खेत-खलियान पर आपका स्‍वागत है - शिवनारायण गौर, भोपाल, मध्‍यप्रदेश e-mail: shivnarayangour@gmail.com
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Wednesday, October 1, 2014

बगैर जुते खेत ठंडक पैदा करते हैं



प्रोसीडिंग्‍स ऑफ नेशनल एकेडमी आफसाइन्‍सेज़ में प्रकाशित एक शोध पत्र में बताया गया है कि यदि खेत में जुताई न की जाए तो फसल क्षेत्र के आसपास के तापमान में 2 डिग्री सेल्सियस तक की कमी आती है। एक प्रकार की प्राकृतिक खेती में बीज बोने से पहले खेत की जुताई नहीं की जाती।
यह अध्‍ययन स्विस फेडरल इंस्‍टीट्यूटआफ टेक्‍नॉजॉली की जलवायु विशेषज्ञ सोनिया सेनेविरत्‍ने और उनके साथियों ने फ्रांस के दक्षिण-पूर्व में स्थित प्रोवेंस क्षेत्र में किया है।
आमातोर पर गैर-जुताई खेती इसलिए अपनाई जाती है ताकि भूक्षरण कम से कम हो। जब खेत में जुताई नहीं की जाती और पिछली फसल के अवशेषों को वहीं छोड़ दिया जाता है तो मिट्टी में नमी बनी रहती है। मगर पानी के वाष्‍पन की वजह से मिट्टी का तापमान भी कम होता है। मगर हाल के अध्‍ययन से पता चलता है कि बिना जुते खेतों के आसपास का तापमान अपेक्षाकृत कम रहता है।
सेनेविरत्‍ने का कहना है कि बिना जुते खेतों का तापमान कम रहने का कारण यह है कि ऐसे खेत धूप को ज्‍यादा मात्रा में परावर्तित कर देते हैं। इसे एल्‍बीडो प्रभाव कहते हैं। उन्‍होंने पाया कि गर्मी के महीनों में बगैर जुते खेत सामान्‍य खेतों की अपेक्षा 50 प्रतिशत ज्‍यादा परावर्तक होते हैं।
पहले किए गए अध्‍ययनों में पता चला था कि यह ठंडक बहुत अधिक नहीं होती है। मगर सेनेविरत्‍ने और उनके साथियों के अध्‍ययन से पता चलता है कि ठंडक का असर गर्मियों के महीनों में और वह भी सबसे गर्म दिनों में सबसे ज्‍यादा होता है। उन्‍होंने पाया कि साल भर का औसत देखेंगे तो बिना जुते खेतों का तापमान अन्‍य खेतों की अपेक्षा मात्र 1 डिग्री सेल्सियस कम रहता है मगर यदि कर्मी के सबसे कर्म दिनों का तापमान 1.6 डिग्री सेल्सियस तक कम रहता है। शोधकर्ताओं के मुताबिक दक्षिणी यूरोप में तो 2 डिग्री सेल्सियस तक का फर्क पड़ सकता है।
शोधकर्ताओं के मुताबिक होता यह है कि आम दिनों में धूप के कारण तापमान बढ़ता है और मिट्टी से पानी के वाष्‍पन की वजह से कम होता है। चूँकि जुते हुए खेतों में वाष्‍पन अधिक होता है इसलिए दोनों तरह के खेतों में तापमान में अंतर ज्‍यादा नहीं होता। मगर बहुत गर्म ‍दिनों में धूप और उसके परावर्तन काअसर हावी हो जात है और इन परिस्‍थतियों में बिना जुते खेत जयादा धूप को परावर्तित करके अपेक्षाकृत ठंडे बने रहते हैं।
इस अध्‍ययन से तो लगता है कि जितने बड़े क्षेत्र में गैर-जुताई खेती की जाएगी, तापमान को कम रखने में उतनी ही मदद मिलेगी। और नमी बनाए रखने व भूमि-क्षरण रोकने जैसे अन्‍य फायदे तो हैं ही। (स्रोत फीचर्स से)

Wednesday, January 1, 2014

खेती में रोजगार



समय समय पर हुए तमाम अध्‍ययनों से दो बातें सामने आती रही हैं। एक तो है कि लोग खेती के ज़रिए अपनी आज़ीविका नहीं चला पा रहे हैं मसलन वे खेती छोड़ रहे हैं और दूसरा हर साल शहरों में बस्तियों की संख्‍या में इज़ाफा हो रहा है। यद्यपि इन दोनों तरह के अध्‍ययनों के बीच के सम्‍बन्‍ध को जानना थोड़ा मुश्किल हैं क्‍योंकि यह बात तो सामने आती है कि बस्तियों में रहने वाले लोगों का जीवन कैसे चल रहा है। उनके प्रमुख रोजगार क्‍या है इत्‍यादि। लेकिन इस बात को लेकर मुझे कोई अध्‍ययन नहीं दिखाई दिया जो यह बताए कि बस्तियों में आने वाले नए लोग कौन हैं ? वे शहर की इस मुश्किल जिन्‍दगी को कम से कम खुशी-खुशी तो स्‍वीकार नहीं ही कर सकते। यानी ये वे लोग हैं जो कि बस्तियों में आने से पहले अपने जीवन के संघर्षों से हारे हुए लोग हैं और विकल्‍प की तलाश में इस तरह के जटिल हालातों में हैं।
खैर खेती छोड़कर शहरी बस्तियों में आकर मज़दूरी करने वाली बात को हम सीधे तौर पर स्‍वीकार न भी करें तो भी इस बात से नहीं नकारा जा सकता है कि खेती पर संकट है। वर्तमान खेती-किसानी के विकल्‍प तलाशना फिलहाल किसानों की मजबूरी है। चूँकि खेती दरअसल केवल एक रोजगार ही नहीं है बल्कि वह एक जीवनशैली है। और जीवनशैली होने के कारण खेती से बाहर जाना किसानों के लिए खुशी की बात नहीं होती। पर यदि हम खेती पर पड़ते दबाबों को देखें तो असल में खेती से बाहर जाना ही खेती को सशक्‍त करने का एक तरीका हो सकता है। हम जानते हैं कि खेती का रकबा आए दिन कम हो रहा है और खेती पर दबाब लगातार बढ़ता जा रहा है। पर असल में खेती को छोड़कर रोजगार के अच्‍छे अवसर उपलब्‍ध कराने की महत्‍ती आवश्‍यकता है जिस पर अभी कोई खास काम नहीं हो पा रहा है। मैं एक खबर पड़ रहा था जिसमें एक अध्‍ययन के हवाले से कहा गया है कि 2014 में खेतीहर व्‍यवसाय में रोजगार के ज्‍यादा अवसर उपलब्‍ध होंगे। हालांकि इस बात को समझना भी जरूरी है कि ये खेतीहर व्‍यवसाय किस तरह के होंगे और क्‍या वे खेती-किसानी से जुड़े तबके को रोजगार के अवसर मुहैया करा पाने में समर्थ होंगे ?  खैर जो भी हमें शायद इस दिशा में सोचने की इस समय आवश्‍यकता है कि खेती के इतर रोजगार के मौके अधिक से अधिक कैसे उपलब्‍ध कराए जा सकते हैं और वह भी बिना शहरी बस्तियों में रहने वाले लोगों की संख्‍या में इजाफा किए? 
आप सभी को नए साल की शुभकामनाएं। 
शिवनारायण गौर

Tuesday, April 22, 2008

खाद्यान्न संकट का सवाल

हाल ही में संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (ए.एफ.ओ.) के महानिदेशक जैक्स डायफ ने अपनी भारत यात्रा के दौरान खाद्य मंत्री शरद पवार से मुलाकात की और बाद में संवाददाताओं के साथ बातचीत में जो बातें कहीं उनसे खाद्यान्न की स्थिति को लेकर चिन्ता पैदा हो गई। श्री डायफ ने कहा कि दुनिया भर में खाद्य मोर्चे पर हालात गंभीर हैं। इस वक्त दुनिया में अनाज का स्टॉक काफी कम है और यह पूरी दुनिया की आबादी का सिर्फ 8 से 12 हफ्तों तक ही पेट भर सकती है। वे कहते हैं कि मिस्र, कैमरून, हैती, बुर्कीना फासो और सेनेगल जैसे देशों में इसे लेकर काफी संघर्ष भी हुए हैं। यह संघर्ष अन्य देशों में भी फैल सकते हैं।
श्री डायफ की आंकड़ों वाली सच्चाई पर ध्यान न भी दिया जाए तो भी खाद्यान्न सुरक्षा का सवाल आज दुनियाभर में उठाया जा रहा है। खेती का रूझान बदल रहा है। अब खाद्य फसलों की जगह अखाद्य फसलों का रकबा और उत्पादन दोनों ही बढ़ रहा है। भारत में भी प्रायोजित और गैर प्रायोजित दोनों तरीके से नकदी फसलों की ओर किसानों की रुचि बढ़ी है या बढ़ाई गई है। एक तरफ यह हल्ला भी मचाया जा रहा था, जो असल सच्चाई भी है, कि लगातार उर्वरकों और कीटनाशकों के इस्तेमाल से जमीन की उर्वरा शक्ति समाप्त हो रही है और अब रही सही कसर नकदी फसलों की खेती पूरी कर देगी। गौरतलब है कि नगदी फसलों में पानी और खाद दोनों की ज्यादा जरूरत होती है। पर जो भी हो, अखाद्य फसलों का उत्पादन तो बढ़ ही रहा है।
भारत सरकार का वर्ष 2007-2008 का आर्थिक सर्वेक्षण कहता है कि 1990 से 2007 के दौरान खाद्यान्न उत्पादन 1.2 प्रतिशत कम हुआ है, जो कि जनसंख्या की औसतन 1.9 प्रतिशत वार्षिक बढ़ोत्तरी की तुलना में कम है। अनाज तथा दालों की प्रति व्यक्ति उपलब्धताओं में भी इस अवधि के दौरान गिरावट हुई है। अनाजों की खपत 1990-91 में प्रतिदिन प्रति व्यक्ति 468 ग्राम थी जो कि 2005-2006 में प्रतिदिन 412 ग्राम प्रति व्यक्ति हो गई है। मसलन अनाज की उपलब्धता में 13 प्रतिशत की गिरावट आई है। इसी अविध में दालों की खपत प्रतिदिन 42 ग्राम प्रति व्यक्ति से घटकर 33 ग्राम प्रतिदिन प्रति व्यक्ति रह गई है। उल्लेखनीय है कि 1956-57 में दालों की उपलब्धता 72 ग्राम प्रति व्यक्ति थी।
उपरोक्त आंकड़े बताते हैं कि खाद्यान्न की उपलब्धता में कमी आ रही है। इसका असर व्यक्ति के स्वास्थ्य पर भी दिखाई देता है। वर्ष 2005-2006 में कराए गए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे के आंकड़े अपनी अलग ही कहानी कहते हैं। सर्वे के मुताबिक देश में कुपोषित लोगों की तादाद काफी ज्यादा है। सर्वे में कहा गया है कि देश में 5 साल से कम उम्र के बच्चे शारीरिक रूप से अविकसित हैं और इसी उम्र के 43 फीसदी बच्चों का वजन (उम्र के हिसाब से) कम है। इनमें से 24 फीसदी शारीरिक रूप से काफी ज्यादा अविकसित हैं और 16 फीसदी का वजन बहुत ही ज्यादा कम है। वहीं व्यस्कों की हालत भी कुछ ज्यादा ठीक नहीं है। देश में 15 से 49 साल की उम्र के बीच की महिलाओं का बॉडी मांस इंडेक्स (बीएमआई) 18.5 से कम है, जो उनमें पोषण की गंभीर कमी की ओर इशारा करता है और इन महिलाओं में से 16 फीसदी तो बेहद ही पतली हैं। इसी तरह देश में 15 से 49 साल की उम्र के 34 फीसदी पुरुषों का बीएमआई भी 18.5 से कम है और इनमें से आधे से ज्यादा पुरुष बेहद कुपोषित हैं। यदि कुपोषण और गिरते स्वास्थ्य का सीधा सम्बन्ध अखाद्य फसलों के उत्पादन से न भी हो तो भी कम से कम यह भविष्य के लिए चिंता का विषय तो है। ऐसा माना जाता है कि नकदी फसलों से आर्थिक सम्पन्नता आ रही है किन्तु वहीं उसका स्वास्थ्य से जुड़ा दूसरा पक्ष भी है जिसकी ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
एक जानकारी के मुताबिक वर्ष 1882-83 में गैर खाद्य फसलों की हिस्सेदारी 37.1 प्रतिशत थी जो कि 2005-06 तक 46.7 फीसदी तक पहुंच चुकी है। आज गेहूं-चावल की तुलना में फल-सब्जी, मछली आदि के उत्पादन में बढ़ोत्तरी हो रही है। 2000-01 और 2005-06 के बीच गेहूं व चावल समेत अनाजों का उत्पादन 21.63 फीसदी बढ़ा जबकि फल-सब्जी उत्पादन में 33.74 फीसदी और मछली के उत्पादन में 61 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है। कुल मिलाकर देखा जाए तो जहां खाद्य फसलों के उत्पादन में 2 प्रतिशत की वृध्दि हुई है वहीं अखाद्य फसलों के उत्पादन में 4 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट कहती है कि उँची कीमतों वाली फसलों की मांग बढ़ रही है शायद यही कारण है कि अखाद्य फसलों का उत्पादन बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं।
क्रिसिल के मुख्य अर्थशास्त्री डी.के. जोशी कहते हैं कि किसान अब ऊँची कीमतों वाली फसलों की तरफ बढ़ रहे हैं। वे कहते हैं कि इसमें किसानों को ज्यादा मुनाफे की उम्मीद रहती है और वह पूरी भी होती है लेकिन वहीं वे यह भी कहते हैं कि अनाज की कमी चिंता का विषय हो सकता है और ऐसे में इनकी मांग पर ध्यान देते हुए नीति निर्धारकों को हस्तक्षेप करने की जरूरत है।
पर असल में हालात इससे विपरीत ही हैं। नीति निर्धारकों को इस बात की कोई चिंता नहीं है कि लोगों की खाद्यान्न की पूर्ति भी एक मुद्दा है! गौरतलब है कि देश में फूलों के कारोबार में काफी वृध्दि पिछले कुछ वर्षों में हुई है। वर्ष 2004-05 में फूलों का निर्यात 221 करोड़ रुपयों का था जो कि 2006-07 में 650 करोड़ रुपयों का हो गया। मसलन इसमें 194 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है। फल-सब्जी का निर्यात 1363 करोड़ रुपयों के मुकाबले आज 2411 करोड़ रुपयों पर पहुंच गया है। यानि इसमें 77 प्रतिशत की वृध्दि हुई है। इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च (आईसीएआर) की 2006-07 की रिपोर्ट के मुताबिक कुल उत्पादन में ऊँची कीमत वाली फसल की बढ़ती हिस्सेदारी बताती है कि भारतीय कृषि जगत में खाद्य फसलों की हिस्सेदारी कम हो रही है।
कारण जो भी हों लेकिन यह तो स्पष्ट है कि अखाद्य फसलों का रकबा और उत्पादन बढ़ रहा है। तात्कालिक रूप से भलेही यह फायदेमन्द दिखाई दे लेकिन निश्चित ही भविष्य में इसके खतरे हैं। इस ओर गंभीरता से ध्यान देने की महती जरूरत है ताकि समय रहते स्थिति को सुधारने की दिशा में पहल की जा सके।
शिवनारायण गौर
ई 7/70 अशोका सोसायटी
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Tuesday, December 11, 2007

खुदरा बाज़ार में बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ

शिवनारायण गौर

करीब दो साल पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने वर्ल्ड इकॉनॉमिक फोरम की बैठक को सम्बोधित करते हुए कहा था कि यदि हम आर्थिक सम्भावनाओं को साकार करने में कामयाब नहीं हुए तो इतिहास हमें माफ नहीं करेगा। उनका कहना था कि नीतियों के स्तर पर हमें कठोर निर्णय लेने होंगे। नए रोजगार के अवसर सृजित करने के लिए विदेशी निवेश ज़रूरी है। खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश की ओर भी उन्होंने इशारा किया था। और तब से ही बिना इसके नफा नुकसान को जाने तमाम तरह के निवेशों का रास्ता खोला जा रहा है। हाल ही में वित्तमंत्री ने तीन सौ अरब डालर के खुदरा बाज़ार को बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिए खोलने की घोषणा की है।
उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों जब रिलायंस कम्पनी ने खुदरा व्यापार में शुरुआत की तो इसका काफी विरोध हुआ। इस विरोध की झलक से लोगाें के आक्रोश को सहजता से देखा जा सकता था। उड़ीसा और मध्यप्रदेश में रिलायंस फ्रेश के विरोध ने उग्र रूप धारण कर लिया। यही नहीं खुदरा व्यापार को बचाने के लिए देशभर के छोटे व्यापारी विरोध के लिए लामबंद हुए। इन सब दबावों के चलते मध्यप्रदेश सरकार ने एग्री बिजनेस मीट में खुदरा व्यापार में बड़ी कम्पनियों को सीधे दरवाजे से प्रवेश न देने की घोषणा की। यह अलग बात है कि भोपाल में ही अंतत: रिलायंस की ये सब्जी की दुकाने बिना तामझाम के खुल गईं और ग्राहकों को रिझाने की कोशिश में लगी हुई हैं।
वित्तमंत्री का खुदरा व्यापार में तीन सौ अरब डालर के निवेश को हरी झण्डी दिखाना असल में कम्पनियों को नए सिरे से प्रवेश का न्योता नहीं है बल्कि जो कुछ भारत में हो रहा है उसे और ज्यादा व्यापाक पैमाने पर करने की मंसा प्रतीत होती है। क्योंकि भारत में बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ खुदरा व्यापार में पहले से ही आ चुकी हैं। भारती, बिग बाज़ार, री बोक, फ्युचर ग्रुप, रिलायंस, एबोनी, पैटलून और सुभिक्षा जैसी बड़ी कम्पनियां खुदरा व्यापार में लगी हुई हैं। यही नहीं बाल-मार्ट और डेल-मोंटे आदि भी बाजार में भारी निवेश करके हावी हो रही हैं। दरअसल भारत ऐशिया का दूसरा बड़ा बाज़ार है। चीन के बाद यही वह देश है जहां 12 लाख करोड़ रुपए का सालाना बाज़ार होता है।
एक अनुमान के मुताबिक भारत का खुदरा व्यापार 180 बिलियन डालर का है जो देश के घरेलू उत्पाद का लगभग दस फीसद है। देश भर में करीबन एक करोड़ पचास लाख छोटी दुकाने हैं जिन्हें परिवार के लोग चलाकर गुजर बसर करते हैं। शायद यह एक बड़ा कारण है कि यहां तमाम देशी-विदेशी बड़ी कम्पनियां अपनी पैठ जमाना चाहती हैं। सरकार का एक ही नारा होता है कि इनके आने से रोजगार के अवसर पैदा होंगे। पर इसके पीछे की सच्चाई को जानने या दबावों के चलते जान बूझकर अनजान बनने की कोशिश की जाती है। हालात यह है कि आज छोटे व्यापारी बाज़ार से लुप्त होकर मज़दूर बनते जा रहे हैं। और आगे की स्थिति इससे भी बदतर होगी। छोटे-छोटे दुकानकार कभी भी विशालकाय कम्पनियों का मुकाबला नहीं कर पाएंगें और अंतत: वे इस प्रतिस्पर्धा में मात खाकर बाज़ार से बाहर हो जाएंगें। रिसर्च फाउंडेशन फार साइंस टेक्नोलॉजी एंड इकोलॉजी 'नवदान्य' का ताजा अध्ययन भी इस ओर इशारा करता है। इस अध्ययन में कहा गया है कि सुपर मार्केट चेन और खुदरा बाजार में बड़ी कम्पनियों के प्रवेश से न केवल सब्जी, फल बेचने वाले बल्कि रेहड़ी पटरी कारोबार से जुड़े लगभग 3.8 करोड़ लोग तबाही की कगार पर पहुंच गए हैं। अध्ययन में कहा गया है कि खुदरा क्षेत्र से लगभग चार करोड़ लोग जुड़े हुए हैं और देश में कुल रोजगार में इस क्षेत्र से जुड़े लोगों का हिस्सा लगभग 8 फीसदी तथा कुल जनसंख्या का 4 फीसदी है। एक ओर तो देश में गरीबी, अशिक्षा व बेराजगारी की समस्या है वहीं दूसरी ओर खुदरा क्षेत्र में बड़ी व बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के प्रवेश से देश के 65 करोड़ किसानों व खुदरा क्षेत्र से जुड़े लोगों के रोजगार पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ेगा।
नवदान्य संस्था की अध्यक्ष वंदना शिवा कहती हैं कि खुदरा क्षेत्र में प्रवेश करने वाली ये बहुरारष्ट्रीय कम्पनियां अपने स्टोरों के जरिए लोगों को लुभावनी छूट देकर अपने जाल में फंसा रही है और इससे छोटे खुदरा कारोबारी तथा रेहड़ी पटरी वालों का कारोबार बर्बाद हो रहा है। कनफेडरेशन आफ आल इंडिया ट्रेडर्स के महामंत्री प्रवीन खण्डेलवाल कहते हैं कि शुरुआत में ये कंपनियां अपने विशाल संसाधनों के बूते बाजार में स्थानीय व्यापारियों की प्रतिस्पर्धा को खत्म करने में जुटी हैं और कम दामों पर अपना सामान बेच रही हैं और जब उन्हें प्रतिस्पर्धा देने वाला कोई नहीं रहेगा तो वे मनमाने दामों पर अपना सामान बेचकर मुनाफा कमाएंगी।
जो कम्पनियां आज खुदरा क्षेत्र में आ रही हैं उनमें से कई तो सीधे अपने फार्म बनाने के लिए जमीन भी खरीद रही हैं। केरल सरीखे प्रगतिशील सोच वाले राज्य में रिलायंस कम्पनी जमीन खरीदने के लिए पूरे राज्य में चक्कर लगा रही है। इस कम्पनी ने केरल में सभी प्रकार के मसाले किसानों से सीधे खरीदकर अपने शोरूमों के ज़रिए बेचने की तैयारी की है। मध्यप्रदेश में भोपाल से करीब 65 किलोमीटर दूर बुदनी नाम की जगह में कुछ बड़ी कम्पनियों ने सैकड़ों एकड़ जमीन खरीद ली है। इस उपजाउ खेतीहर जमीन का इस्तेमाल अब गैर खेतीहर कार्यो के लिए किया जा रहा है। बड़े बड़े कारखाने बनाने की तैयारियां चल रही हैं।
कम्पनियों के प्रवेश की यह प्रक्रिया दिन व दिन तेज होते जा रही है। इन कम्पनियों की कार्यप्रणाली की यदि सामान्य व्यापार से तुलना करें तो निश्चित ही ये कम्पनियां छोटे छोटे व्यापारियों का जल्दी ही सफाया कर देगीं। फिलहाल असल में ग्राहकों रिझाना भी उनके निवेश का ही हिस्सा है। जब दूसरे छोटे व्यापारी बाजार से खत्म हो जाएंगे तब वे अपनी मनमानी करके न केवल फायदा उठाएंगी बल्कि उपभोक्ताओं का शोषण भी होगा। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को भारत के उपभोक्ताओं की मनोवैज्ञानिक स्थिति का पूरा अन्दाजा है इसलिए वे क्रमश: बाजार पर नियंत्रण की तैयारी में लगी हुई हैं। गौरतलब है कि भारत में अभी ऐसा कोई कानून भी नहीं है जो उपभोक्ताओं के हित को ध्यान में रखते हुए वस्तुओं के मूल्यनिर्धारण के लिए किसी कम्पनी को बाध्य करे। यह एक ऐसा हथियार है जिससे कम्पनियों द्वारा तय किए जाने वाले मूल्य पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं होगा। वे बाजार को नियंत्रित करने की क्षमता भी रखती हैं। वे चाहें तो किसानों से सीधे उत्पाद खरीदकर मण्डी में उत्पाद की आवक को ही रोक सकती हैं। यानी कुल मिलाकर बाजी कम्पनियों के ही हाथ में है।
सरकार ने कम्पनियों के खुदरा व्यापार में प्रवेश को स्वीकृति तो दे दी है लेकिन उनपर नियंत्रण के लिए कोई कानूनी तैयारी नहीं की है। वस्तुत: इससे भविष्य में संकट पैदा हो सकता है। जिस रोजगार के अवसरों की दुहाई देकर उनके प्रवेश का रास्ता आसान बनाया जा रहा है स्थिति उसके विपरीत भी बन सकती है। देश में बेरोजगारी और अपराध के बढ़ने की स्थितियां निर्मित हो सकती हैं। सरकार यदि वास्तव में जनहित में सोचती है तो उसे अपने इस तरह के फैसले पर अंकुश लगाने की महती ज़रूरत है।

ई मेल shivnarayangour@gmail.com

Monday, October 29, 2007

किसान, मजदूर और वैज्ञानिक

करीब 65 साल के दादाजी रामजी खोबरागाड़े छोटे किसान हैं। उनके पास सिर्र्फ डेढ़ एकड़ जमीन है। छह लोगों के परिवार का पालन-पोषण इतनी कम जमीन से होना मुष्किल होता है। इसलिए वे मजदूरी भी करते हैं। लेकिन वे किसान, मजदूर ही नहीं एक वैज्ञानिक भी हैं। गत वर्ष उन्हें भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा संचालित राष्ट्रीय नवाचारी प्र्र्रतिष्ठान का द्वितीय पुरस्कार मिला। यह संस्था देषभर में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी को प्रोत्साहित करने के लिए नवाचारी लोगों को हर साल पुरस्कृत करती है। दादाजी को यह पुरस्कार उनके द्वारा की गई धान की एक किस्म की खोज के लिए दिया गया। एचएमटी नामक यह धान महाराष्ट्र के विदर्भ इलाके के लगभग 35 प्रतिषत क्षेत्र में बोई जाती है। यही नहीं महाराष्ट्र की सीमा से लगे राज्यों में भी यह किस्म अच्छी-खासी प्रचलित है।
दादाजी रामजी महाराष्ट्र के चंद्र्रपुर जिले के नांदेड़ गांँव में एक बहुत ही जर्जर घर में रहते हैं। वे संघर्षषील व्यक्ति है। कुछ साल पहले उनके पास तीन एकड़ जमीन थी। लेकिन दुर्भाग्य से उनका बड़ा लड़का गंभीर रूप से बीमार हो गया। बेटे के इलाज के लिए उन्हें अपनी यह तीन एकड़ जमीन भी बेचनी पड़ी। बाद में बेटे की ससुराल से उन्हें डेढ़ एकड़ जमीन मिली। यह जमीन उनके परिवार की आजीविका का आधार है। दादाजी शुरूआत से ही खोेजी प्र्रवृत्ति के किसान रहे हैं। उन्होंने धान की कई किस्मों को विकसित करने की कोषिष की है। लोगों का मानना है कि धान की करीब छह किस्में उन्होंने विकसित की होगी। पिछले बीस साल से वे इस तरह की षोध प्र्रकिृया से बहुत ही सघन रूप से जुड़े हैं।
पिछले कई दषकों से दादाजी धान की खेती करते हैं। अस्सी के दषक से उन्होंने धान के परंपरागत बीजों को विधिवत तरीके से विकसित करने की कोषिष की है। उनका यह प्रयास रंग लाया। 1983 में पहली बार दादाजी रामजी ने अपने खेत में धान के तीन विचित्र पौधे देखे। ये पौधे खेत में लगी बाकी धान से हटकर थे। इन तीनों पौधों की देखभाल उन्होने काफी सावधानीपूर्र्र्र्वक की। दादाजी ने देखा कि इन पौधों से पैदा हुई धान भी सामान्य धान से अलग किस्म की थी। यह मुलायम और खाने में स्वादिष्ट थी। दादाजी ने धान की इस किस्म को व्यापाक स्तर पर पैदा करने का मन बनाया। उन्होंने अगले साल बीज विकसित करने के उद्देष्य से बुआई की। और फिर लगातार यह क्रम जारी रखा। करीब छह साल बाद 1989 में इस धान के काफी संख्या में बीज उत्पादित करने में वे सफल हुए। लिहाजा 1989 से वे दूसरे किसानों को उनकी माँग पर बीज देने लगे। इस धान का उत्पादन अन्य किस्मों की धान की तुलना में ज्यादा होता था इसलिए इसकी लगातार मांग बढ़ते गई।
दादाजी बताते हैं कि एक बार कुछ व्यापारी और किसान धान के बीज खरीदने के लिए उनके घर आए हुए थे। चूंकि यह बिना किसी प्रयोगषाला औेर वैज्ञानिक की सहायता के विकसित की थी अत: इसका कोई नाम नहीं था। खरीददारी के लिए आए लोगों में से एक के हाथ में एचएमटी घड़ी बंधी र्हुई थी उसने अनायास ही धान की किस्म का नाम एचएमटी बोल दिया। तब से ही यह इसी नाम से प्र्र्र्रचलित होना षुरू हो गई। विदर्भ क्षेत्र के सैंकड़ों किसान इस उन्नत किस्म की धान को इस नाम से मांगने लगे। बीज की मांग एक साल में ही दुगुनी हो गई। जब महाराष्ट्र के अकोला स्थित पंजाबराव देषमुख कृषि विद्यापीठ को इस बात का पता चला तो इस विद्यापीठ द्वारा संचालित सिंधवाही चावल स्टेषन ने 1994 में दादाजी रामजी से इस धान का पांच किलो बीज षोध करने के लिए खरीदा। चार साल बाद सन 1998 में इस विद्यापीठ की ओर से धान की यह किस्म एक अलग नाम पीकेवी एचएमटी नाम से बाजार में लाई गई। बीज की कीमत भी दुगुनी रखी गई। लोग दुखी थे क्योंकि विद्यापीठ ने बीज के साथ दादाजी का जिक्र करना भी उचित नहीं समझा। गौरतलब है कि क्षेत्र के किसान जानते थे कि इस बीज के जनक दादाजी रामजी ही हैं। इसलिए वे इस नई धान को स्वीकार नहीं कर पा रहे थे। सामाजिक कार्यकर्ता तथा देषी बीज को बचाने की प्रकिृया से वर्षो से जुड़े जैकब को जब इस बात का पता लगा तो उन्होंने स्थानीय किसानों की मदद से दादाजी के काम को प्रोत्साहित करने का मन बनाया। उन्होंने इस नवाचारी सोच रखने वाले किसान की भरसक मदद की। अंतत: लोगों का प्रयास सफल हुआ। दादाजी रामजी देशमुख को वर्ष 2005 में भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा पोषित राष्ट्रीय नवाचारी प्रतिष्ठान ने सम्मानित करने का तय किया। जनवरी माह में दादाजी को पुरस्कृत किया गया। इस सम्मान के बाद दादाजी रामजी को एक अलग नजरिए से देखा जा रहा है।
दादाजी रामजी देशमुख आज भी अपना जीवन खूब संघर्ष में बिता रहे हैं। तमाम आर्थिक तंगी के वाबजूद भी वे भविष्य को लेकर आषान्वित हैं। उनका मानना है कि वे भलेही कठिनाईयों में रहे हों लेकिन उनकी अगली पीढ़ी को इस तरह की मुश्किलों का सामना नहीं करना पड़ेगा। जैकब इस सामान्य जिन्दगी जी रहे अदभुत किसान से खूब प्रोत्साहित हैं उनका मानना है कि तमाम सरकारी नीतियों के कारण देषी बीजों पर हमले हो रहे हैं। हमारे अपने परंपरागत बीज आज विलुप्तप्राय होते जा रहे हैं और बदले में हाईब्रिड बीजों को थोपा जा रहा है।र् कई बहुराष्ट्रीय कंपनियों की निगाह अब भारत के बीजों पर लगी हुई हैं। ऐसी कंपनियां कभी नहीं चाहेगीं कि किसान के अपने बीज विकसित हों। नए बीज कानून से तो अब किसानों के सामने और भी संकट पैदा होगें। इस तरह के संकट के दौर में दादाजी रामजी खोबरागाड़े सरीखे किसानों को तलाशने की जरूरत हैं जिन्होंने यह सिध्द कर दिया है कि प्रयोग सिर्फ प्रयोगशाला में ही नहीं होते उन्हें सीधे खेत में भी किया जा सकता है, और किए जाने की जरूरत भी है।
शिवनारायण गौर
नर्मदा कॉलोनी, ग्वालटोली
होशंगाबाद 461001 (म.प्र.)
मो. 094254 33229
shivnarayangour@gmail.com

Friday, October 19, 2007

मध्य प्रदेश में मंडी कानून में बदलाव की तैयारी

मध्य प्रदेश सरकार मी मंडी एक्ट में फिर एक संसोधन की तैयारी कर ली है० प्रदेश के कृषि मंत्री गोपाल भार्गव ने एक समाचार पत्र को दिए वक्तव्य में कहा की मंत्रिमंडल की उप समिति एक्ट में संसोधन पर विचार कर रही है० शीघ्र ही मामूली संशोधन के बाद इस एक्ट को केबिनेट में विचार के लिए लाया जायेगा०

एक जानकारी के अनुसार मंडी एक्ट की धारा 5 में 5 क जोड़कर यह प्रावधान किया जायेगा की मंडी क्षेत्र में मंडी समिति के अतिरिक्त अन्य व्यक्ति एक या एक से अधिक टर्मिनल मार्केट एवं प्राइवेट मंडी की स्थापना कर सकेगा० एसे टर्मिनल मार्केट व प्रांगन का प्रबंधन मंडी समिति द्वारा न किया जाकर उस व्यक्ति द्वारा किया जायेगा, जो इसकी स्थापना व विकास करेगा०

गौरतलब है की मंडी एक्ट होने वाले इस संसोधन के दूरगामी परिणाम अच्छे नहीं होंगे, पिछले कुछ सालों से एइसे आशंका व्यक्त की जा रही थी की मंडी का निजीकरण हो सकता है० hसरकार अब उसी दिशा में आगे बाद रही है० जब आई टी सी के सोया चोपाल के जरिये खरीदी की जा भी कई व्यापारियों ने इसका विरोध किया था० तमाम तरह के आश्वाशानो के बाद ये संघर्ष समाप्त हुआ था० एक बार फिर से अब उसी दिशा में जाने की तैयारी की जा रही है०

शिवनारायण गौर

Thursday, October 18, 2007

बर्बादी की कगार पर खेती

उदारीकरण की नीतियों पर अमल करते हुये केंद्र और राज्य सरकारों को लगता है कि अब खेती में निजी कम्पनियों काचाहिय इसलिये इस रास्ते में अड़चन पैदा करने वाली नीतियों को धीरे धीरे बदला जा रहा है० मंडी कानून में हुये बदलाव का असर अब साफ साफ दिखाई देने लगा है० इसके चलते ही तमाम तरह कि देशी विदेशी कंपनियाँ अनाज की खरीदी कर रही है० पर इन सबके बावजूद किसान की हालत में कोई सुधर नही आ रहा है० आत्महत्याओं की ख़बरें कम होने के बजाय बढती ही जा रही हैं क्योकि असल मे किसान की सुध किसी को नही है० सब अपनी रोटियां सेंक रहे है०

जिस देश की ७५ प्रतिशत जनता खेती पर आश्रित हो, जाहिर उस तक पहुँचने के लिए खेती की बात करना जरुरी हो जाता है० दरअसल वैश्वीकरण की नीतियों का हिशाना अब खेती-किसानी हो गया है० इसका राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के पिछले साल घोषित किये गए आंकड़ों कि मदद से आसानी से लगाया जा सकता है० खुद इस सरकारी संस्था के आंकडे बताते है कि खेती कि हालत से परेशान चालीस फीसदी किसान खेती से पीछा छुडाना चाहते हैं, जबकि सत्ताईस फीसदी किसान मानते है कि खेती अब फायदे का सौदा नही रहा० इसके अलावा आठ फीसदी किसानों का मानना है कि खेती जोखिम का काम है० कुल मिलाकर करीब दो-तिहाई किसान अब खेती नहीं करना चाहते है०

यही कारण है कि किसानों के पास खेती के अलावा कोई विकल्प हो या ना हो, लेकिन अब बड़ी कम्पनियों को खेती में निवेश का एक अच्छा विकल्प हाथ लग गया है० सरकारें भी चाह रही हैं कि बड़ी-बड़ी देशी-विदेशी कंपनियाँ खेती करें ० इसके बाद अगर किसान चाहें तो अपने ही खेत में मजदूरी कर सकते है० केंद्र सरकार तो ऐसा आव्हान कर ही चुकी है अब राज्य सरकारें भी इस तरह की कोशिशों में लगी है० मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री तो इसके लिए कुछ ज्यादा ही उत्साह दिखा राहे है० वे खजुराहो मीट से लेकर एग्री बिजनेस मीट और कई अन्य मीट कर चुकें हैं और कई मीट और करने की तैयारी में है० इन सब मीटों का एक मात्रा उद्देश्य है कि बड़ी बड़ी कंपनियाँ खेती मे निवेश करें ०

सवाल है कि एक ओर जब सरकारी आंकडें बता रहे हैं कि लोग किसानी छोड़ना चाहते हैं तो देश भर में किसानों के संघर्ष क्या जाहिर करते है? अगर नंदीग्राम के किसान खेती नहीं करना चाहते थे तो वे अपनी ज़मीन के लिए जान देने के लिए क्यों तैयार है? दादरी के किसान रिलायंस की बिजली परियोजना के खिलाफ संघर्ष के रास्ते पर क्यों आये? या फिर राजस्थान में लगातार संघर्ष कर रहे किसानों की कहानी क्या बयां करती है? शायद इन सब पहलुओं पर विचार करने की फुर्सत सरकारों को नहीं है क्योकि फिलहाल निवेश पहली प्राथमिकता बन गयी है० दरअसल, निवेश कोई नया शिगुफा नहीं है० इसकी शुरुआत काफी पहले हो चुकी है, पर इस कम मे कुछ बाधाएं आ रही थीं, जिन्हें सरकार अब दूर करने की तैयारी में है० मिसाल के तौर पर मंडी एक्ट बदलने की बात पिछले सात साल से कही जा रही है० भारत सरकार का वर्ष २००६-२००७ का आर्थिक सर्वेक्षण कहता है कि कृषी मन्त्रालय ने उभरती प्रवृतियों की तर्ज पर विपणन के क्षेत्र में सुधार लेन के लिए राज्य सरकारों के परामर्श से कृषि विपणन संबंधी एक माडल एक्ट तैयार किया था० इस माडल एक्ट के अधिनियम के तहत देश में निजी बाजारों, प्रत्यक्ष खरीद केंद्रों, सीधी बिक्री के लिए उपभोक्ता या किसान बाजारों और क्रशी बाजारों के प्रबंधन और विकास में सरकारी-निजी भागीदारी का संवर्धन किया जा सकेगा०

इस नीति के मुताबिक़ आज खेती का द्रश्य बदल रहा है० प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पहले ही कह चुके हैं कि कृषी उत्पाद विपणन समिति कानून में बदलाव किया जाए, ताकी ठेके पर मुक्त खरीद फरोख्त को मंजूरी दी जा सके० संस्थागत खुदरा व्यापार हो सके, कृषि प्रसंस्करण उद्योग के लिए कच्चे माल कि सहजता से आपूर्ति हो सके, प्रतिस्पर्धी व्यापार हो और बाज़ार की नई नीतियाँ इजाद हो० इस सबका इशारा खेती में निजी निवेश की ओर है०
गौरतलब है कि कई सालों पहले से निजीकरण की यह प्रक्रिया देश में जारी है० मध्य प्रदेश तो इस दौड़ में और भी आगे है० आज दर्जन भर से ज्यादा कंपनियाँ मध्य प्रदेश में खेती के क्षेत्र में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से काम क्र रही हैं ० दूसरी ओर किसान परेशान हैं कि उन्हें उनकी उपज का दाम ठीक नहीं मिल रहा है, जबकि उत्पादन लागत लगातार बढती जा रही है० अगर वास्तव में सरकारें किसानों के बारे में सोच रही हैं तो उनकी मूलभूत समस्याओं को समझ कर उनके समाधान तलाशने की जरुरत है जो कम्पनियों को खेती में लाने से तो कतई नहीं हो सकते हैं ० सवाल है कि क्या सरकार खेती के विकास के लिए एसे कदम उठाने के लिए तैयार होगी?

शिवनारायण गौर, जनसत्ता 14 जून 2007

Wednesday, October 10, 2007

Mountains of golden ripe debt

Madhya Pradesh Government is trying hard these days to elicit a smile on the faces of the farmers of the state with its false promises. It is assuring them that wheat produced by them will now be exported. Presently, their wheat fetches them about Rs. 600 per quintal. The Government is saying that if they produce a particular variety of wheat called Kathia or Duram, it will be exported and will bring them more money. At the same time, the Government is honestly also adding that it will not act as an exporting agency on their behalf. Madhya Pradesh Industry Development Corporation is making the plan for Kathia export. Private companies will also export this variety of wheat. The word has been going round for last two-three years and consequently, there has been an increase in the production of Kathia wheat at several places in the State. The largest producer of this variety is Dhar district. The soil of Hoshangabad and Harda is also considered congenial for Kathia wheat; hence full efforts are being made in both districts to persuade farmers for producing it. But singing eulogies for this variety without first knowing their effect is a dubious act. It should be mentioned here that Kathia wheat is considered to be one of the coarse grains and is generally used as fast food. It is consumed most in the southern part of the country where coarse grains are preferred more. In comparison to other varieties of wheat, its corn is bigger and harder. It is used more for making Dalia. It is also used in making pizza and other fast foods. According to the Agriculture Department, its demand is on the increase abroad. Harda stands first in the state in Kathia production. It is also sown in some parts of Malwa and coastal regions of Narmada. Last year, its total yield was about 20 thousand hectares. This year during the spring sowing, the Government has set its target at 2 lakh tons, says Dr. J. S. Kaushal, the Agricultural Coordinator of M.P. Government. It is evident that farmers are being encouraged to sow this variety. But the things being said by the Government for promoting its production are misleading. The whole promotion exercise is overlooking one of its important aspects. Kathia is not the staple food of the people in Malwa and Narmada regions. Dalia, pizza, bread and other fast foods that are prepared using this variety are not eaten here. It means that Kathia is being brought in these areas as a cash crop. Before its arrival, soyabean was another autumn cash crop that has ousted pulses and other indigenous food crops. Persuaded by the Government, farmers took to soyabean. But after 30 years things have taken a turn for the worse. Producing soyabean is no more a profitable proposition. Its production cost is increasing, while its output level and price has become static. Farmers are bearing the consequent loss. The farmers of Hoshangabad, once called the Soya district, are turning to other crops. But the greatest problem is that alternative crops are not easily available for they were long ousted from this region by Soya. It has also adversely affected the general health here because of the resultant malnutrition. Worst affected in this respect are, of course, women. The farmers lured by Soya abandoned pulse crops and other traditional food crops long ago. If the ongoing efforts of the Government for Kathia production succeed, during both, summer and autumn season, cash crops would dominate the farming scene and farmers will have to purchase their food grains from the market at higher prices. Big farmers can afford to experiment with Kathia production, but for small and marginal farmers, it will finally bring doom. If farmers face food crisis after securing loans, their situation might become identical to their counterparts in Punjab, Haryana and Andhra? Has the Government shown them this aspect of Kathia production? But all this pertains to future. As far as the present condition is concerned, the fact of the matter is that even now the farmers producing Kathia are not in a good situation. Kisan Kumar Lakhera and Jagdish Prasad Lakhera of Hiran Khera village in Hoshangabad district are farmers using modern methods of farming. This year, they too experimented with Kathia. Regretfully, they say that when they took the step they were assured a luring price of Rs.1600 per quintal. But no arrangements were made for its procurement; no one was ready to buy it in the grain market. They were forced to sell it at prices lower than even the official procurement prices. An important reason for such a catch-22 situation was the type of seeds itself; owing to its hard variety, no one with a flour machine is ready to grind it. It may be mentioned that several private companies are doing the procurement work in agricultural sector. For instance, in Hoshangabad, ITC is buying wheat. The company bought Raj, Lokvan, 173, all varieties of wheat, but did not buy Kathia. Farmers have to buy Kathia seeds from the Government at the price of Rs. 2000 per quintal. Presently, four of its varieties are being made available. Among them, Malwa Shakti, Malwa Ratan, Malwa Swaran and Sudha 1106 are prominent. Recently launched Sudha 1106 has been developed by Agricultural Research Centre, Panwar Khera. The Agricultural Corporation makes rest of the varieties available. Farmers are sowing them with hope that they might be able to sell them as seeds. The high yields given by these varieties are another reason that farmers are taking to them. They produce 20-22 quintal of wheat per acre. Moreover, the approximate weight of its 1000 corns is 52 grams, while the same number of other crops comes to about 38-40 grams. Thus one needs to question the basis on which agricultural products are marketed. Should only prospects of economic prosperity be considered while making so vital decisions, or other social factors also count? Example of Soya has shown the transience of such economic prosperity. But a situation is being made where farmers will be left with no other option. Before promoting such new crops only on economic basis, consideration should be given to related social and political issues. CHARKHA FEATURE