खेत-खलियान पर आपका स्‍वागत है - शिवनारायण गौर, भोपाल, मध्‍यप्रदेश e-mail: shivnarayangour@gmail.com
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Monday, December 17, 2007

औद्योगिक सभ्यता के निशाने पर खेती-किसान

सुनील
भारत की खेती और भारत के किसान ,आज इस औद्योगिक सभ्यता के प्रमुख निशाने पर हैं । बहुराष्ट्रीय कंपनियों को इसमें अपने मुनाफों की नयी संभावनाएं दिखाई दे रही हैं । भूमण्डलीकरण का जो चौतरफा हमला भारत के किसानों पर हो रहा है, सीधे जमीन का अधिग्रहण और विस्थापन उस हमले का सिर्फ एक हिस्सा है ।आम किसानों के लिए खेती की लागतों को बढ़ाना तथा उनको मिलने वाले कृषि उपज के दामों को गिराना ( या पर्याप्त बढ़ने न देना) और इस प्रकार खेती को निरंतर घाटे का धन्धा बनाना, इस हमले की रणनीति का प्रमुख अंग है । नतीजा यह हुआ है कि आम किसान भारी कर्ज में डूब रहे हैं और बड़ी संख्या में आत्महत्या कर रहे हैं । किसान स्वयं खेती छोड़ दें या फिर कंपनियों के चंगुल में आ जाएं इसके लिए कई कानून , नीतियाँ व योजनाएँ बनाई जा रही हैं । खाद्य स्वावलम्बन या खाद्य सुरक्षा की बात अब पुरानी हो गयी है । मुक्त व्यापार के सिद्धान्तकारों का कहना है कि कोई जरूरी नहीं कि भारत अपनी जरूरत का अनाज , दालें या खाद्य तेल खुद पैदा करें ।अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कर्पोरेट खेती ही आगे बढ़ेगी , शेष खेती डूब जायेगी । जब भारत सरकार खेती की विकास दर बढ़ाने और दूसरी हरित क्रांति की बात करती है , तो उसकी नजर में इसी प्रकार की खेती होती है । इसलिए , भारत सरकार हो या पश्चिम बंग सरकार , सिंगूर-नन्दीग्राम के छोटे छोटे किसानों की खेती को बचाना या उसे समृद्ध बनाना , उनके एजेण्डे में नहीं है । यह एक संयोग नहीं है कि पिछले वर्षों में पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार की कृषि नीति को तैयार करने का काम ब्रिटेन की मेकिन्जी नामक उसी सलाहकार कंपनी को दिया गया था , जो विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक की परियोजनाओं में अक्सर मौजूद रहती है और जो भारत के योजना आयोग , भारत सरकार के अनेक मंत्रालयों और भूमण्डलीकरण पथ अनुगामी राज्य सरकारों को अक्सर सलाह देती रहती है ।
यह सही है कि आज भारत के किसानों की हालत अच्छी नहीं है और गांवों में रोजगार , प्रगति तथा बेहतरी के अवसर नजर नहीं आते हैं । बुद्धदेव भट्टाचार्य जब सवाल पूछते हैं कि ' क्या किसान का बेटा किसान ही रहेगा ? ' तो वे ग्रामवासियों और किसानों की इस बदहाली व प्रगतिहीनता की स्थिति को अपने पक्ष में भुनाना चाहते हैं । लेकिन सवाल यह है कि गांव - खेती की इस बदहाली , जाहिली व गतिहीनता के लिए कौन जिम्मेदार है ? क्या तीस वर्षों से बंगाल पर राज कर रही वामपंथी सरकार स्वयं नहीं , जिसने ऑपरेशन बरगा वाले भूमि सुधारों को अपने कर्तव्य की इतिश्री मान ली और उसके बाद कुछ नहीं किया ? क्या भारत सरकार और पश्चिम बंगाल द्वारा समान रूप से अपनाई जा रही विकास नीतियाँ इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं ?
दूसरा सवाल यह है कि सिंगूर-नन्दीग्राम वगैरा से बेदखल कितने किसान-पुत्रों को महानगरों में सम्मानजनक रोजगार मिल पाएगा ? क्या वे महानगरों के नारकीय जीवन वाली झुग्गी झोपड़ियों की संख्या ही बढ़ाने का काम नहीं करेंगे ?
जब बुद्धदेव भट्टाचार्य ( या मनमोहन सिंह , चिदम्बरम ,अहलूवालिया) औद्योगीकरण को बंगाल (या भारत) की बेरोजगारी की समस्या का एकमात्र हल बताते हैं , तो वे इस ऐतिहासिक तथ्य को भूल जाते हैं कि इस प्रकार के औद्योगीकरण से दुनिया में कहीं भी बेरोजगारी की समस्या हल नहीं हुई है ।इस औद्योगीकरण से तो बेरोजगारी पैदा होती है , खतम नहीं होती है । पश्चिमी यूरोप के देशों में भी पूँजीवाद एवं औद्योगीकरण ने बेरोजगारी पैदा की है । लेकिन वहाँ की बेरोजगारी हमें इसलिए नहीं दिखाई देती , क्योंकि यूरोप के लोग अमरीका- ऑस्ट्रेलिया - दक्षिणी अफ्रीका में फैल गये और वहाँ के मूल निवासियों को बेदखल करके वहाँ के संसाधनों पर कब्जा करके वहीं बस गये । एक प्रकार से अपनी बेरोजगारी व बदहाली उन्होंने गैर-यूरोपीय अश्वेत लोगों को स्थानांतरित कर दी । आज भी यूरोप-अमरीका से रोजगार का प्रमुख स्रोत उद्योग नहीं तथाकथित सेवाएँ हैं ।ये सेवाएँ एक प्रकार का भ्रामक नाम है । पूरी दुनिया को लूटकर जो पैसा व समृद्धि अमरीका-यूरोप में बटोरी जाती है , उसी को आपस में बांतने व मौज करने का नाम ये सेवायें हैं ।पाँच सितारा होटल , रेस्तराँ , पर्यटन , टेलीफोन , टी.वी. , फिल्म , विज्ञापन , परिवहन , व्यापार , बैंक , बीमा आदि आज की प्रमुख सेवाएँ हैं । इन सेवाओं में वास्तविक उत्पादन या सृजन नहीं होता है ।खेती-उद्योगों में जो उत्पादन और आय-सृजन होता है , उसी को बांटने का काम सेवाएँ करती हैं । इन्हें परजीवी भी कहा जा सकता है ।
जिस चीन की चमत्कारिक प्रगति को आज मनमोहन - माकपा दोनों अनुकरणीय मान रहे हैं, वहाँ भी तेजी से औद्योगीकरण और निर्यातों में वृद्धि होने के बावजूद रोजगार में वृद्धि नहीं हुई है। 'फ्रन्टलाइन' के एक ताजे अंक में अर्थशास्त्री जयति घोष ने अपने स्तम्भ में बताया है कि चीन में उद्योगों से अधिकतम रोजगार वर्ष १९९५ में १० करोड़ से भी कम था । निर्यात-आधारित उद्योगों में तेजी से वृद्धि के बावजूद उद्योगों से रोजगार अब उस से भी १२ प्रतिशत कम है । (फ्रन्टलाइन , १२ अप्रैल २००७) ।
अमरीका-यूरोप की समृद्धि की चकाचौंध से चमत्कृत पूँजीवादी तथा माकपा-छाप साम्यवादी दोनों एक साधारण सा प्रश्न भूल जाते हैं । यूरोप-अमरीका में खेती और उद्योगों से बेदखल व बेरोजगार हुए लोग तो पूरी दुनिया में बंट गये , औपनिवेशिक तथा नव-औपनिवेशिक लूट में खप गए ,जम गए। भारत में यदि बड़े पैमाने पर गाँव गाँव-खेती से लोग बेदखल होंगे, तो वे करोडों लोग कहाँ जाएंगे?उनका क्या भविष्य होगा ?