खेत-खलियान पर आपका स्‍वागत है - शिवनारायण गौर, भोपाल, मध्‍यप्रदेश e-mail: shivnarayangour@gmail.com
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Friday, November 6, 2009

गेहूं का समर्थन मूल्य 1100 रुपए होगा

दिल्ली 05 नवम्बर, 2009 केन्द्र सरकार ने गुरुवार को गेहूं सहित रबी की कई फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) बढ़ा दिया। इसके तहत सरकार ने गेहूं की एमएसपी 20 रुपए और चना की एमएसपी 30 रुपए प्रति क्विंटल बढ़ा दी है।

इसके साथ ही सरकार ने जौ और सैफफ्लावर जैसी दूसरी रबी फसलों की एमएसपी भी बढ़ा दी है। एमएसपी बढ़ाने का फैसला प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति (सीसीईए) ने लिया। बैठक के बाद गृह मंत्री पी चिदंबरम ने बताया, ‘पिछले साल की तुलना में गेहूं की एमएसपी में 20 रुपए का इजाफा कर इसे 1,100 रुपए प्रति क्विंटल निर्धारित कर दिया गया है। गेहूं का समर्थन मूल्य पहले 1080 रूपए प्रति क्विंटल था। सरकार ने रबी फसलों पर कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) की रिपोर्ट स्वीकार कर ली।
पिछले साल सरकार ने गेहूं की एमएसपी 80 रुपए प्रति क्विंटल बढ़ाई थी, जिससे गेहूं की रेकॉर्ड 8.05 करोड़ टन पैदावार हुई थी। 2009-10 सीजन के दौरान सरकार का लक्ष्य 8.2 करोड़ टन गेहूं पैदावार का है। सीसीईए ने पिछले साल की तुलना में इस साल चना की एमएसपी 30 रुपए बढ़ाकर 1,760 रुपए प्रति क्विंटल कर दी है। इसी तरफ सैफफ्लावर की एमएसपी 30 रुपए बढ़ाकर 1,680 रुपए प्रति क्विंटल और जौ की एमसपी 70 रुपए बढ़ाकर 750 रुपए प्रति क्विंटल कर दी गई है। सरकार ने तिलहन और मसूर की एमएसपी नहीं बढ़ाने का फैसला किया है। तिलहन की एमएसपी 1,830 रुपए प्रति क्विंटल और मसूर की एमएसपी 1,870 रुपए प्रति क्विंटल पर ही बरकरार है

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Tuesday, February 17, 2009

किसान को नहीं लुभाता बजट

वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने अपने भाषण में किसानों को असली नायक बताया। किसानों के लिए बजट में कुछ प्रावधान रखते हुए उन्होंने ये बात कही। हालाँकि यह अलग बात है कि केवल इसी साल कोई नई बात नहीं कही है। सरकार समय समय पर किसानों के लिए ऐसे उद्बोधन करती रहती है जिसमें उन्हें कई तरह की उपमाएं दी जाती है। लेकिन असल में केवल उपमाओं के भरोसे बजट को किसान हितैषी नहीं कहा जा सकता। जब उसके अन्य पहलुओं को देंखे तो लगता है कि यह बजट भी हर साल प्रस्तुत किए जाने वाले बजटों की भांति ही किसानों के लिए है।
इस साल के बजट में प्रमुख रूप से दो बातों की ध्यान दिया गया है। एक तो किसानों के लिए ऋण की राशि बढ़ाई गई है। और दूसरा उर्वरकों पर दी जाने वाली सब्सिडी की राशि में बढ़ोत्तरी की गई है। इसके अलावा बजट में जो प्रावधान किए गए हैं वो किसान को उतना प्रभावित नहीं करते। कर्ज की राशि में पिछले 2003-2004 के आबंटन की तुलना में तीन गुना वृद्धि कर 25 लाख करोड़ किया गया है। सरकार का कहना है कि सीमान्त और छोटे किसानों के 65,500 रुपयों की कर्जमाफी की है। गौरतलब है कि जब भी किसानों के हित की बात होती है तो उसके लिए सस्ती दर पर ऋण उपलब्ध करा देने को आसान का समाधान माना जाता है। और बजट में फिर उसी तरह के प्रावधान किए जाते हैं। असल में इस देश में सरकारी ऋण प्राप्त करने वाले किसानों से कहीं ज्यादा ऐसे किसानों की है जो कि साहूकारों से कर्ज लेते हैं। उन्हें किसी भी तरह की छूट का लाभ नहीं मिलता। और इससे भी फर्क किस्म की बात पर तटस्थता से विचार नहीं किया जाता कि असल में खेती घाटे का सौदा क्यों हो रही है? किसान को हर साल ऋण की आव6यकता क्यों होती है? यदि इनके कारणों को तलाशें तो आप पाएंगे कि असल में सरकार फसलों को वाजिब मूल्य दे पाने में असमर्थ है। उत्पादन लागत लगातार बढ़ते जा रही है। लागत को कम करने का प्रावधान कभी बजट में दिखाई नहीं देता।
केवल गेहूं की ही बात करें तो सरकार का आर्थिक सर्वेक्षण इस बात को स्वीकार करता है कि गेहूं की कीमत लागत से कम दी जा रही है। पंजाब, उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश के अलावा भी कई राज्य घाटे में गेहूं की खेती कर रहे हैं। इस साल 1080 रुपए समर्थन मूल्य तक किया गया है लेकिन एक आंकलन के मुताबिक यदि गेहूं का समर्थन मूल्य 1500 रुपए होता है तो किसानों को कुछ राहत हो सकती है। मसलन केवल ऋण की राशि बढ़ा देने से खेती का उपकार नहीं किया जा सकता। सरकार जिन 25 फसलों का समर्थन मूल्य घोषित करती है वह पर्याप्त नहीं होता। उसमें जो वृद्धि की जाती है वो लागत की तुलना में हमेशा कम ही होती है।
सरकार जोर शोर से कृषि विकास दर की बात करती है। बजट भाषण में भी इस बात का जिक्र किया गया कि यह 37 प्रति6ात रही। लेकिन असल में इस विकास दर का असली आधार नकदी फसलें हैं। और जब भी कृषि विकास दबढ़ाने की बात कही जाती है तो उसका सीधा सा मतलब है कि सरकार नकदी फसलों को और प्रोत्साहित करने की कोशिश कर रही है। पिछले पांच साल में नकदी फसलों का रकबा बढ़ा है। ये ही ऐसी फसलें है जिनमें कीटनाशकों और उर्वरकों को खूब इस्तेमाल किया जा रहा है। मसलन सब्सिडी भी नकदी फसलों की ओर ही जा रही है। नकदी फसलों की ही देर किसानों की आत्महत्या दर में भी वृद्धि है। ज्यादातर किसान आत्महत्या की घटनाएं नकदी फसल के क्षेत्रों में होती हैं। चाहे बात कर्नाटक, आन्धप्रदेश की हो या फिर महाराष्ट्र के विदर्भ इलाके की। मध्यप्रदेश में भी अब किसानों की आत्महत्याओं की खबरें यदा कदा आने लगीं हैं। एक जानकारी के मुताबिक पिछले साल तक मध्यप्रदेश में 1287 किसानों ने आत्महत्याएं की हैं। केवल सस्ती दरों पर ऋण उपलब्ध करा देने से इस समस्या का समाधान नहीं तलाश जा सकता जिसकी कोशिश प्रणव मुखर्जी कर रहे हैं।
उल्लेखनीय है कि सरकार का बजट हमेशा कार्पोरेट को बढ़ावा देने वाला होता है। सरकार ने खेती के मॉडल कानून बनाया है। इसमें प्रमुख रूप से खेती के कार्पोरेट के हाथों में जाने के रास्ते दिखाई देते हैं। मॉडल कानून के मुताबिक प्रदेश सरकारें भी मण्डी कानून में बदलाव कर रही है जिससे संविदा खेती आदि को बढ़ावा दिया जा सके। पिछले पांच साल में इसकी एक झलक आसानी से देखी जा सकती है। विरोधाभाष ये भी है कि एक तरफ रोजगार गारण्टी योजना के राशि बढ़ाई जा रही है दूसरी तरफ स्थाई रोजगार पैदा करने के लिए जरूरी खेती के वास्तविक विकास की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। कार्पोरेट खेती के चलते मजदूरों के रोजगार की सम्भावनाएं खेती में खत्म होती जा रही है। और इसके वगैर स्थाई रोजगार की बहुत सम्भावनाएं नहीं की जा सकती। खेती का असल में विकास करना है तो बजट को किसानों के हित में हाना ही चाहिए। जो असल में नहीं है।

शिवनारायण गौर


हर साल सरकार बजट बनाती है किसानों को बेचारा बनाने की कोशिश की जाती है परन्‍तु असल में किसानों के विकास की वास्‍तिवक योजनाएं नहीं बनती। इस दिशा में प्रयास किया जाना चाहिए। खेत खलियान की ओर से शिवनारायण गौर

Friday, January 30, 2009

समर्थन मूल्य की घोषणा

केन्द्र सरकार ने गत 29 जनवरी को रबी फसलों के न्युनतम समर्थन मूल्य घोषित कर दिए। कुछ फसलों के समर्थन मूल्य में वृध्दि की गई है। जैसे गेहूं का समर्थन मूल्य 1000 रुपए से बढ़ाकर 1080 रुपए प्रति क्विंटल कर दिया गया है। इसी तरह चने के मूल्य में वृध्दि की गई है। अब चना 1600 के बजाय 1730 रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से खरीदे जाएंगें। कुछ और फसलों के दाम भी बढ़ाए गए हैं। सरकार ने जान बूझकर या अनजाने में इस साल काफी देरी से समर्थन मूल्य की घोषणा की है। यदि आपको याद हो तो पिछले साल अक्टूबर के महिने में सरकार ने समर्थन मूल्य की घोषणा कर दी थी। खैर देर से ही सही थोड़ी बढ़ोत्तरी के साथ मूल्यों की घोषणा की गई है।
पिछले साल जब गेहूं का समर्थन मूल्य घोषित किया गया था तो इसमें 250 रुपए की वृध्दि की गई थी। 750 से बढ़ाकर 1000 रुपए समर्थन मूल्य किया गया था। असल में किसान की एक बड़ी समस्या फसलों का उचित दाम नहीं मिलना है। स्वयं सरकार इस बात को स्वीकार करती है कि उत्पादन लागत से कम समर्थन मूल्य दिया जा रहा है। यदि समर्थन मूल्य को नियंत्रण में रखना है तो कम से इस बात की ओर तो ध्यान दिया ही जाना चाहिए कि उत्पादन लागत को कैसे कम किया जा सकता है। आज स्थिति है कि फसलों की उत्पादन लागत लगातार बढ़ रही है। उत्पादन में ठहराव आते जा रहा है। एक समय में पंजाब में खूब उत्पादन हुआ लेकिन अब वहां हालात ठीक नहीं है जमीन अपनी उर्वरा शक्ति खो चुकी है। किसान परेशान हैं। अब दूसरे कई राज्यों में भी वैसी ही स्थिति बनने की नौबत आ रही है। यदि हम मध्यप्रदेश की बात करें तो वहां भी लागत में अनवरत वृध्दि जारी है। बात केवल गेहूं की ही नहीं हर फसल के साथ यह हो रहा है।
कई देशों में किसानों को सब्सिडी सीधे दी जाती है जिससे वे अपनी उत्पादन लागत पर नियंत्रण रख सकें लेकिन भारत में तो वह भी सम्भव नहीं है यहां जो भी सब्सिडी मिलती है वो कम्पनियों को दी जाती है जिसका सीधा फायदा किसानों को नहीं मिलता और उत्पादन लागत पर कोई नियंत्रण नहीं हो पाता। यह एक गम्भीर मसला है जिस पर खेती का भविष्य टिका हुआ है। हमें सामूहिक रूप से इस पर विचार करना चाहिए।
किसान को फसल के उत्पादन का उचित मूल्य मिले यह एक गम्भीर मसला है इस पर गहन चिन्तन की ज़रूरत है। सवाल यह भी है कि वास्तविक लागत का आंकलन करने के लिए किसानों को प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। आमतौर पर किसान उत्पादन लागत में उसके श्रम और जमीन के मूल्य को कभी नहीं जोड़ता। होशंगाबाद जिले में कार्यरत एक स्वयं सेवी संस्था ग्राम सेवा समिति ने इस दिशा मेें एक पहल की थी उसने किसानों से फसल के उत्पादन की लागत निकालने के लिए सर्वे और प्रशिक्षण दोंनो किए थे। इसका कुछ प्रभाव क्षेत्र के किसानों में दिखाई भी दिया। पर ऐसे काम को व्यापक स्तर पर किए जाने की आवश्यकता है।
शिवनारायण गौर

हर साल सरकार कोई 25 फसलों के समर्थन मूल्य घोषित करती है। सरकार का उद्देश्य किसानों को उचित दाम दिलाना और लोगों को नियंत्रित दामों पर खाद्यान्न उपलब्ध कराना है। पर यदि किसानों को लागत से कम मूल्य मिलता है तो यह चिन्तनीय है। इस पर सोचा जाना चाहिए।