खेत-खलियान पर आपका स्‍वागत है - शिवनारायण गौर, भोपाल, मध्‍यप्रदेश e-mail: shivnarayangour@gmail.com
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Friday, January 1, 2016

किसान की गर‍िमा

खेती की बात आते ही हमारे मन में एक गांव की तस्वीर बनने लगती है। बैलगाड़ी, लहलहाती फसल नज़र आने लगती है। एक तथाकथ‍ित सभ्य समाज खेतीहर लोगों को थोड़ा फर्क किस्म से देखने लगता है। मसलन एक कम पढ़ा-लिखा, सिर पर एक गमछा बांधा हुए व्यक्ति‍ की अवधारणा बना लेता है। दिक्कत यह है कि उसे बराबरी का दर्जा दिया जा सके, ऐसी छबि बिरले ही आती होगी। 

कभी इस बात का आंकलन भी नहीं होता कि जिस सिर पर गमछा या अँगोछा ओड़े व्यक्त‍ि की अवधारणा आपके जेहन में बन रही है, हमारा जीवन उसकी बदौलत ही चल रहा है। हमारे हर खाने-पीने, ओड़ने-बिछाने की सामग्री उसके सौजन्य से ही प्राप्त हो रही है। यानी मसला है कि उसकी गरिमा के बारे में हम लगभग नहीं ही सोचते हैं। एक तबका नए साल का स्वागत करने में खूब खर्चा कर रहा है। बड़ी बड़ी होटलों में पार्टी चल रही हो जिसके एक दिन पार्टी में एक किसान के परिवार के दो-तीन माह या उससे भी ज्यादा का गुज़ारा चल सकता था। वहीं यदि हम देखें तो इस समय वही किसान खेती के संघर्षपूर्ण काम में जुटा है। और यदि वह न जुटा हो तो केवल पैसे से जीवन का संचालन कर पाना सम्भव ही नहीं है। 

क्या नए साल के इस जश्न के साथ हम उस मेहनतकश को कम से कम गरिमा के साथ स्वीकार कर सकेंगे। यदि हमारी नज़र में उसका सम्मान जागता है तो इतना भी पर्याप्त है, क्योंकि इस सम्मान के चलते हम उसे अपने जीवन में जगह दे पाएंगे। 

तो नए साल 2016 की आप सभी को ढेर सारी शुभकामनाएं !!!

श‍िवनारायण गौर,
भोपाल 1 जनवरी, 2016

Wednesday, January 1, 2014

खेती में रोजगार



समय समय पर हुए तमाम अध्‍ययनों से दो बातें सामने आती रही हैं। एक तो है कि लोग खेती के ज़रिए अपनी आज़ीविका नहीं चला पा रहे हैं मसलन वे खेती छोड़ रहे हैं और दूसरा हर साल शहरों में बस्तियों की संख्‍या में इज़ाफा हो रहा है। यद्यपि इन दोनों तरह के अध्‍ययनों के बीच के सम्‍बन्‍ध को जानना थोड़ा मुश्किल हैं क्‍योंकि यह बात तो सामने आती है कि बस्तियों में रहने वाले लोगों का जीवन कैसे चल रहा है। उनके प्रमुख रोजगार क्‍या है इत्‍यादि। लेकिन इस बात को लेकर मुझे कोई अध्‍ययन नहीं दिखाई दिया जो यह बताए कि बस्तियों में आने वाले नए लोग कौन हैं ? वे शहर की इस मुश्किल जिन्‍दगी को कम से कम खुशी-खुशी तो स्‍वीकार नहीं ही कर सकते। यानी ये वे लोग हैं जो कि बस्तियों में आने से पहले अपने जीवन के संघर्षों से हारे हुए लोग हैं और विकल्‍प की तलाश में इस तरह के जटिल हालातों में हैं।
खैर खेती छोड़कर शहरी बस्तियों में आकर मज़दूरी करने वाली बात को हम सीधे तौर पर स्‍वीकार न भी करें तो भी इस बात से नहीं नकारा जा सकता है कि खेती पर संकट है। वर्तमान खेती-किसानी के विकल्‍प तलाशना फिलहाल किसानों की मजबूरी है। चूँकि खेती दरअसल केवल एक रोजगार ही नहीं है बल्कि वह एक जीवनशैली है। और जीवनशैली होने के कारण खेती से बाहर जाना किसानों के लिए खुशी की बात नहीं होती। पर यदि हम खेती पर पड़ते दबाबों को देखें तो असल में खेती से बाहर जाना ही खेती को सशक्‍त करने का एक तरीका हो सकता है। हम जानते हैं कि खेती का रकबा आए दिन कम हो रहा है और खेती पर दबाब लगातार बढ़ता जा रहा है। पर असल में खेती को छोड़कर रोजगार के अच्‍छे अवसर उपलब्‍ध कराने की महत्‍ती आवश्‍यकता है जिस पर अभी कोई खास काम नहीं हो पा रहा है। मैं एक खबर पड़ रहा था जिसमें एक अध्‍ययन के हवाले से कहा गया है कि 2014 में खेतीहर व्‍यवसाय में रोजगार के ज्‍यादा अवसर उपलब्‍ध होंगे। हालांकि इस बात को समझना भी जरूरी है कि ये खेतीहर व्‍यवसाय किस तरह के होंगे और क्‍या वे खेती-किसानी से जुड़े तबके को रोजगार के अवसर मुहैया करा पाने में समर्थ होंगे ?  खैर जो भी हमें शायद इस दिशा में सोचने की इस समय आवश्‍यकता है कि खेती के इतर रोजगार के मौके अधिक से अधिक कैसे उपलब्‍ध कराए जा सकते हैं और वह भी बिना शहरी बस्तियों में रहने वाले लोगों की संख्‍या में इजाफा किए
आप सभी को नए साल की शुभकामनाएं। 
शिवनारायण गौर

Friday, October 10, 2008

कृषि क्षेत्र में भी अमरीका का प्रवेश

2006 से ही भारत अमरीका परमाणु करार पर बहस होती रही है। पर एक महत्‍वपूर्ण करार पर आवश्‍यक रू‍प से विचार नहीं किया गया जिस पर उसी समय दोनों देश के बीच हस्‍ताक्षर कर दिए गए। वह है कृषि शिक्षा, अनुसंधान, सेवा तथा वाणिज्यिक लिंकेज (अनुबंध) से संबंधित भारत अमरिका ज्ञान पहलकदी (केआईए)।

इस समझौते में यह व्‍यवस्‍था की गई है कि क्रष्ज्ञि अनुसंधान के क्षेत्र में निजी खिलाड़ियों की मुख्‍य भूमिका होगी जो भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ( आईसीएआर) तथा राज्‍य स्‍तरीय कृषि विश्‍वविद्यालयों में भावी प्राथमिकताओं का निर्धारण करेंगे। 2006 की संयुक्‍त घोषणा ने सार्वजनिक निजी भागीदारी का दर्शन प्रस्‍तुत किया, जहां निजी क्षेत्र अनुसंधान क्षेत्रों की पहचान करने में मदद देंगे जिनके पास दोनों देशों में कृषि विकास के लिए नई तथा वाणिज्यिक य्‍प से अक्षम टेक्‍नॉलॉजी को विकसित करने की क्षमता है।

एक मुकाम तय की गई भारतीय कृषि ो एक व्‍यावसायिक दिशा की ओर बढ़ना है जहां अमरीका की अधिकाधिक घुसपैठ होगी। इसके लिए यह आवश्‍यक होगा कि सार्वजनिक क्षेत्र के अनुसंधान क्षेत्रों में भी प्रवेश किया जाए। न केवल अनुसंधान के पुनर्निमाण के वास्‍ते वैज्ञानिक विशेषज्ञता के लिए दिशा-निर्देश भी दिया जाएगा जैसा कि उद्योग की मांग होगी, बल्कि किसानों के खेतों पर भी उसे लागू करने की बात कही जा रही है। विशाल भारतीय कृषि अनुसंधान व्‍यवस्‍था और उसके विस्‍तार सेवा नेटवर्क ने पहले ही फ्रेमवर्क प्रदान कर दिया है।

अनेक तरह से यह कोई नई वास्‍तवकिता नहीं है। अमरीकी तथा अन्‍य कार्पोरेट हितों ने इस नई किस्‍म की हरित क्रांति को प्रायोजित किया है। कृषि से संबंधित ज्ञान पहलकदमी (केआईए) जैसी पहलकदमी भारतीय कृषि को नया रूप देने में निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ाएगी।

केआईए अपने उद्देश्‍य को पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। इसके कार्यकलापों में शामिल हैं बायो टेक्‍नालॉजी के क्षेत्रों में इंटर्नशिप या भारती-वालमार्ट जैसे सहयोग के जरिए उसमें प्रवेश करना। अप्रैल 2008 में पिछली बैठक ने छात्रों के लिए सार्वजनिक निजी इंटर्नशिप की छानबीन करने के लिए एक दिश-निर्देश तय किया। बाया-टेक्‍नॉलोजी के सिलसिले में एक अरहर तूर जेनोमिक्‍स पहलकदमी की स्‍थापना की है। और चावल तथा गेहूँ पर सहयोग अनुसंधान प्रोजेक्‍ट संगठित किया है। उसने तेजपत्‍ता, पपीता, केला तथा आलू के संबंध में अनुसंधान प्रोजेक्‍ट को भी बढ़ावा दिया है।

जब कृषि प्रोसेसिंग और विपणन के क्षेत्र को गति प्रदान करने की बात आती है तो केआईए ठेका फार्मिंग तथा मूल्‍य वर्धित उत्‍पादों पर जोर देती है। जैव-ईंधन की अगली पीढ़ी पर फोकस भी इस कार्य क्षेत्र का एक महत्‍वतपूर्ण क्षेत्र है।

लेकिन इस सबके आधार पर ही सवाल किया जा रहा है् अब कृषि को नई दिशा देने की रणनीति में छोटे तथा सीमांत किसानों को एकदम किनारे कर दिया गया है। कृषि अनुसंधान के परिवर्तित चेहरे एवं किसान नव परिवर्तन को कोई जगह नहीं दी गई है, जिसने एक साफ सन्‍देश दिया है। जरूरत इस बात की है कि अनुसंधान को किसानोन्‍मुख बनाया जाए और उसे वैज्ञानिकों की सहायता दी जाए न कि उसे राजनैतिक रूप दिया जाए।

इसके साथ ही यह द्रष्टिकोण ऐसा है जो अनुसंधान को संस्‍थागत रूप नहीं देता। इसका नतीजा होगा कि अंततोगत्‍वा अनुसंधान संस्‍थानों को संस्‍थागत ढॉंचे से अनुसंधान पर अपने नियंत्रण को छोड़ना पड़ेगा। जाहिर है कि इस समझैते पर भी बहस होनी चाहिए।

"कांची कोहली एवं शांलिनी भूटानी द्वारा लिखित यह लेख साप्‍ताहिक मुक्तिसंघर्ष के 28 सितम्‍बर से 4 अक्‍टूबर 2008 के अंक में छपा है। यह एक महत्‍वपूर्ण मुद्दा है जिस पर कम जानकारी उपलब्‍ध है। यदि आप इस विषय में कुछ जानकारी रखते हैं तो इस मुद्दे पर समझ बनाने के लिए अपनी राय दें। बहस को आगे बढ़ाऍं - शिवनारायण गौर