खेत-खलियान पर आपका स्‍वागत है - शिवनारायण गौर, भोपाल, मध्‍यप्रदेश e-mail: shivnarayangour@gmail.com
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Wednesday, January 1, 2014

खेती में रोजगार



समय समय पर हुए तमाम अध्‍ययनों से दो बातें सामने आती रही हैं। एक तो है कि लोग खेती के ज़रिए अपनी आज़ीविका नहीं चला पा रहे हैं मसलन वे खेती छोड़ रहे हैं और दूसरा हर साल शहरों में बस्तियों की संख्‍या में इज़ाफा हो रहा है। यद्यपि इन दोनों तरह के अध्‍ययनों के बीच के सम्‍बन्‍ध को जानना थोड़ा मुश्किल हैं क्‍योंकि यह बात तो सामने आती है कि बस्तियों में रहने वाले लोगों का जीवन कैसे चल रहा है। उनके प्रमुख रोजगार क्‍या है इत्‍यादि। लेकिन इस बात को लेकर मुझे कोई अध्‍ययन नहीं दिखाई दिया जो यह बताए कि बस्तियों में आने वाले नए लोग कौन हैं ? वे शहर की इस मुश्किल जिन्‍दगी को कम से कम खुशी-खुशी तो स्‍वीकार नहीं ही कर सकते। यानी ये वे लोग हैं जो कि बस्तियों में आने से पहले अपने जीवन के संघर्षों से हारे हुए लोग हैं और विकल्‍प की तलाश में इस तरह के जटिल हालातों में हैं।
खैर खेती छोड़कर शहरी बस्तियों में आकर मज़दूरी करने वाली बात को हम सीधे तौर पर स्‍वीकार न भी करें तो भी इस बात से नहीं नकारा जा सकता है कि खेती पर संकट है। वर्तमान खेती-किसानी के विकल्‍प तलाशना फिलहाल किसानों की मजबूरी है। चूँकि खेती दरअसल केवल एक रोजगार ही नहीं है बल्कि वह एक जीवनशैली है। और जीवनशैली होने के कारण खेती से बाहर जाना किसानों के लिए खुशी की बात नहीं होती। पर यदि हम खेती पर पड़ते दबाबों को देखें तो असल में खेती से बाहर जाना ही खेती को सशक्‍त करने का एक तरीका हो सकता है। हम जानते हैं कि खेती का रकबा आए दिन कम हो रहा है और खेती पर दबाब लगातार बढ़ता जा रहा है। पर असल में खेती को छोड़कर रोजगार के अच्‍छे अवसर उपलब्‍ध कराने की महत्‍ती आवश्‍यकता है जिस पर अभी कोई खास काम नहीं हो पा रहा है। मैं एक खबर पड़ रहा था जिसमें एक अध्‍ययन के हवाले से कहा गया है कि 2014 में खेतीहर व्‍यवसाय में रोजगार के ज्‍यादा अवसर उपलब्‍ध होंगे। हालांकि इस बात को समझना भी जरूरी है कि ये खेतीहर व्‍यवसाय किस तरह के होंगे और क्‍या वे खेती-किसानी से जुड़े तबके को रोजगार के अवसर मुहैया करा पाने में समर्थ होंगे ?  खैर जो भी हमें शायद इस दिशा में सोचने की इस समय आवश्‍यकता है कि खेती के इतर रोजगार के मौके अधिक से अधिक कैसे उपलब्‍ध कराए जा सकते हैं और वह भी बिना शहरी बस्तियों में रहने वाले लोगों की संख्‍या में इजाफा किए
आप सभी को नए साल की शुभकामनाएं। 
शिवनारायण गौर

Sunday, November 25, 2007

नई किसान नीति

शुक्रवार को संसद में पेश राष्ट्रीय किसान नीति में किए गए हैं। नीति में कृषि को लाभप्रद बनाने के लिए भूमि, सिंचाई, फर्टिलाइजर, कीटनाशक और बीजों के उचित प्रबंधन की जरूरत पर जोर दिया गया है।
घटती भूमि और कृषि उत्पादन बढ़ाने की जरूरत को पूरा करने के लिए अब और खेती की जमीनों के गैर कृषि उपयोग पर प्रतिबंध लगाने जैसे कड़े कदम उठाने की बात कही गई है। साथ ही यह नुक्ता भी जोड़ा गया है कि अगर किन्हीं कारणों से खेती की जमीनों का उपयोग गैर कृषि कायरें में किया जाता है तो उतनी ही बंजर व ऊसर भूमि को खेती लायक बनाना अनिवार्य होगा। उन्नत बीजों की जरूरतों को पूरा करने के लिए किसान बीज कंपनी बनाने का प्रावधान भी किया गया है। फर्टिलाइजर व कीटनाशकों का उचित प्रयोग न होने से फसलों को भारी नुकसान होता है।
खेती के बुनियादी ढांचे को मजबूत बनाने के लिए भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाने और सिंचाई की सुविधाओं में वृद्धि के उपायों का भी जिक्र नई नीति में किया गया है। मौजूदा संसाधनों से ही सिंचाई में 10 प्रतिशत की वृद्धि संभव है। इसके लिए जल प्रबंधन में सुधार की जरूरत बताई गई है। किसानों को उनकी फसलों के उचित मूल्य दिलाने और आय के अन्य साधन मुहैया कराए जाएंगे। खेती में पुरुषों के साथ महिलाओं की हिस्सेदारी को बढ़ाने के उपाय भी किए जाएंगे।
आसान कृषि ऋण के लिए ग्रामीण बैंकिंग प्रणाली बढ़ाने की तत्काल जरूरत है, जिससे उन्हें पर्याप्त और रियायती दरों पर ऋण मिल सके। निचले स्तर तक कृषि ऋण और बीमा सुविधाएं उपलब्ध होने से कृषि उत्पादकता में स्वाभाविक वृद्धि होगी। खेती अति जोखिम वाला क्षेत्र है, जिसमें फसलों की बुआई से लेकर खलिहान तक खतरे ही खतरे हैं। इसमें किसान व फसलों का बीमा उसे सुरक्षा प्रदान करेगा।
कृषि शिक्षा व अनुसंधान के क्षेत्र में पर्याप्त सुधार की जरूरत बताई गई है, जिसके लिए पाठ्यक्रमों में संशोधन आवश्यक है। कृषि स्नातकों को खेती व उससे जुडे़ व्यवसाय की ओर आकर्षित करने के उपाय किए जाएंगे। किसानों की सामाजिक सुरक्षा के साथ खेती के साथ अन्य गैर कृषि रोजगार भी उपलब्ध कराने के प्रावधान होने चाहिए। नई किसान नीति में खेती से जुड़े अन्य रोजगार दुग्ध उद्योग, मुर्गीपालन, मत्स्य पालन और बागवानी को पूरी तरजीह दी गई है। नई नीति में खेतिहर-मजदूरों के लिए गांवों के तालाबों व अन्य जोहड़ों को मत्स्य पालन के लिए आवंटित करने की बात कही गई है।

Friday, November 16, 2007

राष्ट्रीय कृषि नीति का विश्लेषण

गौरतलब है कि सन् 2000 में भारत सरकार के तात्कालीन कृषिमंत्री श्री नीतिश कुमार ने नयी कृषि नीति को घाषित किया था। 2000 के बाद से कोई कृषि नीति नहीं बनी है। हां राष्ट्रीय किसान आयोग ने अपनी नीति से संबंधित अनुशंसाएँ जरूरी जारी की हैं। संसद में पेश यह नीति मूलत: अंग्रेजी में तैयार हुई हैं, और हिन्दी मसविदे पर अनुवाद की छाया, अटपटे शब्दों व भाषा की कृत्रिमता बहुत स्पष्ट है। अंग्रेजी में राष्ट्रीय कृषि नीति का बनना स्वाभाविक है, क्योंकि ऐसी हर नीति सरकार में बैठे अफसर व विशेषज्ञ ही तैयार करते हैं, जिनकी भाषा अंग्रेजी ही होती है। अब तो अफसरों व विशेषज्ञों के ऊपर उनके मालिक विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष तथा विश्व व्यापार संगठन ही सारी नीतियां लिखवा रहे हैं, उनकी भी भाषा अंग्रेजी ही है। राष्ट्रीय कृषि नीति पर भी विश्व बैंक और विश्व व्यापार संगठन की मुहर बहुत स्पष्ट है।नई राष्ट्रीय कृषि नीति के प्रारंभिक पांच पैराग्राफ तो सही व निर्दोष प्रतीत होते हैं। इनमें भारतीय जीवन में खेती का स्थान, कृषि विकास की कमियां, बढ़ती विषमताओं, भूमंडलीकरण से पैदा हुई जलिटताओं, खेतिहर समुदायों की दयनीय स्थिति, पर्यावरणीय असंतुलन आदि को स्वीकार करते हुए कृषि नीत के उद्देश्यों को बताया गया है। उद्देश्य भी ऐसे हैं जिनसे असहमति की गुंजाइश कम है, जैसे कृषि उत्पादन में 4 प्रतिशत से अधिक वृध्दि की दर, जल-जमीन-जैव विविधता की सुरक्षा एवं संसाधनों के समुचित उपयोग पर आधारित विकास, समतामूलक विकास, मांग आधारित विकास (इस पर कुछ सवाल हो सकते है) और टिकाऊ विकास। कुल मिलाकर यदि राष्ट्रीय कृषि नीति के मसविदे का प्रथम पांच पैरा पढ़ें तो कृषिमंत्री बहुत क्रांतिकारी, जनवादी व पर्यावरणवादी सोच के आदमी मालूम पड़ते है।लेकिन इसके बाद आगे पढ़ने पर कृषि नीति का असली चेहरा और असली इरादा सामने आता है। इधर-उधर की लफ्फाजियों को निकाल दें तो राष्ट्रीय कृषि नीति बहुराष्ट्रीय पूंजीवाद, भूमंडलीकरण, कथित उदारीकरण और निजीकरण के एजेंडा को ही आगे बढ़ाती है। असली सवालों से जी चुराते हुए यह नीति वे ही समाधान पेश करती है जो समस्याओं के मूल में है।उदाहरण के लिए दूसरे पैरा में ही इसमें स्वीकार किया गया है कि नब्बे के दशक में कृषि के विकास में ढील आई है। क्या यही एक स्वाकारोक्ति अपने आप में नब्बे के दशक में अपनायी गई आर्थिक नीतियों पर प्रश्नचिन्ह नहीं खड़ा करती है? कृषि नीति के दस्तावेज में ढील के कारण बताये गये हैं - उपयुक्त पूंजी की कमी तथा आधारभूत संरचनाओं का अभाव, बाजार में उत्पादों की मांग की सीमाएं, कृषि उत्पादों के आवागमन, रखरखाव एवं बिक्री पर नियंत्रण आदि। कृषि नीति घोषणा भी करती है कि ''कृषि उत्पादों'' के घरेलू बाजार का पूर्ण उदारीकरण कर दिया जाएगा और कृषि उत्पादों की आवाजाही पर प्रतिबंध धीरे-धीरे समाप्त कर दिये जाएँगे।इसी प्रकार कृषि उपज की मांग बढ़ाने के लिए इस कृषि नीति में एक ही फारमूला है - निर्यात। पूरे मसविदे में कम से कम एक दर्जन बार ''निर्यात'' शब्द आता है। लेकिन ''निर्यातोन्मुखी विकास'' पर कई सवाल खड़े हो रहे हैं, उन्हें यह नीति बिलकुल नजरअंदाज करती है। सच तो यह है कि दुनिया के गरीब देशों को निर्यात बढ़ाने का उपदेश देने वाले अमीर देशों का दुनिया के व्यापार पर इतना नियंत्रण है कि वे अपने किसानों और उद्योगों को बाहरी प्रतिस्पर्धा से पूरी सुरक्षा देते हैं, उत्पादन व निर्यात के लिए भारी अनुदान देते हैं, और उन्हीं वस्तुओं को अपने देश में आने देते हैं जिनकी उन्हें जरूरत है। लेकिन निर्यात बढ़ाने के लिए बैचेन गरीब देश आपस में प्रतिस्पर्धा करते हैं और इस चक्कर में अपनी पैदावार बहुत सस्ते दामों पर अमीर देशों के अमीर उपभोक्ताओं की सेवा में पेश करते रहते हैं।दूसरी ओर निर्यात पर जोर देने के चक्कर में एक नुकसान यह हो रहा है कि हम अपने देश की सौ करोड़ आबादी की जरूरतों को पूरा करने की बजाए अमीर देशों के अमीर उपभोक्ताओं की विलासितापूर्ण जरूरतों पर ध्यान केन्द्रित कर रहे है। ''खाद्य सुरक्षा'' की बात राष्ट्रीय कृषि नीति के पहले पैरे में आयी है, लेकिन उसके बाद वे भूल गए हैं कि देश की विशाल आबादी का पेट भरना हमारी कृषि नीति का पहला व प्राथमिक उद्देश्य होना चाहिए। यह आबादी यदि गरीबी व कुपोषण को कुचक्र से बाहर निकलेगी, तो खाद्यान्नों व कृषि उपज की मांग भी बढ़ेगी और कृषि उत्पादन में भी तेजी आएगी।पहले पैरे में ही यह भी कहा गया है '' कृषि का विकास खाद्य क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर आत्मनिर्भरता के लिए तो जरूरी है ही.........''। लेकिन जिस ढंग से विश्व व्यापार संगठन की शर्तों के तहत खाद्यान्न व कृषि उपज के आयात को भारत सरकार द्वारा खुली छूट दी जा रही है उससे तो आत्मनिर्भरता की बात अतीत की हो गयी है। सबसे बढ़िया उदाहरण तो खाद्य तेलों का है। तिलहनों का उत्पादन बढ़ाते-बढ़ाते हम नब्बे के दशक के प्रारंभ में लगभग आत्मनिर्भरता पर पहुंच गये थे। आयात मात्र तीन प्रतिशत रह गया था। लेकिन पिछले दो वर्षों से खाद्य तेलों के आयात को खुली छूट देने से देश में अमरीका के सोया-तेल और मलेशिया के पाम-आईल की बाढ़ आ गयी है।भारतीय खेती पर आयात के सबसे बड़े संकट पर राष्ट्रीय कृषि नीति आश्चर्यजनक रूप से मौन है। सत्ताइसवें पैरे में जाकर यह मात्र दो-तीन पंक्तियों में इतना कहती है कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार की लगातार समीक्षा की प्रणाली विकसित की जाएगी और करों को समुचित सुरक्षा प्रदान की जायेगी। लेकिन खाद्य तेलों के अनुभव से स्पष्ट है कि मात्र आयात शुल्क बढ़ाने से आयात कम नहीं होते, क्योंकि उन वस्तुओें के निर्यातक देशों की अनुदान देने की क्षमता असीमित है।विश्व व्यापार संगठन की गुलामी राष्ट्रीय कृषि नीति में भी निर्लज्जता से स्वीकार की गयी है, जहां यह कहा गया है कि ट्रिप्स समझौते के तहत फसलों की नई किस्मों पर शोध तथा प्रजनन को प्रोत्साहन देने के लिए पौधों की सुरक्षा का कानून बनाया जाएगा (पैरा 23)। इस कारण से कंपनियों को अपने नए बीजों के विषय में पेटेंट जैसा ही एकाधिकार स्थापित करने की सुरक्षा मिलेगी। उनके मुनाफे बढ़ जाएँगे। वास्तव में मोनसेन्टो जैसी अनेक बदनाम कंपनियां भारत में अपना कारोबार शुरू करने के लिए इसी कानून की राह देख रही हैं।बहुराष्ट्रीय कंपनियों को समर्पित इस कानून की ज्यादा आलोचना होने लगी तो इसके नाम से ''किसानों के अधिकार'' को भी जोड़ दिया। लेकिन कानून के वर्तमान मसौदे की 89 धाराओं में मात्र एक धारा किसानों के लिए है और उसमें भी किसानों के अधिकार के नाम पर यह कहा गया कि किसान कंपनियों के रजिस्टर्ड बीज से पैदा उपज को बेचने या रखने के लिए स्वतंत्र होंगे, लेकिन उसको ''बीज'' के रूप में बेच नहीं पाएँगे। यह अधिकार है या मजाक? उपज तो किसान बेचेंगे ही, नहीं तो बीज का इस्तेमाल ही क्यों करेंगे?इस नए कानून के साथ भारत की खेती में जैव टेक्नालॉजी और जीन-इंजीनियरिंग का बड़े पैमाने पर प्रवेश होगा, जो आज दुनिया की बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सबसे बड़े और फलते-फूलते धंधों में से एक है। राष्ट्रीय कृषि नीति में कम से कम चार जगह इसके उपयोग और प्रोत्साहन की बात कही गई है। लेकिन इसका स्वागत करने से पहले जीन-संशोधित बीजों और प्रजातियों पर पूरी दुनिया में जो सवाल उठ रहे हैं उन पर भी गौर कर लेना चाहिए।कृषि नीति में जीन-संशोधित प्रजातियों के अलावा अन्य कई प्रकार से आधुनिक टेक्नोलॉजी का सहारा लेने की बात कही गयी है। ग्रीनहाउस, शीत घरों की श्रृंखला, बूंदाबांदी या टपक सिंचाई, कंप्यूटरीकरण, मछली पकड़ने की नावों के मशीनीकरण, गहरे समुद्र में मछली उद्योग के तंत्र आदि की चर्चा इसमें है।इस कृषि नीति का एक हिस्सा ''खतरा प्रबंधन'' को समर्पित है। एक प्रकार से यह स्वीकार किया है कि भारतीय खेती में जोखिम और खतरे बढ़े हैं। इसके लिए इस कृषि नीति में एक ही दवा है, वह है राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना। लेकिन फसल बीमा योजना का अभी तक का अनुभव बहुत खराब रहा है, और उससे किसानों को कोई मदद नहीं मिली है, सिर्फ बीमा कंपनियों का धंधा बढ़ा है।

( विकास संवाद के लिए तैयार एग्री पैक का हिस्सा - शिवनारायण )