खेत-खलियान पर आपका स्‍वागत है - शिवनारायण गौर, भोपाल, मध्‍यप्रदेश e-mail: shivnarayangour@gmail.com
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Friday, January 1, 2016

किसान की गर‍िमा

खेती की बात आते ही हमारे मन में एक गांव की तस्वीर बनने लगती है। बैलगाड़ी, लहलहाती फसल नज़र आने लगती है। एक तथाकथ‍ित सभ्य समाज खेतीहर लोगों को थोड़ा फर्क किस्म से देखने लगता है। मसलन एक कम पढ़ा-लिखा, सिर पर एक गमछा बांधा हुए व्यक्ति‍ की अवधारणा बना लेता है। दिक्कत यह है कि उसे बराबरी का दर्जा दिया जा सके, ऐसी छबि बिरले ही आती होगी। 

कभी इस बात का आंकलन भी नहीं होता कि जिस सिर पर गमछा या अँगोछा ओड़े व्यक्त‍ि की अवधारणा आपके जेहन में बन रही है, हमारा जीवन उसकी बदौलत ही चल रहा है। हमारे हर खाने-पीने, ओड़ने-बिछाने की सामग्री उसके सौजन्य से ही प्राप्त हो रही है। यानी मसला है कि उसकी गरिमा के बारे में हम लगभग नहीं ही सोचते हैं। एक तबका नए साल का स्वागत करने में खूब खर्चा कर रहा है। बड़ी बड़ी होटलों में पार्टी चल रही हो जिसके एक दिन पार्टी में एक किसान के परिवार के दो-तीन माह या उससे भी ज्यादा का गुज़ारा चल सकता था। वहीं यदि हम देखें तो इस समय वही किसान खेती के संघर्षपूर्ण काम में जुटा है। और यदि वह न जुटा हो तो केवल पैसे से जीवन का संचालन कर पाना सम्भव ही नहीं है। 

क्या नए साल के इस जश्न के साथ हम उस मेहनतकश को कम से कम गरिमा के साथ स्वीकार कर सकेंगे। यदि हमारी नज़र में उसका सम्मान जागता है तो इतना भी पर्याप्त है, क्योंकि इस सम्मान के चलते हम उसे अपने जीवन में जगह दे पाएंगे। 

तो नए साल 2016 की आप सभी को ढेर सारी शुभकामनाएं !!!

श‍िवनारायण गौर,
भोपाल 1 जनवरी, 2016

Saturday, July 31, 2010

पंजाब में कृषि का अभिशाप

1970 की हरितक्रान्ति ने पंजाब को भारत का अनाज भंडार दिया था। हमारे पूरे देश की भूख मिटाने के लिए पंजाब की कृषिभूमि का इतना दोहन किया गया जिसकी कीमत आज पंजाब के किसान अपने जीवन से दे रहे हैं। गुरूनानक जी ने कहा था कुदरत के सब वंदे किन्तुक पंजाब ने अपनी जमीन को रसायनों से इतना पाट दिया है कि आज कुदरत अपना बदला लेने को मजबूर हो कई है। कुदरत या प्रकृति को जो अपना गुलाम बनाने की भूल करता है उसका स्वनयं का अस्तित्वो ही खतरे में पड़ जाता है। विश्वम की कोई भी शक्ति प्रकृति से जीत नहीं सकती है। हम प्रकृति से हैं प्रकृति हमसे नहीं है।
आइए पंजाब को समझें इसके उत्तनर में जम्मू कश्‍मीर राज्य , दक्षिण में हरियाणा और राजस्थान, पूर्व में हिमाचल प्रदेश और पश्चिम में पाकिस्ताहन है। भारत के कुल भूभाग का पंजाब 1.5 प्रतिशत मात्र है। देश का डेढ़ प्रतिशत भूभाग वाला पंजाब देश के कुल गेहूं उत्पा दन का 22 प्रतिशत, चावल का 12 प्रतिशत, कपास का 12 प्रतिशत पैदा करता है1 फसल की गहनता 186 प्रतिशत है। प्रति हेक्टेियर खाद का उपयोग 177 किलोग्राम है जबकि इसका राष्ट्री य औसत 99 किलोग्राम है। राज्य का भैगोलिक क्षेत्रफल 50.36 लाख हेक्टेतयर है जिसमें से 42.90 लाख हेक्टेरयर पर खेती होती है अर्थात अधिकांश भूमि पर खेती होती है केवल 7-8 लाख हेक्‍टेयर भूमि पर शहर, गांव, कारखाने, सड़कें आदि हैं। पंजाब के कुल क्षेत्र के 33.88 पर नहरों से सिंचाई होती है। सन 1970 में पंजाब में 1.2 लाख ट्यूबवेल थे जो सन 2009 में बढ़कर 12.32 लाख हो गए याने बारह जिलों के पंजाब में हर जिले में एक लाख से अधिक ट्यूबवेल हैं। 1980 में 739 एमएम औसत वर्षा होती थी जो सन 2006 तक घटकर 418.3 एमएम रह गई है। पंजाब के 40 ब्ला क में भूमिगत जल 50 फुट और नीचे चला गया है। एक अनुमान के अनुसार सन 2023 तक 66 प्रतिशत क्षेत्र का पानी वर्तमान स्त र से 50 फुट नीचे और पंजाब के 34 प्रतिशत क्षेत्र का जल स्त0र वर्तमान स्तेर से 70 फुट नीचे चला जाएगा। पानी के नीचे जाने का मतलब भूमि का रेगिस्ताचन में बदल जाना है। आज भी पानी का इतना संकट है कि 10 जून के पूर्व धान की खेती की सरकार से अनुमति नही है। कुंए और तालाब सूख गए हैं हेंडपम्पस की स्थिति पूछिए मत।
अब सुनिए देश के कुल कृषि क्षेत्र का 1.5 प्रतिशत पंजाब जबकि देश के कुल कीटनाशकों का 18 प्रतिशत पंजाब की खेती में उपयोग होता है पंजाब मालवा क्षेत्र का कपास बेल्टश पूरे पंजाब का सिर्फ 15 प्रतिशत क्षेत्र है और इसमें पूरे पंजाब का 70 प्रतिशत कीटनाशकों का उपयोग होता है। एक अध्य यन के अनुसार पंजाब का मालवा क्षेत्र देश के कुल भूभाग का 0.5 भाग है जबकि यह पूरे देश के कीटनाशकों का 10 प्रतिशत उपयोग में लाता है। फिरोजपरु, फरीदकोट, मुक्तशसर, भंटिंगा, मांसा और संगरूर जिले रसायनों के अत्य धिक प्रयोग वाले जिले हैं। इनकी जमीन रेगिस्ता री होती जा रही है। इस क्षेत्र का मलसिंहवाला गांव तो पूरा का पूरा बिकने को तैयार है।
रासायनिक खाद और कीटनाशकों के अत्यहधिक उपयोग से जमीन के पोषक तत्व , सूक्ष्मै जीवाणु और केंचुए आदि खत्मय हो गए हैं। कृषि भूमि में जरूरी पोषक तत्वों जैसे जिंक, सल्फ र, जस्ताप, लोहा, जैविक कार्बन आदि बिलकुल नष्टय हो गए हैं। अनवर जमाल दिल्ली के डारेक्टोर ने एक डॉक्यूबमेंटरी फिल्म् पंजाब की खेती पर बनाई है। HARVEST OF GRIEF (दुखों की खेती. अधिक जानना चाहते हैं तो 12 अप्रैल 2010 का इंडियन एक्सचप्रेस पढ़ें।) इस फिल्म के अनुसार पंजाब में खेती के असफल होने के अनेक कारणों में एक भागड़ा बांध परियोजना का फैल होना और सिंचाई के पानी की ऊंची लागत होना भी है। प्रफुल्ल विदवई और वंदना शिवा जैसवे बड़े पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के सम्मुतख इस फिल्मो का प्रदर्शन इंडिया इंटरनेशनल सेंटर दिल्लीे में किया गया था। पंजाब में किसान उधारी के चक्र में फँस गया है। आत्महत्याओं की संख्या में बहुत वृद्धि हो रही है। केमिकल पर आधारित खेती, खराब होती जमीन, पानी का दूषित होना और कर्ज के कारण किसान आत्मंहत्यात कर रहे हैं।
पंजाब के 1410 ब्‍लाक में से 103 ब्ला्कों में भूमिगत जल खतरे के निशान से भी नीचे चला गया है। सेन्ट्र ल ग्राउन्डस वाटर बोर्ड के अनुसार पंजाब के 12 ब्लाक भूमिगत जल के डार्कजोन में आ गए हैं। जालंधर, मोगा और लुधियाना क्षेत्र में पानी का दोहर 200 से 250 गुना और मोगा के निहालसिंगवाला ब्लामक में 400 गुना पानी का दोहन हुआ है। विशेषकर धान की खेती के लिए जल का दोहन बढ़ा है। 2009 में NASA के वैज्ञानिकों ने भूमिगत जल और खेती के नष्ट होने की चेतावनी दी थी। गतवर्ष नासा ने चेतावनी दी कि उत्तेर भारत के कुछ क्षेत्रों में भूमिगत जल सेटेलाइट से दिखना बन्द हो गया है। इसलिए पंजाब में सरकार ने 10 जून से पहले धान की खेती पर प्रतिबंध लगा दिया है। पंजाब में वर्षा का औसत भी कम होते जा रहा है। पानी नहीं गिरने से भूमिगत जल के अत्यनधिक दोहन के कारण सरकार भी मुफ्त बिजली की नीति बन्दइ कर रही है बिजली के बिल भरने में ही अनेक किसान दिवालिया हो जाएंगे। पंजाब में किसान सबमर्सिबल पम्पइ लगाने लगे हैं। डार्क जोन में 450 फीट पर पानी मिलता है। सबमजर्सिबल पम्पों से हुई हानि को बरसात भी पूरा नहीं कर सकती है।
खेतों में रसायनों के प्रयोग और अत्य धिक भूमिगत जल के दोहन के कारण भयंकर बीमारियां फैल रही हैं। ये रोग पटियाला और अमृतसर की ओर फैल रहे हैं। हाल ही में विकलांग बच्चोंद के जन्म् ‍ की संख्याि बढ़ने लगी है। मालवा क्षेत्र के 149 बीमार बच्चों में से 80 प्रतिशत के बालों में यूरेनियम की अत्यिधिक मात्रा पाई गई है। कई लोग इसे अफगानिस्ता न में अमेरिका द्वारा यूरेनियम के बामों का प्रभाव बताते हैं। एक अध्येयन के अनुसार पंजाब का 80 प्रतिशत पानी मनुष्यों के पीने लायक नहीं रहा है। 2001-09 के बीच अकेले मुक्तबसर जिले में 1074 व्योक्तियों की केंसर से मृत्यु हुई है और 668 गंभीर अवस्था। में हैं। मालवा क्षेत्र में केंसर अस्प्ताल नहीं होने से लोग बीकानेर इलाज के लिए जाते हैं। फोरेंसिक लेब पटियाला ने 12 जिलों के खून के सेम्पकल लिए जिनमें 6 से 13 प्रतिशत पेस्टिसाइड खून में मिला है। डॉ. अम्बेंडकर नेशनल इंस्टी ट्यूट जालंधर ने 34 गांवों के पानी के हेंडपम्पों में यूरेनियम पाया है जिनमें मांसा जिले की स्थिति गंभीर है।
भटिंडा जिले में यूरेनियम की सान्द्रकता 30 माइक्रोग्राम प्रति लीटर पाई गई जबकि यह 9 से अधिक नहीं होना चाहिए। पंजाब सरकार इन गंभीर क्षेत्रों में 200 आर.ओ. रिवर्स सिस्टकम लगा रही है परन्तुन वैज्ञानिकों के अनुसार आर.ओ. सिस्ट्म से हेवीमेटल्स3 जैसे आर्सेनिक, क्रोमियम, लोहा आदि को दूर नहीं किया जा सकता है। ग्रीनपीस ने भटिडा, फरीदकोट, मांसा, संगरूर, मुक्त सर और मोगा जिलों में स्थिति गम्भीोर पाई है।
भैंस का दूध भी प्रदूषित हो गया है। 2500 लोगों की मृत्यु के बाद बिसरा की जांच की गई जिसमें डी.डी.टी. र्इंधन और इंडोसल्फाभन रसायन मिले हैं। 10 वर्ष से कम और 10-35 वर्ष के बच्चों में केंसर पाया गया। बच्चे
बचपन में बुढ़ा गए हैं। जोड़ों का दर्द, गठिया, और कंकाल फ्लोरोसिस के मरीज बढ़े हैं। त्व चा व फेंफड़ों का केंसर भी बढ़ा है। कुल मिलाकर पंजाब की खेती अभिशाप बनते जा रही है।
प्रो. कश्मीर सिंह उप्पल, मो. 09425040457

श्री प्रो. कश्मीर सिंह उप्पल सेवा निवृत्तक प्रोफेसर हैं। वे मध्य प्रदेश के इटारसी नामक क़स्बे में रहते हैं। इटारसी से ही प्रकाशित एक साप्ता्हिक अखबार नगरकथा में आपका नियमित कॉलम प्रकाशित होता है। यह आलेख उनकी अनुमति से खेत खलियान में प्रकाशित किया जा रहा है। उनसे सीधे सम्पहर्क मो. नं. 09425040457 पर किया जा सकता है। खेत खलियान की ओर से शिवनारायण गौर

Friday, March 27, 2009

भूख के मामले में विश्व में भारत का प्रथम स्थान

ग्रामीण गरीबी दूर करने में भारत पिछड़ रहा है। यहां 23 करोड़ लोग कुपोषण के शिकार हैं जो विश्व भर में सबसे ज्यादा है। भारत में बच्चों की कुल मौतों में से 50 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के कारण मरते हैं। जबकि प्रत्येक तीसरे व्यस्क व्यक्ति का वजन कम होता है।
यह बात ग्रामीण भारत के खाद्य सुरक्षा की हालत के बारे में एक अध्ययन रिपोर्ट में कही गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यद्यपि मुद्रास्फीति जुलाई, 2008 में 12 प्रतिशत थी, जो 13 साल में सबसे ज्यादा थी, जनवरी, 2009 में घटकर 5 प्र्रतिशत रह गई, लेकिन इस अवधि में खाद्यान्नों की मुद्रास्फीति 5 प्रतिशत से बढ़कर 11 प्रतिशत हो गई जो दो गुना से भी अधिक है। वर्ष 2008-2009 में खाद्यान्नों की पैदावार रिकार्ड 228 मिलियन टन होने की उम्मीद है लेकिन 2015 तक देश की आबादी की जरूरत 250 मिलियन टन से ज्यादा होगी।
रिपोर्ट में कहा गया है कि 119 देशों के ग्लोबल हंगर इन्डेक्स में भारत का स्थान 94वां है। संयुक्त राष्ट्र विश्व खाद्य कार्यक्रम (डब्लूएफपी) द्वारा जारी इस रिपोर्ट में कुछ चौकाने वाली बातें बातें कही गई हैं। इसमें कहा गया है कि विश्व की कुपोषण जनसंख्या का 27 प्रतिशत से अधिक भारत में है, देश के 43 प्रतिशत बच्चे (5 साल से कम उम्र के बच्चे) कम वजन के हैं। यह आंकड़ा विश्व में सबसे ज्यादा है। तथा वैश्विक औसत 25 प्रतिशत से भी काफी अधिक है। कम वजन वाले बच्चों का भारत का प्रतिशत सब-सहारा, अफ्रीका से भी अधिक है।
रिपोर्ट के अनुसार 70 प्रतिशत से अधिक बच्चों में खून की कमी रहती है और 80 प्रतिशत बच्चों को विटामिन पूरक उपलब्ध नहीं है। इसमें कहा गया है कि पिछले छह सालों मे खून की कमी वाले बच्चों की संख्या में 6 प्रतिशत की वृध्दि हुई। 19 में से 11 राज्यों में 80 प्रतिशत बच्चों में खून की कमी है।
शारीरिक रूप से कमजोर महिलाओं का प्रतिशत पिछले छह सालों में 40 प्रतिशत बना हुआ है तथा ऐसी महिलाओं की सख्या असम, बिहार, मध्य पद्रेश और हरियाणा में बढ़ रही है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में महत्वाकांक्षी लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली विफल होती जा रही है। खाद्यान्न सब्सिडी कम करने का लक्ष्य प्राप्त करने के अलावा इससे बड़े पैमाने पर गरीब वर्गो के लिए खाद्य असुरक्षा की स्थिति भी पैदा हुई।
सार्वजनिक वितरण प्रणाली के साथ एक अन्य समस्या है किसी एक परिवार को कितना खाद्यान्न मिलना चाहिए। शुरू में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवार के लिए प्रतिमाह 10 किलो अनाज आवंटित किया गया। पांच सदस्यों वाले परिवार के लिए यह प्रति व्यक्ति 2 किलो होता है। जबकि आईसीएमआर की सिफारिश के अनुसार यह प्रतिव्यक्ति प्रतिमाह 11 किलो यानी 5 सदस्यों वाले परिवार के लिए 55 किलो होना चाहिए। 2001 के केन्द्रीय बजट में इसे बढ़ाकर प्रतिमाह 20 किलो तथा अप्रैल 2002 में इसे और बढ़ाकर 35 किलो किया गया।
रिपोर्ट में भूख और गरीबी की सरकार की परिभाषा पर भी सवाल उठाया गया है। प्रो. एमएस स्वामीनाथन का कहना है कि पोषाहार सुरक्षा का मतलब है प्रत्येक बच्चे, महिला और पुरूष को संतुलित भोजन, स्वच्छ पेयजल, सफाई तथा प्राथमिक चिकित्सा उपलब्ध होना चाहिए।
रिपोर्ट में कहा गया है कि लगभग 80 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों के घरों में शौचालय नहीं है। छत्तीसगढ़, झारखण्ड, उड़ीसा और मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में यह संख्या 90 प्रतिशत से अधिक है।
भारत में 5 साल से कम उम्र के 48 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के कारण शारीरिक एवं मानसिक रूप में कम विकसित होते हैं। यह विश्व में सबसे ज्यादा है। स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार देश का हर दूसरा बच्चा शारीरिक एवं मानसिक रूप से पूरी तरह विकसित नहीं हो पाता है।
रौन्तेय सिन्हा

यह आलेख मुक्ति संघर्ष साप्ताहिक के 22-28 मार्च, 2009 के अंक में प्रकाशित हुआ है। अखबार से साभार इसे हम यहां प्रसारित कर रहे हैं। उम्मीद है आपके लिए उपयोगी जानकारी वाला होगा। धन्यवाद।खेत खलियान की ओर से शिवनारायण गौर

Friday, February 27, 2009

पोस्‍टर प्रदर्शनी

हाल ही में होशंगाबाद के पास के एक गांव निटाया में ग्राम सेवा समिति की एक बैठक में जाने का मौका मिला। ग्राम सेवा समिति इन दिनों जैविक खेती को प्रोत्‍साहित करने के लिए जिले के करीब 20 गांवों में काम कर रही है। उन्‍होंने जैविक खेती पर एक पोस्‍टर प्रदर्शनी तैयार की है। ये पोस्‍टर हमें रासायनिक खेती के खतरे से आगाह कराते हैं।
देखिए कुछ पोस्‍टर






















ये पोस्‍टर कुछ नमूने भर हैं इस तरह के कई पोस्‍टरों के साथ एक प्रदर्शनी बनाई गई है जिसे संस्‍था क्षेत्र में होने वाले सांस्‍कृतिक कार्यक्रमों में प्रदर्शत i हाल ही में होशंगाबाद में सम्‍पन्‍न एक मेले में भी प्रदर्शनी लगाई गई। लोगों के लिए इस तरह के पोस्‍टर काफी शैक्षणिक हैं ऐसा संस्‍था मानती है।

रासायनिक खेती के खतरों को लोग अब गम्‍भीरता से ले रहे हैं। यही कारण है पिछले कुछ सालों में जैविक खेती का प्रचलन बढ़ा है। व्‍यक्‍ितगत स्‍तर पर कई किसान जैविक खेती कर रहे हैं। खेती पर रासायनिक खादों, कीटनाशकों से होने वाले असर पर एक बहस छिड़ने चाहिए। खेत खलियान की ओर से शिवनारायण गौर

Tuesday, February 17, 2009

किसान को नहीं लुभाता बजट

वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने अपने भाषण में किसानों को असली नायक बताया। किसानों के लिए बजट में कुछ प्रावधान रखते हुए उन्होंने ये बात कही। हालाँकि यह अलग बात है कि केवल इसी साल कोई नई बात नहीं कही है। सरकार समय समय पर किसानों के लिए ऐसे उद्बोधन करती रहती है जिसमें उन्हें कई तरह की उपमाएं दी जाती है। लेकिन असल में केवल उपमाओं के भरोसे बजट को किसान हितैषी नहीं कहा जा सकता। जब उसके अन्य पहलुओं को देंखे तो लगता है कि यह बजट भी हर साल प्रस्तुत किए जाने वाले बजटों की भांति ही किसानों के लिए है।
इस साल के बजट में प्रमुख रूप से दो बातों की ध्यान दिया गया है। एक तो किसानों के लिए ऋण की राशि बढ़ाई गई है। और दूसरा उर्वरकों पर दी जाने वाली सब्सिडी की राशि में बढ़ोत्तरी की गई है। इसके अलावा बजट में जो प्रावधान किए गए हैं वो किसान को उतना प्रभावित नहीं करते। कर्ज की राशि में पिछले 2003-2004 के आबंटन की तुलना में तीन गुना वृद्धि कर 25 लाख करोड़ किया गया है। सरकार का कहना है कि सीमान्त और छोटे किसानों के 65,500 रुपयों की कर्जमाफी की है। गौरतलब है कि जब भी किसानों के हित की बात होती है तो उसके लिए सस्ती दर पर ऋण उपलब्ध करा देने को आसान का समाधान माना जाता है। और बजट में फिर उसी तरह के प्रावधान किए जाते हैं। असल में इस देश में सरकारी ऋण प्राप्त करने वाले किसानों से कहीं ज्यादा ऐसे किसानों की है जो कि साहूकारों से कर्ज लेते हैं। उन्हें किसी भी तरह की छूट का लाभ नहीं मिलता। और इससे भी फर्क किस्म की बात पर तटस्थता से विचार नहीं किया जाता कि असल में खेती घाटे का सौदा क्यों हो रही है? किसान को हर साल ऋण की आव6यकता क्यों होती है? यदि इनके कारणों को तलाशें तो आप पाएंगे कि असल में सरकार फसलों को वाजिब मूल्य दे पाने में असमर्थ है। उत्पादन लागत लगातार बढ़ते जा रही है। लागत को कम करने का प्रावधान कभी बजट में दिखाई नहीं देता।
केवल गेहूं की ही बात करें तो सरकार का आर्थिक सर्वेक्षण इस बात को स्वीकार करता है कि गेहूं की कीमत लागत से कम दी जा रही है। पंजाब, उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश के अलावा भी कई राज्य घाटे में गेहूं की खेती कर रहे हैं। इस साल 1080 रुपए समर्थन मूल्य तक किया गया है लेकिन एक आंकलन के मुताबिक यदि गेहूं का समर्थन मूल्य 1500 रुपए होता है तो किसानों को कुछ राहत हो सकती है। मसलन केवल ऋण की राशि बढ़ा देने से खेती का उपकार नहीं किया जा सकता। सरकार जिन 25 फसलों का समर्थन मूल्य घोषित करती है वह पर्याप्त नहीं होता। उसमें जो वृद्धि की जाती है वो लागत की तुलना में हमेशा कम ही होती है।
सरकार जोर शोर से कृषि विकास दर की बात करती है। बजट भाषण में भी इस बात का जिक्र किया गया कि यह 37 प्रति6ात रही। लेकिन असल में इस विकास दर का असली आधार नकदी फसलें हैं। और जब भी कृषि विकास दबढ़ाने की बात कही जाती है तो उसका सीधा सा मतलब है कि सरकार नकदी फसलों को और प्रोत्साहित करने की कोशिश कर रही है। पिछले पांच साल में नकदी फसलों का रकबा बढ़ा है। ये ही ऐसी फसलें है जिनमें कीटनाशकों और उर्वरकों को खूब इस्तेमाल किया जा रहा है। मसलन सब्सिडी भी नकदी फसलों की ओर ही जा रही है। नकदी फसलों की ही देर किसानों की आत्महत्या दर में भी वृद्धि है। ज्यादातर किसान आत्महत्या की घटनाएं नकदी फसल के क्षेत्रों में होती हैं। चाहे बात कर्नाटक, आन्धप्रदेश की हो या फिर महाराष्ट्र के विदर्भ इलाके की। मध्यप्रदेश में भी अब किसानों की आत्महत्याओं की खबरें यदा कदा आने लगीं हैं। एक जानकारी के मुताबिक पिछले साल तक मध्यप्रदेश में 1287 किसानों ने आत्महत्याएं की हैं। केवल सस्ती दरों पर ऋण उपलब्ध करा देने से इस समस्या का समाधान नहीं तलाश जा सकता जिसकी कोशिश प्रणव मुखर्जी कर रहे हैं।
उल्लेखनीय है कि सरकार का बजट हमेशा कार्पोरेट को बढ़ावा देने वाला होता है। सरकार ने खेती के मॉडल कानून बनाया है। इसमें प्रमुख रूप से खेती के कार्पोरेट के हाथों में जाने के रास्ते दिखाई देते हैं। मॉडल कानून के मुताबिक प्रदेश सरकारें भी मण्डी कानून में बदलाव कर रही है जिससे संविदा खेती आदि को बढ़ावा दिया जा सके। पिछले पांच साल में इसकी एक झलक आसानी से देखी जा सकती है। विरोधाभाष ये भी है कि एक तरफ रोजगार गारण्टी योजना के राशि बढ़ाई जा रही है दूसरी तरफ स्थाई रोजगार पैदा करने के लिए जरूरी खेती के वास्तविक विकास की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। कार्पोरेट खेती के चलते मजदूरों के रोजगार की सम्भावनाएं खेती में खत्म होती जा रही है। और इसके वगैर स्थाई रोजगार की बहुत सम्भावनाएं नहीं की जा सकती। खेती का असल में विकास करना है तो बजट को किसानों के हित में हाना ही चाहिए। जो असल में नहीं है।

शिवनारायण गौर


हर साल सरकार बजट बनाती है किसानों को बेचारा बनाने की कोशिश की जाती है परन्‍तु असल में किसानों के विकास की वास्‍तिवक योजनाएं नहीं बनती। इस दिशा में प्रयास किया जाना चाहिए। खेत खलियान की ओर से शिवनारायण गौर

Tuesday, February 3, 2009

ये है गांव की कामकाजी महिला

शहरों में महिलांए किसी भी क्षेत्र में पुरूषों से पीछे नहीं हैं। लेकिन गांवों में सिकी के मामले में ऐसा नहीं है। हालांकि यहां की एक ग्रामीण महिला ने अब इसे संभव कर दिखाया है। वह पिछले 19 साल से खेती कर अपने परिवार का भरण पोषण कर रही है। छत्तीसगढ़ में जांजगीर जिला मुख्यालय से करीब 45 किलोमीटर दूर स्थित झिलमिली गांव की रहने वाली बिटो निर्मलकर (39) न सिर्फ पुरूषों की तहर खेती किसानी करती है, बल्कि उसका पहनावा भी उन्हीं की तरह है। खेतों में पानी से लेकर हल चलाने तक के सारे काम वह खुद करती है। शुरू शुरू में उसकी हिम्मत देखकर ग्रामीणों को अचंभा होता था, पर अब वे सभी उसकी हिम्मत और मेहनत का लोहा मानते हैं। खेती-खलिहानी में बिटो के दो छोटे भाई उसका हाथ बंटाते हैं। तीनों मिलकर अपने पुरखों की चार एकड़ जमीन के अलावा गांव के अन्य किसानों की तीन एकड़ जमीन पर भी खेती करते हैं।
बिटो के पिता दाउराम ने बेटे की चाह में दो शादियां की थीं। हालांकि बहुत दिनों तक घर में लड़का नहीं हुआ। बिटो शुरू से ही परिवार में बेटे की तरह रही और खेती में पिता का हाथ बंटाती थी। इस बीच उसके दो भाई हुए। पिता का निधन होने के बाद दो मां, तीन छोटी बहनों और दो भाईयों की जिम्मेदारी उसी पर आ गई।
बिटो की मां धनकुंअर ने बताया कि बिटो ने अपनी तीनों बहनों और दोनों भाईयों की शादी खुद अपने बलबूते करवाई है। हालांकि जिम्मेदारियों के चलते उसने खुद शादी नहीं की।
मुकेश बैस, जांजगीर, छत्तीसगढ़
साभार: दैनिक भास्कर

एक महिला के संघर्ष की सफल गाथा है बिटो की कहानी। बिटो के जैसी कई और भी महिलाएं अलग अलग क्षेत्रों में देखने को यदा कदा मिलती हैं जिन्होंने जिन्दगी की नई परिभाषा गढ़ी है। यदि आप भी अपने आस पास नज़र दौड़ाई तो निश्चित ही इस तहर के साहसी काम करते हुए लोग दिखेंगे। खेत खलियान की ओर से शिवनारायण गौर

Tuesday, October 21, 2008

प्लास्टिक के तालाब: कृषि पर नया खतरा

केन्द्र सरकार महाराष्ट्र के सूखा-पीड़ित इलाकों के लिए एक नई विषैली योजना लेकर आई है जिसके अंतर्गत कपास उत्पादन वाले 16 जिलों के पन्द्रह सौ तालाबों का निर्माण और उनमें प्लास्टिक की चादरें बिछाकर पानी का जमीन में रिसाव रोककर समस्या सुलझाने की कोशिश की जानी है। ऐेसे तालाबों के निर्माण के लिए सौ प्रतिशत सब्सिडी की घोषणा भी की गई है। किन्तु सरकार सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता बढ़ाने का उत्तर औद्योगिक उत्पाद में ढूंढ रही है।
शुरुआती दौर में तो किसान समुदाय योजना के प्रति उदासीन था किन्तु जैसा कि ज्यादातर सरकारी नीतियों के साथ होता है, धीरे-धीरे इसे भी लोगों ने स्वीकार कर लिया। जैसे ही किसानों ने तालाब खोद लिए वैसे ही प्लास्टिक की चादरों की आपूर्ति करने वाली चुनिंदा कंपनियों ने इनकी कीमतों में 16 से 18 रुपए प्रति वर्ग मीटर की वृध्दि कर दी। इसके फलस्वरूप प्रति तालाब चादर की लागत में पचास से साठ हजार रुपयों की वृध्दि हो गई।
जिन किसानों को सब्सिडी के तहत अभी तक धन नहीं मिला है उन्हें डर है कि यह अतिरिक्त लागत उन्हें स्वयं ही वहन करना होगी। नाराज किसानों ने तालाबों की खुदाई भी रोक दी है। वाशिम जिले के कृषकों ने जिलाधीश को एक ज्ञापन सौंपकर मांग की है कि या तो सब्सिडी की राशि में वृध्दि की जाए अथवा कंपनियों को पूर्व घोषित मूल्य पर ही प्लास्टिक चादरों की आपूर्ति के निर्देश दिए जाएं।
अधिकारियों के पास अब स्थिति से निपटने के लिए अधिकारों की कमी का बहाना ही शेष बचा है। इस योजना को संचालित करने वाले राज्य उद्यानिकी मिशन ने बताया है कि उसने नाबार्ड को एक प्रस्ताव भेजा है, जिसमें सब्सिडी की राशि बढ़ोत्तरी की अनुशंसा की गई है।
खैर, यह तो हुआ सरकारी योजना के रवैये और चाल का हिस्सा किंतु एक महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि आखिर तालाबों में इस तरह से प्लास्टिक चादर बिछाने का औचित्य क्या है?
विदर्भ क्षेत्र में परम्परागत रूप से खेतीहर तालाब भू-जल भरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे है। सरकार तो विशाल आकार की संरचनाओं को ही प्रोत्साहित करती है जबकि यवतमाल के सावित्री ज्योति समाजकार्य महाविद्यालय के अविनाश शिर्के का कहना है कि पारंपरिक कृषि में खेतों में तालाब खुदवाने का एक मकसद भू-जलस्तर में वृध्दि करना भी है। पारम्परिक तकनीक में महज 200 वर्ग फीट क्षेत्रफल के दस फीट गहराई वाले छोटे तालाबों की श्रृख्ला हुआ करती थी। कम लागत की वजह से कृषक इन्हें खुद ही खुदवा लेते थे। इसकी लागत मात्र 5 से 10 हजार रुपए होती है।
नागपुर के गैर सरकारी संगठन युवा से जुड़े कृषि विशेषज्ञ नितिन माटे भी इस योजना के खिलाफ हैं। उनका कहना है कि प्लास्टिक चादरें बिछाने से दीर्घावधि में काई फायदा नहीं होगा। ज्यादा से ज्यादा यह एक फसल तक ही पानी का भंडारण कर पाएगी और चूंकि यह जलस्तर में बढ़ोत्तरी में भी मदद नहीं करती हैं। अत: इतनी ऊँची लागत भी तर्कसम्मत नहीं है।
वाशिम जिले में पारम्परिक जलस्रोतों के पुनरुध्दार के कार्य में लगे नीलेश हेड़ा भी इस विचार को अवैज्ञानिक करार देते हुए कहते हैं बड़े तालाबों में विशेषकर सूखे के दौरान वनस्पति की उपज में कमी की वजह से गाद भरने की प्रक्रिया तीव्र होती है। भले ही प्लास्टिक चादर की आयु पन्द्रह वर्ष होने के दावे किए जाएं, किंतु वास्तविकता है कि यह गाद हटाने के कार्य में ही फट जाएगी। वैसे भी रिसाव कम करने के लिए विदर्भ में किसान सिंचाई संरचनाओं में सदियों से काली मिट्टी का प्रयोग करते आ रहे हैं।
विदर्भ में पहले सफल खेतिहर तालाब प्रयोग के परिकल्पक गैर सरकारी संगठन पर्यावरण वाहिनी के योगेश अनेजा कहते हैं सरकार सामूहिकता के विचार को ठीक से समझ नहीं पाई है। इसमें हम छोटे तालाबों और जलस्रोतों के पुनरुध्दार और पौधारोपण पर ध्यान देते हैं। नागपुर के वालनि गांव में हमारे प्रयोग की वजह से पूरे क्षेत्र के जलस्तर में वृध्दि हुई है। यहां तक की विदर्भ के ताजा सूखे में भी गांव में फसल उत्पादन में कमी नहीं हुई।
प्लास्टिक चादर के प्रयोग से कृषकों की उद्योगों और तकनीक विशेषज्ञों पर निर्भरता हो जाएगी। क्योंकि इसके बिछाने से लेकर रखरखाव तक का कोई भी काम विशेषज्ञ के बगैर नहीं हो पाएगा।
वाशिम के गजानंद आंबेडकर जैसे आम किसान भी तकनीकी निर्भरता से असहज महसूस करते हुए कहते हैं हम सब्सिडी की वजह से तैयार हुए थे। किंतु ऐसा लगने लगा है कि अब स्थितियां बजाए किसान के उद्योगों के हित में निर्दिष्ट कर दी गई है।
अपर्णा पल्लवी


विकास के नाम पर तथाकथित प्रयास किस तरह लोगों के लिए घातक हैं इसका अच्छा-खासा नमूना है महाराष्ट्र की प्लास्टिक के तालाब की यह योजना। अपर्णा पल्लवी द्वारा लिखित यह आलेख सप्रेस/सीएसई, डाउन टू अर्थ फीचर्स द्वारा प्रसारित किया गया है। उम्मीद है यह चर्चा को आगे बढ़ाएगा। खेत खलियान की ओर से शिवनारायण गौर


Monday, October 20, 2008

पानी का निजीकरण

हाल ही में उत्तरप्रदेश विधानसभा द्वारा पारित जल संसाधन प्रबंधन और नियामक आयोग के गठन संबंधी कानून से स्पष्ट हो गया है कि अब देश में पानी का इस्तेमला भी गरीबों और किसानों की पहुंच से बाहर किया जा रहा है। इस कानून के उल्लंघन को संज्ञेय अपराध माना गया है। तथा उल्लंघन करने वाले व्यक्ति अथवा संस्था पर एक लाख तक जुर्माना और एक वर्ष तक की कैद अथवा दोनों सजाएं एक साथ दी जा सकती हैं। नियामक आयोग के अधिकारों में थोक हकदारी, (किसी क्षेत्र विशेष से गुजरने वाली नदी अथवा क्षेत्र में स्थिति तालाबों और अन्य जल संसाधनों को एक मुश्त ठेके या एकाधिकार पर देना) उपयोग की श्रेणी तथा जल दरें निर्धारित करना शामिल है।
डेढ़ दशक पूर्व प्रारंभ हुए ढांचागत समायोजन कार्यक्रमों के क्रियांवयन से पानी सहित जीवन के लिए जरूरी संसाधन आम जनता से दूर जा रहे हैं। ढांचागत समायोजन कार्यक्रम लागू करवाने हेतु अंतरराष्ट्रीय वित्तीस एजेंसियों ने लूट समर्थक नीतियां बनाई हैं। विश्व बैंक की जल संसाधन रणनीति (2002) कहती है कि जल क्षेत्र में बाजार के सिध्दान्तों को लागू करने की कोशिश की जाए ताकि जल अधिकार अधिक कीमत चुकाने वालों को हस्तांतरित किया जा सके। वहीं एशियाई विकास बैंक की जल नीति पानी को प्रकृति की देन नहीं बल्कि एक ऐसा संसाधन मानती है जिसका सटीक प्रबंधन होना चाहिए। इसलिए विश्व बैंक, एशियाई विकास बैंक जैसी वित्तीय एजेंसियों ने विभिन्न राज्य सरकारों को जल क्षेत्र को राजनैतिक हस्तक्षेप से मुक्त करवाने हेतु नियामक व्यवस्था कायम करवाना भी होती है। उत्तरप्रदेश का जल नियामक आयोग संबंधी कानून भी विश्व बैंक द्वारा आबंटित कर्ज की शर्त के तहत ही बनाया गया है।
मध्यप्रदेश सरकार भी विश्व बैंक से 39.6 करोड़ डॉलर का कर्ज लेकर चंबल, सिंध, बेतवा, केन और टोंस (तमस) नदी कछारों में मध्यप्रदेश जल क्षेत्र पुरर्रचना परियोजना संचालित कर रही हे। चूंकि यह कर्ज भी सेक्टर रिफार्म (क्षेत्र सुधार) के तहत लिया गया है अत: विश्व बैंक ने प्रदेश के जल क्षेत्र में बदलाव हेतु 14 शर्ते रखी हैं। इन्हीं में से एक शर्त पानी का बाजार खड़ा करने वाले जल नियामक आयोग का गठन करना भी है। इसके द्वारा पानी को निजी हाथों में सौंप दिया जाएगा।
विश्व बैंक ने कर्ज दस्तावेज में साफ लिख दिया है कि जलक्षेत्र पुनर्ररचना परियोजना (मध्यप्रदेश) का रूपांकन निजी-सार्वजनिक-भागीदारी अर्थात निजीकरण को ध्यान में रखकर किया गया है तथा जलक्षेत्र सुधान का मुख्य आधार बाजारीकरण ही होगा। परियोजना के प्रारंभिक लक्ष्यों में 1 मध्यम और 25 छोटी सिंचाई योजनाओं का निजीकरण का लक्ष्य तय कर दिया गया है। निजीकरण का प्रमुख उद्देश्य होता है मुनाफा कमाना। पानी की कीमतें अत्याधिक बढ़ने पर जिनके पास पानी खरीदने की क्षमता होगी उन्हें ही पानी मिलेगा। क्रयशक्ति विहीन लोगों को जरूरत का पानी उपलब्ध करवाने की जिम्मेदारी सेवा प्रदाताओं पर नहीं होगी। ऐसे में किसानों और गरीबों के जीने के हक का क्या होगा?
पानी के निजीकरण से नागरिकों के जीने के हक को ही नकार दिया जाएगा। किसानों की आजीविका का आधार ही पानी है। फसल उत्पादन के लिए उन्हें बड़ी मात्रा में (बल्क) पानी की आवश्यकता होती है। यदि वे पूर्ण लागत वापसी के सिऋान्त के अनुसार ऊँची दरों पर भुगतान नहीं कर पाए तो प्रदेश की एक तिहाई आबादी के समक्ष न केवल आजीविका का संकट पैदा हो जाएगा बल्कि इसका नकारात्मक प्रभाव देश की खाद्यान्न आत्मनिर्भरता पर भी पड़ेगा।
मध्यप्रदेश में भी जल नियामक आयोग के गठन के बाद प्रदेश की सीमाओं में उपलब्ध समस्त जल संसाधन (जिनमें निजी कुएं, टयूबवेल तथा भूगर्भीय जल भी शामिल हैं) जल नियामक आयोग के अधीन हो जाएंगे, जिसकी दरें आयोग ही तय करेगा। देश में किसानों की आर्थिक स्थिति इतनी खस्ता है कि वे सिंचाई हेतु ली जा रही बिजली का बिल ही नहीं चुका पा रहे हैं। केन्द्रीय कृषि मंत्री पहले ही छोटी जातों को अव्यवहारिक बता चुके हैं। ऐसे में यदि किसानों को उनकी खुद की पुंजी/श्रम से तैयार कुओं और टयूबवेलों के साथ नदी-नालों के पानी का बिल भी चुकाना पड़ा तो क्या होगा?
सूचना का अधिकार देने वाली मध्यप्रदेश सरकार जल क्षेत्र के नियामक संबंधी मामले में अत्यधिक गोपनीयता बरत रही हे। आयोग के गठन संबंधी कानून का प्रारूप मार्च 2007 के भी पहले से तैयार है लेकिन इसे प्रदेशवासियों से छिपाया जा रहा है। मंथन अध्ययन केन्द्र द्वारा कई बार सूचना के अधिकार के तहत इसे मांगाा गया लेकिन हर बार इसे उपलब्ध करवाने से इंकार कर दिया गया। इसके विपरीत महाराष्ट्र में जब इस प्रकार का प्रारूप कानून बना तब सरकार ने कार्यशालाओं के माध्यम से इसका प्रचार कर जनता के सुझाव मांगे थे।
वैसे दुनिया में पानी का निजीकरण कोई नई बात नहीं है। सन् 1999 में लेटिन अमेरिकी देश बोलिविया में पानी का निजीकरण किया गया था। ठेकेदार कंपनी एगुअम डेल तुनारी ने अनुबंध के बाद न सिर्फ तीन गुना दाम बढ़ाए बल्कि उसने कुओं और टयूबवेलों पर भी कब्जा कर उन पर मीटर लगा दिए थे। पानी की दर वृध्दि से उत्पन्न जनाक्रोश ने वहां गृहयुध्द की स्थिति निर्मित कर दी थी। बोलिविया की तरह पानी के निजीकरण के अन्य असफल प्रयासों के बाद दुनिया के कई देशों में पानी पर समुदाय के अधिकार को न्यायपूर्ण समाज की बुनियाद मानते हुए इसे संवैधानिक अधिकार घोष्ज्ञत किया गया। इन देशों में स्पेन, हालैण्ड (यूरोप), दक्षिण अफ्रिका, नाईजीरिया, केन्या, कांगों, इथियोपिया, जाम्बिया, युगाण्डा (अफ्रीका) इरान, फिलीपिन्स (एशिया), कोलंबिया, बोलिविया, क्यूबा और पनामा (अमेरिका महाद्वीप) शामिल हैं। संभव है भारत में भी निजीकरया का इतिहास दोहराते हुए बाद में इसे लोगों का अधिकार बनाया जाए। लेकिन तब तक देश के अधिकांश किसान या तो खेती से अथवा दुनिया से ही पलायन कर चुके होंगे।

रेहमत


मंथन अध्ययन केन्द्र बड़वानी के साथ पानी के निजीकरण के मुद्दे पर काम कर रहे रेहमत द्वारा लिखित यह लेख सर्वोदय प्रेस सर्विस इन्दौर से प्रसारित हुआ है। मंथन अध्ययन केन्द्र पिछले कई सालों से पानी के मुद्दे पर काम कर रहा है। मंथन द्वारा भाकड़ा बांध के प्रभावों पर किए गए एक अध्ययन की रिर्पोट पिछले साल देशभर में चर्चा का मुद्दा रही है। - खेत खलियान की ओर से शिवनारायण गौर



Tuesday, October 7, 2008

फसलों में पोषक तत्वों की कमी

मेरठ स्थित क्षेत्रीय भूमि परीक्षण प्रयोगशाला के सहायक निदेशक प्रदीप कुमार वर्मा के मुताबिक मेरठ व सहारनपुर मंडल में की गई वैज्ञानिक जांच में पाया गया हे गेहूं, दाल, चावल में पौष्टिक तत्वों की कमी आती जा रही हे। उन्होंने बताया कि किसानों के रासायनिक खाद का अधिक इस्तेमाल करने से जमीन केपोषक तत्वों का संतुलन गड़गड़ा रहा है। इसका असर यहां पर उगने वाली फसलों पर दिखाई दे रहा है। खाद्य पदार्थों मेें जहां आयरन व फास्फोस्रस की बेहद कमी सामने आई वहीं प्रोटीन, कैल्शियम, आयरन व कैलोरी में भी पोषक तत्वों की कमी आंकी गई है।
श्री वर्मा के मुताबिक विभिन्न इलाकों से ली गई मिट्टी के नमूनों में जांच में पाया गया कि अंधाधुध रासायनिक खादों के इस्तेमाल से जमीन की उर्वरा शक्ति कम होती जा रही है। कार्बन की मात्रा 70 से 75 फीसद कम पाई गई वहीं जिंक 60-65, नाइट्रोजन 28-33, सल्फर 25-28 और पोटेशियम 20-25 प्रतिशत तक कम पाया गया। जमीन के इन आवश्यक पोषक तत्वों की कमी का असर अब यहां उगने वाली फसलों की गुणवत्ता पर प्रभाव डाल रहा है।
इन फसलों से पकाए गए दाल, रोटी, चावल में पोषक तत्वों की काफी कमी पाई गई है। सौ ग्राम दाल में आयरन की मात्रा 6 ग्राम की जगह 2.7 पाई गई वहीं रोटी में इस जरूरी तत्व की मात्रा 4.9 की जगह 2.7 पाई गई। चावल में इसकी मात्रा 0.7 की जगह 0.5 मिली है। जांच के दौरान फोस्फोरस की मात्रा दाल में 304 मिलीग्राम की जगह 300, रोटी में 355 की जगह 306, चावल में 160 के मुकाबले 150 पाई गई। कैल्षियम दाल में 110 मिलीग्राम की जगह 73, रोटी में 48 की जगह 41 पाया गया। फाइबर, कैलोरी और प्रोटीन की मात्रा पर भी असर देखने को मिलो है। दाल में फाइबर (रेष) की मात्रा 1.5 ग्राम के बजाय 1.3 पाए गए, रोटी में 1.9 ग्राम की जगह 1.7 व चावल में मानक के अनुरूप् 2 ग्राम पाई गई। खाद्य पदार्थों से मिलने वाली कैलोरी की मात्रा भी घटती जा रही हे। दाल में 33.8 की जगह 31.1, रोटी में 34.8 की जगह 33.8 और चावल में 345 की जगह 341 पायी गई। विकास के लिए जरूरी तत्व प्रोटीन की मात्रा दाल में 22.3 की जगह 21.8, रोटी में 12.1 की जगह 11 व चावल में मानक के अनुरूप 6.8 पाई गई। खा पदार्थों में पोशक तत्वों की गिरावट आने से चिकित्सक भी खासे चिंतित हैं। उनका मानना है कि पौष्टिक तत्वों की कमी का असर आदमी के षरीर में रोगों से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता पर पड़ेगा। इसका खासा असर बच्चों व महिलाओं पर पड़ने की संभावना है।


"फसलों में पोषक तत्वों की कमी" ये खबर गत 18 सितम्‍बर को हिन्‍दी के अखबारों में प्रकाशित एक खबर पर आधारित है। ये समस्या केवल मेरठ और सहारनपुर की ही नहीं है बल्कि अमूमन हर इलाके में रासायनिक उर्वरक का बेतहाशा इस्तेमाल किया जा रहा है। कई क्षेत्र तो ऐसे हैं जहॉं अब उत्पाकदन में ठहराव आ गया है। मजबूरी में लोग अब रासायनिक खाद का इस्‍तेमाल कम करने लगे हैं। जैविक खेती की ओर भी अब कई लोग लौटने लगे हैं। सरकारी ढॉंचों की भूमिका को भी आलोचनात्‍मक ढंग से देखने की जरुरत है। हम जानते हैं कि रासायनिक खादों और कीटनाशकों के इस्‍तेमाल के लिए भी कई तरह से प्रलोभित करने की कोशिश की गई है। आज सरकार भी जैविक खेती करने की बात कर रही है। प्राक्रतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन तो अब भी जारी है। आप अपनी टिप्‍पणीं इस पोस्‍ट पर डाल सकते हैं। शिवनारायण गौर

Thursday, September 25, 2008

मध्यप्रदेश राज्य कृषक कल्याण आयोग ने दिए कृषि विकास के सुझाव

कृषि व इससे संबसंधित आधारभूत संरचनाओं के विकास की सबसे ज्यादा अहमियत देने की सलाह देते हुए मध्यप्रदेश राज्य कृषक कल्याण आयोग ने कहा है कि इसके लिए सरकार को उपलब्ध संसाधनों व योजनाओं की समीक्षा करना चाहिए।
एक जानकारी के मुताबिक राज्य को भेजे सुझावों में राज्य कृषक कल्याण आयोग ने कहा हे कि केवल खेती किसानी और संबंधित व्यवसायों की संभावनाएं ही किसानों को खेती की ओर आकर्षित कर सकती हैं। इसके लिए जरूरी है कि खेती को निरंतर रोजगार की संभावना वाला बनाया जाए। सुझावों में यह भी कहा गया है कि कृषि स्नातकों के लिए इस तरह का पैकेज होना चाहिए कि वे अपनी विशेषज्ञता के फायदे संपर्क सीमा में आने वाले क्षेत्र के दूसरे किसानों को भी पहुंचा सकें।
कृषि व संबंधित विभागों की योजनाओं के लक्ष्यों में संबंधित फसल का क्षेत्र विस्तार या इसी तरह के बिंदु रहते हैं। सभी योजनाओं का क्रियान्वयन किसान आधारित एकीकृत परियोजना के मुताबिक होना चाहिए। कृषि सेवा केंद्र और कृषि क्लीनिक जैसी सेवाओं को कृषि स्नपातकों के लिए आरक्षित कर उनका ज्यादा से ज्यादा विस्तार करने की जरूरत है।
राज्य कृषक कल्याण आयोग ने राज्य सरकार को भेजे सुझावों में कहा हे कि भू जल के संवर्धन, नलकूपों के सुधार, बिजली सहायक और टे्रक्टरों की मरम्मत आदि के लिए शिक्षित युवकों को ज्यादा से ज्यादा प्रशिक्षण्ा दिया जाए और केमिस्टों की तरह कृषि इनपुट दुकान खोलने के लिए भी कृषि स्नातकों की योग्यता अनिवार्य की जानी चाहिए। सरकार को कृषि स्नातकों को कृषि उपकरणों के निर्माण और विपणन से जोड़ने की पहल करनी चाहिए। इन उपकरणों के उन्नयन और विकास की अनुसंधानकारी पहल और विभागीग योजनाओं के क्रियान्वयन, सर्वेक्षण, मूल्यांकन व प्रश्िािक्षण जैसे कार्यों से भी कृषि स्नातकों को जोड़ना जरूरी है। शिक्षित व कृषि स्नातक युवकों को उनकी योग्यता और रुचि के मुताबिक विधाओं में संलग्न कर ग्रामीण क्षेत्रों में उनका सघन नेटवर्क कायम किया जाए।
आयोग ने राज्य सरकार से अपेक्षा की है कि वेयरहाउस, ग्रेडिंग यूनिट और कोल्ड स्टोरेज जैसी सुविधाएं उत्पादन क्षेत्रों के पास ही होनी चाहिए जिससे किसानों को इससे ज्यादा से ज्यादा फायदा मिल सके। खेती के व्यावसायिक और वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन के लिए इन इकाइयों की स्थापना में उद्योगपतियों के बजाए शिक्षित किसान युवकों को प्राथमिकता देकर विशेष पैकेज दिया जाए। आयोग प्रारंभिक शिक्षा की कक्षाओं में विशेषकर विज्ञान व पर्यावरण की पाठयपुस्तकों में खेती किसानी को लेकर दी गई वैज्ञानिक जानकारी बहुत उपयोगी मानता है। आयोग ने इसकी लगातार समीक्षा और इस क्षेत्र में होने वाले नए नए अनुसंधानों व खोजों को भी इसमें शामिल करनी की सलाह दी है। उच्चतर माध्यमिक विद्यालय स्तर पर कृषि विषय यको केवल अच्छे अंक प्राप्त करने का साधन मानने की बजाए राज्य सरकार को इसकी सार्थक शिक्षा पर बल देने की जरूरत है। इस समय माध्यमिक शिक्षा मंडल की मान्यताओं व नियमों में कृषि विषय का अलग से कोई उल्लेख नहीं है जबकि इसे आवश्यक तौर पर शामिल करना चाहिए। आयोग ने अपने सुझावों में कहा हे कि खेती किसानी के लिए विशिष्ट प्रयोगशालाएं और कृषि प्रक्षेत्र स्थापित करने चाहिए। विपणन की तार्किक, उन्नत, वैज्ञानिक और शोषणविहीन व्यवस्था युवकों को कृषि की ओर जोड़ने में मददगार होगी। इसके अलावा कृषि उपज आधारित उद्योग को अपने प्रदायकर्ता उत्पादकों के लिए प्रेरक की भूमिका निभानी चाहिए।

Wednesday, July 23, 2008

जैविक खेती के अनुभव

रासायनिक खेती से जैविक खेती की ओर वापस लौटने का दौर शुरू हो गया है। कई किसान जो कि खेती में बढ़ती लागत से परेशान हो गए हैं वैकल्पिक रास्ते तलाश रहे हैं। इस विकल्प का एक रास्ता है कि बिना खाद की खेती की जाए। निश्चित ही इससे लागत तो कम होती ही है गुणवत्ता के रूप में भी जैविक अनाज का कोई मुकाबला नहीं है। मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले के कुछ गांवों के किसानों ने जैविक खेती करना शुरू किया है। गौरतलब है कि होशंगाबाद वह जिला है जहां तवा नदी पर एक बड़ा बांध बना है। सत्तर के दशक में बने इस बांध के बाद जिले की खेती में एक बड़ा बदलाव आया था। ज्यादा उत्पादन की होड़ ने किसानों को भरपूर रासायनिक खाद के इस्तेमाल की ओर धकेगा। कुछ समय के बाद उत्पादन में एक ठहराव आया और लागत बढ़ने लगी। अब कई किसान वापस जैविक खेती करने लगे हैं। पिछले दिनों ऐसे ही किसानों की एक बैठक होशंगाबाद के पास के एक गांव रोहना में आयोजित की गई यहां प्रस्तुत है इस बैठक में आए किसानों की कुछ बातें उनके ही शब्दों में:-

मैने अपनी एक एकड़ जमीन में रवि की गेहूं की फसल जैविक विधि से ली। इसमें मैंने नाडेप खाद का उपयोग किया। एक एकड़ जमीन में दो ट्राली नाडेप खाद डाला। साथ ही इसमें एक बोरी डीएपी एवं एक बोरी यूरिया डाला। इस रकबे में 14 क्विंटल गेहूं का उत्पादन हुआ।
लखन वर्मा, ग्राम बड़ोदिया कला

मैंने एक क्विंटल गेहूं में एक बारे डीएपी एवं 1.5 बोरी यूरिया डाला शेष नाडेप खाद एवं जीवमृत का उपयोग किया। इसमें 2.5 टैंक गेहूं निकला। 30 किलोग्राम चने की बोनी की थी जिसमें 7 क्विंटल चना निकला। इस चने की फसल पर मही एवं गोमूत्र का स्प्रे किया था। 2 एकड़ में गेहूं एवं आधा एकड़ में चना बोया था। इस 3 एकड़ में 3 ट्राली भू नाडेप खाद का उपयोग किया गया था।
शिवराम यादव, ग्राम पतलई

हम एक नई किस्म के सोयाबीन को बोने की तैयारी कर रहे हैं। यह किस्म पास ही के आगरा गांव के लक्ष्मीनारायण शर्मा नामक किसान ने बैतूल से लाए हैं। इसका औसत उत्पादन 16 क्विंटल प्रति एकड़ के लगभग है। मैंने गेहूं की फसल इस वर्ष ली। मैंने इन्दौर से गेहूं बीज लाया था, इसकी कीमत 1800 रुपए प्रति क्विंटल थी। इसका अच्छा उत्पादन रहा। इस उत्पादन को हमने इन्दौर की कंपनी को 3000 रुपए प्रति क्विंटल बेच दिया।
हमने सब्जी की खेती जैविक तरीके से की थी। सब्जी में फूलगोभी प्रमुख रूप से ली। जैविक खाद में वर्मी कम्पोस्ट डाला जिससे फूलगोभी का आकार बड़ा आया एवं उसका स्वाद भी अच्छा रहा। इसी जैविक के अनुभव को हमने गांव के दो तीन लोगों से करने को कहा वह भी आगामी समय में वर्मी कम्पोस्ट एवं नाडेप खाद बनाकर फसल पर इस्तेमाल करने का मन बना रहे हैं।
सीताबाई चौरे, बाईखेड़ी

मैंने अपने खेत में नाडेप खाद का उपयोग किया। हालांकि अभी मैंने रासायनिक खाद का भी उपयोग किया है। मेरा मानना है कि एक दम से जैविक खेती सम्भव नहीं है। धीरे धीरे ही रासायनिक खाद को कम किया जा सकता है। मैंने उन्द्राखेड़ी गांव की अनुसुईया बाई से जैविक के उपयोग करने की बात कही है। अनुसुईया बाई आगामी फसल में जैविक खाद का उपयोग करेंगी।
मैं अपने मकान के पीछे बाड़े में सब्जी में गोबर की खाद का ही उपयोग कर रही हूं। मैं अपने आस पड़ोस के लोगों से भी जैविक खाद का प्रयोग करने को कहती हूं।
दीपा यादव, रोहना

मैं आधा एकड़ जमीन में अर्धजैविक खेती कर रही हूं। इसमें मैंने गेहूं लगाए थे इससे रासायनिक खाद के उपयोग मे ंकमी हुई है।
विट्टन बाई, ग्राम देशमोहनी