खेत-खलियान पर आपका स्‍वागत है - शिवनारायण गौर, भोपाल, मध्‍यप्रदेश e-mail: shivnarayangour@gmail.com
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Tuesday, January 19, 2016

ब्रिटेन के भोजन का ग्रीनहाउस प्रभाव



युरोप के कई देशों और खासकर युनाइटेड किंगडम में कई वर्षों से एक नया रुझान देखा जा रहा है। ये देश जितने भोजन का उपभोग करते हैं उसका एक बड़ा हिस्सा अन्य देशों में उगाया जाता है। इन अन्य देशों में इसकी वजह से जो ग्रीनहाउस गैसें वायुमंडल में फैलती हैं उनका हिसाब पहली बार किया गया है। मसलन, युनाइटेड किंगडम की भोजन खपत से सम्बंधित ग्रीनहाउस गैसों में से 64 प्रतिशत का उत्सर्जन अन्य देशों में हुआ।
युनाइडेट किंगडम आजकल अपना लगभग आधा भोजन बाहर से आयात करता है। 1986 से 2009 के दरम्यान युनाइटेड किंगडम के लोगों के लिए भोजन पैदा करने हेतु ज़मीन में 23 प्रतिशत वृद्धि हुई जिसमें से 74 प्रतिशत विदेशों में हुई थी।
इसी प्रकार से पशु चारे के रूप में इस्तेमाल किया जाने वाला सोयाबीन, कोको तथा गेहूं भी अधिकांशत: विदेशी भूमि पर उगाए गए थे। इनके अलावा युनाइटेड किंगडम में उपभोग के लिए फल-सब्ज़ियां भी बढ़ती मात्रा में स्पैन व अन्य देशों से आयात की जा रही हैं।
2008 में युनाइटेड किंगडम की खाद्य आपूर्ति की वजह से 21.9 मेगाटन ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन हुआ। इस उत्सर्जन में से 18 प्रतिशत दक्षिण अमेरिका में और 15 प्रतिशत युरोपीय संघ के देशों में हुआ।
जरनल ऑफ रॉयल सोसायटी इंटरफेस में प्रकाशित अध्ययन से पता चलता है कि अन्य युरोपीय देश भी युनाइटेड किंगडम के नक्शे कदम पर चल रहे हैं। इस रिपोर्ट के एक लेखक एबर्डीन विश्वविद्यालय के हेनरी डी रुइटर का मत है कि इन रुझानों के मद्देनज़र अब इन देशों के लिए सिर्फ अपनी भूमि पर होने वाले उत्सर्जन को नहीं बल्कि इनकी वजह से अन्यत्र हो रहे उत्सर्जन को भी हिसाब में लिया जाना चाहिए। ये देश जो कुछ खाते हैं उसका असर अन्य देशों में हो रहा है। (स्रोत फीचर्स)

Wednesday, September 10, 2008

मैक्सिको के बहाने

मैक्सिको की गिनती आज उन देशों में हो रही है जहां खाद्य संकट सबसे विकराल रूप में सामने आया है। भारत के भोजन में रोटी का जितना महत्वपूर्ण स्थान है वही मैक्सिको में मक्के से तैयार होने वाली टारटिला का है। फर्क यह है कि आमतौर पर यह बाजार से खरीदी जाती है। सन 2007 में इसकी कीमत में पचास से साठ प्रतिशत तक की वृध्दि हुई जो वहां के सबसे प्रमुख खाद्य के लिए बहुत अधिक थी।
आश्चर्य की बात है कि इससे पहले पड़ोसी देश अमरीका से मक्के के सस्ते आयात में तेजी से वृध्दि हुई थी, जिसके कारण मैक्सिको के बहुत से किसान बुरी तरह तबाह हो गए और उन्हें खेती छोड़नी पड़ी। यह एक बड़ी त्रासदी थी। फिर भी कुछ लोगों ने सोचा कि सस्ते दाम पर मक्का आयात से कम से कम टारटिला सस्ती मिलती रहेगी। पर कुछ ही समय के बाद टारटिला भी बहुत महंगी हो गई। जो लोग सोचते है कि सस्ता खाद्य आयात कर लो और पेट भर लो, उनके लिए यह एक महंगा सबक था। सवाल है कि ऐसा कैसे हुआ और क्या हम मैक्सिको के अनुभव से कुछ सीख सकते हैं?
भारत में महंगाई रोकने और सस्ते खाद्य मुहैया कराने के नाम पर कई बार सस्ते आयात किए गए हैं। इसलिए मैक्सिको के अनुभव भारत के लिए यह समझने के लिए बहुत उपयोगी हैं कि सस्ते खाद्य आयात की नीति किसानों के लिए तो हानिकारक होती ही है, यह कुछ समय बाद उपभोक्ताओं के लिए भी हानिकारक सिध्द होती है।
1980 के दशक में मैक्सिको का विदेशी कर्ज बढ़ गया तो अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों ने ऐसी शर्तें लगाई जिनसे मैक्सिको के किसानों को मिलने वाली सरकारी सहायता कम हो गई और किसानों की आर्थिक कठिनाइयां बढ़ गई। सन 1994 में उत्तरी अमरीका मुक्त व्यापार समझौता यानी नाफ्टा लागू हुआ जिससे अमरीका में सरकारी सब्सिटी के कारण सस्ता हुआ मम्का बड़ी मात्रा में मैक्सिकों में आयात होने लगा।
नतीजतन, अमरीकी मक्का मैक्सिको में छा गया और वहां के किसान गंभीर संकट में फंस गए। मक्के की खरीद-बिक्री और वितरण से सरकारी एजेंसी हट गई और यह काम बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथ में आ गया। जब मक्के का उपयोग जैव ईंधन के लिए अमरीका में तेजी से बढ़ने लगा तो उस समय खाद्य के रूप में मक्के की कीमत तेजी से बढ़ने के अनुकूल अवसर उत्पन्न हो गए जिसका भरपूर लाभ इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने उठाया।
इतना ही नहीं, इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने मक्के के बाजार में अपनी मजबूत स्थिति का बेहद अनुचित और अनैतिक उपयोग परंपरागत मक्के के आटे और टारटिला उत्पादकों का बाजार छीनने के लिए किया। मैक्सिको में कुछ मक्का आटे की बड़ी मिलों में भेजा जाता है और कुछ आटा मक्के की परंपरागत चक्कियों में भेजा जाता है। आमतौर पर टॉरटिला बड़ी मिलों के आटों से बनती है तो कुछ परंपरागत तरीके से पीसे गए मक्के के आटे से। परंपरागत क्षेत्र में आटा पीसने और टॉरटिला बनाने की लगभग सत्तर हजार इकाइयां हैं।
बड़ी कंपनियों ने कुछ बड़े टारटिला उत्पादकों को सस्ता आटा दे दिया और बाजार को ऐसी कीमत में टारटिला से भर दिया जिससे प्रतिस्पर्धा करना परंपरागत क्षेत्र के लिए संभव नहीं था। इस तरह किसानों के साथ-साथ परंपरागत रूप से आटा पीसने और टॉरटिला बनाने वालों की भी क्षति हुई और बाजार की सारी शक्ति बड़े स्तर के खिलाड़ियों के हाथों में केन्द्रित हो गई। इसके चलते बाद में कीमत बढ़ाना आसान हो गया। उनकी प्रतिस्पर्धा में अब किसी और के लिए खड़ा होना या टिक पाना बहुत मुश्किल हो चुका था।
खाद्य सुरक्षा के लिए इतना हानिकारक बदलाव बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हितों से खुद को जोड़ने वाली मैक्सिको की सरकार के समर्थन और सहयोग से हुआ। यानी सरकार ने अपने ही लोगों के हितों को कुचलने में बहुराष्ट्रीय कंपनियों का साथ दिया। इन नीतियों का असर यह हुआ कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों का मुनाफा तेजी से बढ़ने लगा जबकि लाखों की संख्या में मैक्सिको के किसान उजड़ने लगे और उनमें से अनेक किसान तो अमरीका के लिए सस्ते मजदूर बनकर वैध-अवैध तरीकों से वहां जाने लगे क्योंकि अपने परिवारों को पेट भरने का उन्हें और कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था।
खाद्य संकट की स्थिति में बड़ी कंपनियों ने जीएम फसलों को एक समाधान के रूप में प्रस्तुत किया है जबकि अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओं ने जोर देकर कहा कि जीएम फसलों के प्रसार से इन कंपनियों का मुनाफा और नियंत्रण पहले से भी अधिक बढ़ जाएंगें और मैक्सिको के किसानों और उपभोक्ताओं के लिए रोजी-रोटी और स्वास्थ्य के नए खतरे उत्पन्न होंगे।
मैक्सिको के अनुभवों से अन्य विकासशील देशों को सीखना चाहिए कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों को आगे बढ़ाने वाली नीतियों से खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भरता और किसानों के हितों की कितनी क्षति होती है या महंगाई को नियंत्रित करने के सरकार के प्रयास कितने कमजोर हो जाते हैं।

Tuesday, April 22, 2008

खाद्यान्न संकट का सवाल

हाल ही में संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (ए.एफ.ओ.) के महानिदेशक जैक्स डायफ ने अपनी भारत यात्रा के दौरान खाद्य मंत्री शरद पवार से मुलाकात की और बाद में संवाददाताओं के साथ बातचीत में जो बातें कहीं उनसे खाद्यान्न की स्थिति को लेकर चिन्ता पैदा हो गई। श्री डायफ ने कहा कि दुनिया भर में खाद्य मोर्चे पर हालात गंभीर हैं। इस वक्त दुनिया में अनाज का स्टॉक काफी कम है और यह पूरी दुनिया की आबादी का सिर्फ 8 से 12 हफ्तों तक ही पेट भर सकती है। वे कहते हैं कि मिस्र, कैमरून, हैती, बुर्कीना फासो और सेनेगल जैसे देशों में इसे लेकर काफी संघर्ष भी हुए हैं। यह संघर्ष अन्य देशों में भी फैल सकते हैं।
श्री डायफ की आंकड़ों वाली सच्चाई पर ध्यान न भी दिया जाए तो भी खाद्यान्न सुरक्षा का सवाल आज दुनियाभर में उठाया जा रहा है। खेती का रूझान बदल रहा है। अब खाद्य फसलों की जगह अखाद्य फसलों का रकबा और उत्पादन दोनों ही बढ़ रहा है। भारत में भी प्रायोजित और गैर प्रायोजित दोनों तरीके से नकदी फसलों की ओर किसानों की रुचि बढ़ी है या बढ़ाई गई है। एक तरफ यह हल्ला भी मचाया जा रहा था, जो असल सच्चाई भी है, कि लगातार उर्वरकों और कीटनाशकों के इस्तेमाल से जमीन की उर्वरा शक्ति समाप्त हो रही है और अब रही सही कसर नकदी फसलों की खेती पूरी कर देगी। गौरतलब है कि नगदी फसलों में पानी और खाद दोनों की ज्यादा जरूरत होती है। पर जो भी हो, अखाद्य फसलों का उत्पादन तो बढ़ ही रहा है।
भारत सरकार का वर्ष 2007-2008 का आर्थिक सर्वेक्षण कहता है कि 1990 से 2007 के दौरान खाद्यान्न उत्पादन 1.2 प्रतिशत कम हुआ है, जो कि जनसंख्या की औसतन 1.9 प्रतिशत वार्षिक बढ़ोत्तरी की तुलना में कम है। अनाज तथा दालों की प्रति व्यक्ति उपलब्धताओं में भी इस अवधि के दौरान गिरावट हुई है। अनाजों की खपत 1990-91 में प्रतिदिन प्रति व्यक्ति 468 ग्राम थी जो कि 2005-2006 में प्रतिदिन 412 ग्राम प्रति व्यक्ति हो गई है। मसलन अनाज की उपलब्धता में 13 प्रतिशत की गिरावट आई है। इसी अविध में दालों की खपत प्रतिदिन 42 ग्राम प्रति व्यक्ति से घटकर 33 ग्राम प्रतिदिन प्रति व्यक्ति रह गई है। उल्लेखनीय है कि 1956-57 में दालों की उपलब्धता 72 ग्राम प्रति व्यक्ति थी।
उपरोक्त आंकड़े बताते हैं कि खाद्यान्न की उपलब्धता में कमी आ रही है। इसका असर व्यक्ति के स्वास्थ्य पर भी दिखाई देता है। वर्ष 2005-2006 में कराए गए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे के आंकड़े अपनी अलग ही कहानी कहते हैं। सर्वे के मुताबिक देश में कुपोषित लोगों की तादाद काफी ज्यादा है। सर्वे में कहा गया है कि देश में 5 साल से कम उम्र के बच्चे शारीरिक रूप से अविकसित हैं और इसी उम्र के 43 फीसदी बच्चों का वजन (उम्र के हिसाब से) कम है। इनमें से 24 फीसदी शारीरिक रूप से काफी ज्यादा अविकसित हैं और 16 फीसदी का वजन बहुत ही ज्यादा कम है। वहीं व्यस्कों की हालत भी कुछ ज्यादा ठीक नहीं है। देश में 15 से 49 साल की उम्र के बीच की महिलाओं का बॉडी मांस इंडेक्स (बीएमआई) 18.5 से कम है, जो उनमें पोषण की गंभीर कमी की ओर इशारा करता है और इन महिलाओं में से 16 फीसदी तो बेहद ही पतली हैं। इसी तरह देश में 15 से 49 साल की उम्र के 34 फीसदी पुरुषों का बीएमआई भी 18.5 से कम है और इनमें से आधे से ज्यादा पुरुष बेहद कुपोषित हैं। यदि कुपोषण और गिरते स्वास्थ्य का सीधा सम्बन्ध अखाद्य फसलों के उत्पादन से न भी हो तो भी कम से कम यह भविष्य के लिए चिंता का विषय तो है। ऐसा माना जाता है कि नकदी फसलों से आर्थिक सम्पन्नता आ रही है किन्तु वहीं उसका स्वास्थ्य से जुड़ा दूसरा पक्ष भी है जिसकी ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
एक जानकारी के मुताबिक वर्ष 1882-83 में गैर खाद्य फसलों की हिस्सेदारी 37.1 प्रतिशत थी जो कि 2005-06 तक 46.7 फीसदी तक पहुंच चुकी है। आज गेहूं-चावल की तुलना में फल-सब्जी, मछली आदि के उत्पादन में बढ़ोत्तरी हो रही है। 2000-01 और 2005-06 के बीच गेहूं व चावल समेत अनाजों का उत्पादन 21.63 फीसदी बढ़ा जबकि फल-सब्जी उत्पादन में 33.74 फीसदी और मछली के उत्पादन में 61 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है। कुल मिलाकर देखा जाए तो जहां खाद्य फसलों के उत्पादन में 2 प्रतिशत की वृध्दि हुई है वहीं अखाद्य फसलों के उत्पादन में 4 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट कहती है कि उँची कीमतों वाली फसलों की मांग बढ़ रही है शायद यही कारण है कि अखाद्य फसलों का उत्पादन बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं।
क्रिसिल के मुख्य अर्थशास्त्री डी.के. जोशी कहते हैं कि किसान अब ऊँची कीमतों वाली फसलों की तरफ बढ़ रहे हैं। वे कहते हैं कि इसमें किसानों को ज्यादा मुनाफे की उम्मीद रहती है और वह पूरी भी होती है लेकिन वहीं वे यह भी कहते हैं कि अनाज की कमी चिंता का विषय हो सकता है और ऐसे में इनकी मांग पर ध्यान देते हुए नीति निर्धारकों को हस्तक्षेप करने की जरूरत है।
पर असल में हालात इससे विपरीत ही हैं। नीति निर्धारकों को इस बात की कोई चिंता नहीं है कि लोगों की खाद्यान्न की पूर्ति भी एक मुद्दा है! गौरतलब है कि देश में फूलों के कारोबार में काफी वृध्दि पिछले कुछ वर्षों में हुई है। वर्ष 2004-05 में फूलों का निर्यात 221 करोड़ रुपयों का था जो कि 2006-07 में 650 करोड़ रुपयों का हो गया। मसलन इसमें 194 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है। फल-सब्जी का निर्यात 1363 करोड़ रुपयों के मुकाबले आज 2411 करोड़ रुपयों पर पहुंच गया है। यानि इसमें 77 प्रतिशत की वृध्दि हुई है। इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च (आईसीएआर) की 2006-07 की रिपोर्ट के मुताबिक कुल उत्पादन में ऊँची कीमत वाली फसल की बढ़ती हिस्सेदारी बताती है कि भारतीय कृषि जगत में खाद्य फसलों की हिस्सेदारी कम हो रही है।
कारण जो भी हों लेकिन यह तो स्पष्ट है कि अखाद्य फसलों का रकबा और उत्पादन बढ़ रहा है। तात्कालिक रूप से भलेही यह फायदेमन्द दिखाई दे लेकिन निश्चित ही भविष्य में इसके खतरे हैं। इस ओर गंभीरता से ध्यान देने की महती जरूरत है ताकि समय रहते स्थिति को सुधारने की दिशा में पहल की जा सके।
शिवनारायण गौर
ई 7/70 अशोका सोसायटी
अरेरा कॉलोनी, भोपाल 462016 (म.प्र.)
मो. 094254 33229
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Sunday, April 20, 2008

आटे दाल के भाव

सेव्वी सौम्य मिश्रा
खाद्य एवं कृषि संगठन (एफ.ए.ओ.) ने अपनी खाद्य दृष्टिकोण रिपोर्ट में खाद्यान्नों के मूल्यों में आगामी 10 वर्षों में वृध्दि का अनुमान लगाया है। हाल ही के वर्षों में अधिकांश खाद्यान्नों की आपूर्ति में जहां कमी आई है वहीं भोजन, चारा व औद्योगिक उपयोग के बढ़ने से इनकी मांग में भी अत्यधिक वृध्दि हुई है। हालांकि 2007-2008 में वैश्विक खाद्य उत्पादन में 5 प्रतिशत की वृध्दि का अनुमान तो है परन्तु यह वृध्दि मक्का जो कि बायो ईंधन में इस्तेमाल होने वाला मुख्य खाद्यान्न है, के उत्पादन में होगी।
गेहूं - दक्षिण पश्चिम अमेरिका और उत्तरी चीन में ठंड के मौसम में गेहूं की कमजोर फसल के कारण फरवरी 2008 में गेहूं की कीमतों में 15 प्रतिशत की वृध्दि हुई है। दिसम्बर 2005 व दिसम्बर 2007 के मध्य गेहूं की कीमतों में जबरदस्त उछाल आया और इस दौरान ये प्रतिटन 167 डालर से बढ़कर 381 डालर प्रतिटन तक पहुंच गई है। कुल मिलाकर यह वृध्दि ११५ प्रतिशत बैठती है। मूल्य वृध्दि का कारण विश्व में गेहूं के दूसरे सबसे बड़े आपूर्तिकर्ता राष्ट्र आस्ट्रेलिया में पड़ने वाला अकाल है। आस्ट्रेलिया में सामान्यतया 25 मिलियन टन गेहूं पैदा होता है। जबकि इस वर्ष उत्पादन घटकर मात्र 9.8 मिलियन टन रह गया है। वहीं कनाडा, यूरोपियन यूयनियन, तुर्की और सीरिया में भी विपरीत मौसम की वजह से निर्यात में कमी आई है। गेहूं की मांग बायोईधन और चारे के रूप में बढ़ने से भी अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति प्रभावित हुई है। इस कमी की वजह से भारत को लगातार दूसरे वर्ष भी गेहूं आयात करना पड़ा है। 2007-2008 में भारत ने 0.68 मिलियन टन एवं 2006-2007 में 5.8 मिलियन टन गेहूं का आयात किया था। कृषि लागत एवं मूल्य आयोग के अध्यक्ष टी.हक का कहना है कि 2008-2009 में भारत को गेहूं के आयात की आवश्यकता नहीं होगी। वहीं एक अन्य अनुमान के अनुसार भारत को अपने भंडार में वृध्दि के लिए 3 मिलियन टन गेहूं का आयात करना पड़ सकता है।
चावल - मार्च 2008 में चावल का मूल्य प्रति टन 500 डालर की सीमा को पार कर गया जो कि पिछले 20 वर्षों में अधिकतम है। जानकारों के अनुसार चावल की कीमत में दो गुनी से ज्यादा वृध्दि हुई है। इसकी एक वजह यह है कि 2007-2008 में चावल के उत्पादन में मात्र 0.6 प्रतिशत की वृध्दि हुई है। फिलीपीन्स व अफ्रीकी देशों में बढ़ती मांग से यह भी मूल्यवृध्दि हुई है। साथ ही पाकिस्तान में बिजली की कमी से चावल मिलों का बंद होना और चीन एवं भारत द्वारा चावल निर्यात पर रोक लगाना भी इस मूल्य वृध्दि के अन्य कारण हैं। भारत ने जहां मेडागास्कर, मारीशस व समुद्री तूफान से ग्रस्त बांग्लादेश के लिए आंशिक छूट दी है वहीं चीन ने तो इसके निर्यात पर पूण्र् ा प्रतिबंध लगा दिया गया है। इसी दौरान वियतनाम से फिलीपीन्स को टूटा हुआ चावल 750 डालर प्रति टन के भाव से बेचा। निर्यातकर्ताओं ने भी कीमतों में वृध्दि की संभावना के मद्देनजर चावल का भंडारण कर लिया है। वहीं पाकिस्तान में कुछ ही महीनों में चावल की कीमतों में 60 प्रतिशत की वृध्दि हुई है।
मक्का - दिसम्बर 2005 से दिसम्बर 2007 के मध्य मक्का की कीमतें 103 डालर प्रतिटन से बढ़कर 180 डालर प्रतिटन तक पहुंच गईं। 2007-2008 में मोटे अनाजों के उत्पादन में 9 प्रतिशत की रिकार्ड वृध्दि हुई जिसमें मक्का का सर्वाधिक योगदान है। इसके बावजूद इसकी कीमतें पिछले 10 वर्षों के अधिकतम स्तर 230 डालर प्रतिटन पर पहुंच गईं। इसकी वजह है मक्का का बायोईंधन और चारे के लिए किया जाने वाला उपयोग। मक्का के निर्यात में अमेरिका की हिस्सेदारी 60 प्रतिशत से भी अधिक है। परन्तु इस दौरान उसने इसकी एक चौथाई खपत बायो ईंधन के उत्पादन में कर ली। इस कार्य में उसने 2006-2007 में 54 मिलियन टन मक्का का इस्तेमाल कियाय जिसके 2007-2008 में बढ़कर 81.3 मिलियन टन हो जाने का अनुमान है।
तिलहन - पिछले डेढ़ वर्षों में सोयाबीन तेल और पाम आईल के भावों में जबरदस्त तेजी आई है। खाद्य पदार्थों में सर्वाधिक मूल्य वृध्दि इसी वर्ग में हुई है एवं इसके जारी रहने की संभावना भी है। पिछले एक वर्ष में पाम आईल की कीमतें 350 डालर से बढ़कर 1250 डालर पर पहुंच गईं। यानि की इनमें करीब 3.5 गुना वृध्दि दर्ज की गई है। वहीं सोयाबीन तेल की कीमतें बढ़कर 499.43 डालर पर पहुंच गईं हैं। साथ ही सोयाबीन और सूरजमुखी के उत्पादन में कमी भी इसके लिए जिम्मेदार है। वहीं पाम, पाम गिरी, गिरी (कोपरा), रेपसीड व मूंगफली के तेल उत्पादन में वृध्दि का अनुमान है। वैसे खाद्य तेलों की कीमतों में वृध्दि इनका बायोईंधन में हो रहे इस्तेमाल का परिणाम है। चीन और भारत में बढ़ती मांग भी मूल्यवृध्दि का एक कारण है। पाम आईल के सबसे बड़े उत्पादक मलेशिया में आई बाढ़ भी इसके लिए जिम्मेदार है। वहीं यूरोप में पाम आईल को अधिक स्वास्थ्यवर्धक मानने से भी इसकी मांग में वृध्दि हुई है। स्थिति की गम्भीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि चीन के एक स्टोर में प्रोत्साहन मूल्य यपर तेल बेचे जाने के दौरान हुई भगदड़ में तीन व्यक्तियों की मृत्यु हो गई और 31 घायल हो गए। मलेशिया में तो पारम्परिक वन क्षेत्रों को साफ करने वहां पाम का रोपण किया जा रहा है जिससे कि यूरोप की बायोईधन की मांग को पूरा किया जा सके।डेरी एवं पोल्ट्री - प्रति व्यक्ति आय बढ़पे से डेरी उत्पाद की मांग में वैश्विक वृध्दि हुई है। चीन और भारत इसमें सबसे आगे हैं। जानवरों द्वारा अनाज की चारे के रूप में बढ़ती खपत से भी खाद्यान्नों की आपूर्ति को उस ओर मोड़ना पड़ रहा है। एफ.ए.ओ. के अनुसार 20 वर्ष पूर्व के मुकाबले आज 200-250 मिलियन टन अनाज की चारे के रूप में मांग बढ़ चुकी है। साथ ही इसने यह भी भविष्यवाणी की है कि विकासशील देशों में गाय, भेड़ और बकरी के मांस की मांग में वृध्दि होगी। वहीं विकसित देशों में मांस के उत्पादन में कमी की आशंका है। एशिया खासकर भारत और चीन में दूध के उत्पादन में अधिकतक बढ़ोत्तरी हुई है। वहीं 2007 में जहां दूध की कीमतों में 12 प्रतिशत की वृध्दि हुई है वहीं 2008 में इसके उत्पादन में मात्र 2.7 प्रतिशत की वृध्दि की संभावना है। दूसरी ओर मात्र यूराप में सन 2014 तक 8 मिलियन टन अतिरिक्त दूध की आपूर्ति संभावित है। मांग और आपूर्ति के बीच का अंतर बढ़ता ही जा रहा है। इसके लिए सिर्फ जनसंख्या वृध्दि को ही उत्तरदायी यनहीं ठहराया जा सकता। वृध्दि के लिए आंचलिक परिस्थितियां भी जिम्मेदार हैं। समाधान खोजने वाले भी दो समूहों जिनमें से एक जैव संवर्धित (जी.एम.) खाद्यान्नों का समर्थक है ओर दूसरा इसके विरोधियों का है, के बीच बंट गए हैं। खनिज तेलों की कीमतों में वृध्दि भी खाद्यान्नों की मूल्य वृध्दि का प्रमुख कारण हैं। सन् 1973 में जब इन तेलों की कीमतों में वृध्दि हुई थी तब भी ऐसे ही परिणाम निकले थे। अमेरिका के कुल मकई/ज्वार उत्पादन का 25 प्रतिशत व मक्का का 20 प्रतिशत सिर्फ बायोईंधन के उत्पादन में लग रहा है। अमेरिका अगले 15 वर्षों में इस उत्पादन में दुगने से अधिक की वृध्दि चाह रहा है। इसके परिणाम स्व्रूप खाद्य पदार्थों के मूल्यों में वृध्दि तो होगी ही। विश्वबैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार एक मध्य आकार के वाहन में एक बार में जितना इथनाल भरा जाता है वह एक व्यक्ति के साल भर के भोजन के लिए पर्याप्त होता है। यूरोप के पर्यावरण आयुक्त स्टाव्रोज डिमास ने स्वीकार किया है कि यूरोपीयन यूनियन द्वारा सन् 2020 तक ग्रीन ईंधन की 10 प्रतिशत की अनिवार्यता खाद्य पदार्थों की कमी एवं वर्षा वनों की समाप्ति से उत्पन्न होने वाले खतरों को कमतर आंकना ही है। भारत भी इस ओर तेजी से कदम बढ़ाने की फिराक में हैं गत् अक्टूबर में भारत सरकार ने तय किया है कि अगले वर्ष से पेट्रोल में 10 प्रतिशत इथनाल अनिवार्य रूप से मिलाया जाए। यह वर्तमान से दुगना होगा। इसके लिए भारत को गन्ने का 16 प्रतिशत अतिरिक्त उत्पादन करना होगा। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रवीण झा का कहना है कि हमें बायोईंधन उत्पादन की लागत को समझना चाहिए। बायोईंधन संयंत्र के लिए न केवल हम खनिज ईंधन का अतिरिक्त प्रयोग करेंगे बल्कि जंगलों और मैदानी इलाकों की सफाई कर बायोईंधन फसल उगाएंगें। दूसरी ओर वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन को भी महसूस किया जाने लगा है। हाल ही प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार मध्यपूर्व व उत्तरी अफ्रीका में बढ़ते तापमान से कृषि को नुकसान पहुंचने लगा है। साथ ही मांस व अन्य डेयरी उत्पादों की मांग में असाधारण वृध्दि ने भी खाद्यान्नों की कीमतों में बढ़ोत्तरी की है। एफ.ए.ओ. का अनुमान है कि अमेरिका, ब्राजील और मेक्सिको में मोटे अनाज के उत्पादन में रिकार्ड वृध्दि बायोईंधन एवं चारे की जरूरत की वजह से की गई है। युगांडा, अंगोला और मोजाम्बिक जैसे उच्च आर्थिक विकास वाले अफ्रीकी देश भी अब अपने भोजन में चावल को प्राथमिकता देने लगे हैं क्योंकि इसको पकाना आसान है एवं घरेलू उत्पादन के बजाए इसका आयात भी आसान है। क्या भारत बढ़ती वैश्विक खाद्य मूल्यों से स्वयं को सुरक्षित रख पाएगा? इसका कोई निश्चित या सर्वमान्य उत्तर दे पाना संभव नहीं है। कुछ अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इस वृध्दि पर आगामी तीन महीनों में रोक लग सकती है वहीं कुछ मानते हैं कि यह प्रवृत्ति लंबे समय तक बनी रह सकती है। कृष्ज्ञि मंत्रालय का अनुमान है कि रबी के मौसम में 76 मिलियन टन गेहूं का उत्पादन होगा वहीं दिल्ली स्थित इंस्ट्टियूट आफ इकोनामिकल ग्रोथ का मानना है कि देश में अधिकतम 73 मिलियन टन गेहूं का उत्पादन हो सकता है। कृषि लागत व मूल्य आयोग ने चेतावनी दी है कि 2008-2009 में आवश्यक वस्तुओं के मूल्यों में व्यापक बढ़ोत्तरी होगी। साथ ही उसने इनकी आपूर्ति के प्रति भी शंका जाहिर की है। प्रसिध्द कृषि वैज्ञानिक एम.एस. स्वामिनाथन का कहना है कि मांग और आपूर्ति के अलावा कई अन्य घटक जैसे खनिज तेल के मूल्यों में वृध्दि आदि भी खाद्यान्न मूल्य वृध्दि में सहायक हैं। कृषि में वैसे भी उर्जा का काफी उपयोग होता है। साथ ही खनिज तेल की कीमतें 110 डालर प्रति बैरल पहुंचने से कृषि में प्रयुक्त होने वाले उत्पाद जैसे रासायनिक खाद व कीटनाशक भी महंगे हो जाएंगे।भारतीय उपभोक्ता द्वारा बढ़ती कीमतों से अधिक चुभन महसूस न किए जाने के पीछ यह कारण है कि यहां पर कीमतों को सब्सिडी के द्वारा नियंत्रण में रखा जाता है। इस क्रम में खाद्यान्न सब्सिडी जो कि 2006-2007 में 24 हजार करोड़ रुपए थी वह वर्तमान में बढ़कर 31 हजार करोड़ रुपए तक पहुंच गई है। ऐसा ही खाद पर दी जाने वाली सब्सिडी पर भी हुआ है। सब्सिडी के अलावा इसका एक अन्य कारण यह भी है कि हम धान और गेहूं दोनों ही उपजाते हैं इससे कीमतों को काबू में रखने में मदद मिलती है। हम हमारी घरेलू आवश्यकता का 90 से 95 प्रतिशत तक स्वयं ही पैदा करते हैं इसलिए हमारा आयात भी कम है जिसे हम अधिक दरों पर भी खरीद सकते हैं। इंस्ट्टियूट ऑफ इकोनॉमिक ग्रोथ, दिल्ली के सी.एस.सी. शेखर का कहना है कि निजी क्रेताओं द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य से अधिक पर खाद्यान्न खरीद लेने के परिणामस्वरूप सरकार के पास इनके आयात के अतिरिक्त अन्य कोई चारा नहीं बचता है। आवश्यकता है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य और खरीदी मूल्य को अलग अलग किया जाए। सरकार को किसानों से बाजार मूल्य यपर खाद्यान्न खरीदना चाहिए। वहीं एम.एस. स्वामीनाथन का कहना है कि कीटनाशक, खाद, बिजली इत्यादि जैसे विभिन्न कारकों के मूल्यांकन के पश्चात 15 प्रतिशत जोड़कर न्यूनतम समर्थन मूल्य निकाला जाता है जबकि यह कम से कम 50 प्रतिशत होना चाहिए। किसानों के राष्ट्रीय आयोग ने भी आयात कम करने के लिए किसानों को आकर्षक प्रस्ताव देने को कहा है। कीमतों को काबू में रखने के लिए भारत सरकार को बहुत शीघ्रता से खाद्यान्नों की खरीद करना होगी। यह भी कहा जा रहा है कि यदि भारत ने अंतरराष्ट्रीय बाजार से 10 से 20 लाख टन खाद्यान्न खरीद लिया तो कीमतों में और भी उछाल आएगा। ठंड में तिलहनों के उत्पादन में कमी ने चिंता और बढ़ा दी है क्योंकि खाद्य तेल के भाव बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं। वित्तमंत्री ने राज्यसभा को यह आश्वासन दिया है कि वे अपने नई मुद्रास्फीति को रोकने का पूरा प्रयत्न करेगें जिससे कि गरीबों पर इसकी मार न पड़े। इस क्रम में खाद्य तेल के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। साथ ही गेहूं और चावल के निर्यात पर काफी हद तक रोक लगा दी है। इसी के साथ खाद्य तेलों के आयात शुल्क में भी व्यापक कमी की गई है। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि निर्यात पर प्रतिबंध एक अल्पकालिक उपाय है एवं किसान विरोधी भी है। कृषि विशेषज्ञ स्वामीनाथन का कहना है कि पूर्वी भारत में अभी भी काफी संभावनाएं हैं। किसानों के लिए सही तकनीक, एक से अधिक फसल लेने का प्रशिक्षण एवं सरकारी योजनाओं का लाभ लेना आवश्यक है। (सप्रेस/सीएसई)