ने पिछले 10 वर्षों में खेती-किसानी छोड़ी है। ये लोग आखिर कहां गए, इस पर हमने कोई खबर की? विस्थापन की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि इस शहर दिल्ली में एक से दो लाख आदिवासी लड़कियां आई हैं घरेलू नौकरानी का काम करने के लिए। पिछले छह महीनों में जो खाद्य संकट खड़ा हुआ है वैसा पहले कभी नहीं हुआ। नौ साल में डेढ़ लाख से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की है। साईनाथ यहां चिन्मय मिशन के सभागार में मीडिया एंड एग्रेरियन क्राईसेस विषय यपर एडिटस्र गिल्ड ऑफ इंडिया की ओर से आयोजित राजेन्द्र माथुर स्मृति व्याख्यान दे रहे थे। साईनाथ ने कहा कि इस वक्त असमानता सबसे तेजी से बढ़ी है। पिछले 15 साल म4ें अमीर और गरीब की खाई नाटकीय तौर पर चौड़ी हुई है। देश में कुपोषण के शिकार बच्चें की स्थिति को भी उन्होंने गंभीर बताते हुए कहा कि इस मामले में हमाराा देश नीचे से 10 वें नंबर पर है। कई और मामलों में देश में असमानता का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि इस मामले में जिन देशों में आर्थिक विकास दर नौ प्रतिशत नहीं है और जो आईटी क्षेत्र में महाशक्ति होने का दावा नहीं कर रहे हैं उनकी स्थिति हमसे बेहतर है। मोटे तौर पर मीडिया के रवैये का उल्लेख करते ेहुए उन्होंने कहा कि आज मीडिया का कारपोरेट अपहरण हो गया है। इस दौर में मीडिया की नैतिक दुनिया काफी बदल गई है। इन सारी स्थितियों के बीच पत्रकारों की बीट को लेकर कटाक्ष करते हुए उन्होंने कहा कि एक अखबार में दस-पन्द्रह लोग मार्केट कवर कर रहे हैं, फैशन डिजाइन और ग्लैमर संवाददाता हैं, लेकिन ग्रामीण या शहरी गरीबी को कवर करने वाला कोई पूर्णकालिक संवाददाता नहीं है। श्रमिकों और उनकी समस्याओं की कवरेज के लिए कोई संवाददाता नहीं है। इसका मतलब है कि जो 75 प्रतिशत जनता खबर नहीं उसके बारे में बात करने में हमारी कोई रुचि नहीं है। सामाजिक क्षेत्र की समस्याएं जिस अनुपात में बढ़ रही हैं, इस क्षेत्र को कवर करने वाले संवाददाताओं की बीट उस अनुपात में घट रही है। उन्होंने गरीबी और ग्रामीण क्ष्ज्ञेत्र में खबरों की अपार संभावनाएं बताते हुए कहा कि उस वास्तविकता को कवर करना स्टॉक मार्केट से ज्यादा प्रासंगिक है। उन्होंने कहा पत्रकारिता दो तरह की होती है एक पत्रकारिता पत्रकारिता होती और दूसरी स्टेनोग्राफी होती हैं आज हम सामर्थ्यवानों की स्टेनोग्राफी कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि ग्रामीण भारत में खबर ढूंढने की जरूरत नहीं है, खबर आपको ढूंढती है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे केन्द्रीय पंचायती राज मंत्री मणिशंकर अय्यर ने कहा कि मीडिया ने जिस एक और चीज की अनदेखी की है वह पंचायती राज संस्थाओं की है। हमारे पास वेसे विकल्प नहीं हैं जैसे विकसित लोकतंत्र वाले देशों में हैं, यह बताते हुए उन्होंने कहा कि पंचायती राज संस्थाओं की मजबूती से समूचे भारतीय समाज में बदलाव आएगा। कार्यक्रम की शुरुआत में एडीटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के अध्यक्ष आलोक मेहता ने राजेन्द्र माथुर की पत्रकारिता का स्मरण करते हुए कहा कि उनके लेखन की छाप समूची नई पीढ़ी पर रही है। खेती के संकट की चर्चा करते हुए उन्होंने माना कि किसानों का और कृषि का संकट हमारे पूरे समाज का संकट है।

2 comments:

अनिल रघुराज said...

मुझे तो लगता है हर हिंदी अखबार में पी साईनाथ का साप्ताहिक कालम शुरू करना चाहिए। ऐसे जानकार पूरे देश में गिने-चुने हैं।

Raghavendra Kumar said...

पी. साईनाथ जी कहते हैं कि....आज मीडिया का कारपोरेट द्वारा अपहरण हो गया है । इस दौर में मीडिया की नैतिक दुनिया काफी बदल गई है । इन सारी स्थितियों के बीच पत्रकारों की बीट को लेकर कटाक्ष करते हुए उन्होंने कहा कि एक अखबार में दस-पन्द्रह लोग मार्केट कवर कर रहे हैं, फैशन डिजाइन और ग्लैमर संवाददाता हैं, लेकिन ग्रामीण या शहरी गरीबी को कवर करने वाला कोई पूर्णकालिक संवाददाता नहीं है । श्रमिकों और उनकी समस्याओं की कवरेज के लिए कोई संवाददाता नहीं है । इसका मतलब है कि जो 75 प्रतिशत जनता खबर नहीं उसके बारे में बात करने में हमारी कोई रुचि नहीं है...... लेकिन अब उनसे यह कौन बताए कि ग्रामीण पत्रकारिता करने वालों के लिए मीडिया में कोई जगह नहीं है, यदि जगह होती तो एक नए चैनल से मैं कूड़े की तरह छांटा नहीं जाता । लेकिन पी. साईनाथ जी मैं आपके मार्ग का अनुसरण करूंगा जब तक टूट कर बिखरता नहीं ।