खेत-खलियान पर आपका स्‍वागत है - शिवनारायण गौर, भोपाल, मध्‍यप्रदेश e-mail: shivnarayangour@gmail.com

Saturday, January 3, 2009

खेती उजाड़ता कृषि प्रधान समाज

खेती इस पृथ्वी पर प्रारंभ हुई सम्भवत: पहली नियोजित मानव क्रिया है जो कई मार्ग बदलकर आज पुन: अपना अस्तित्व खोज रही है। वर्तमान खाद्यान्न असुरक्षा इसी भटकाई हुई खेती के ही कारण है। औद्योगिक देशों में फसल को नष्टकर उद्योग खड़े किए गए थे लेकिन कृषि प्रधान भारत में जहां आज भी तीन चौथाई आबादी खेती पर निर्भर है, वहां इस तरह का भटकाव एक गंभीर मसला है। खेती की इस बदहाली के लिए हमारे राजतंत्र और प्रशासनत्रत्र जिम्मेणदार है जिसने आजादी के बाद पारम्पेरिक खेती और ग्रामीण समाज की अनदेखी कर औद्योगिक खेती को विकसित करने में सहायता प्रदान की। खाद्यान्नद सुरक्षा भारत की बुनियाद थी। यह न केवल मनुष्ये के लिए थी बल्कि मवेशियों के लिए भी हर गांव में तालाब और चरणोई हुआ करते थे। सीमित सिंचाई व्यकवस्थाल के कारण भारत में शुष्को खेती का प्रचलन था। ज्वाथर, मक्काव, बाजरा, कोदो, कुटकी, तिवड़ा, मोटा कपास व अलसी जैसी फसलों का बोलबाला था। बहुफसलीय खेती होने के कारण मिट्टी की सतह और उर्वरता श्रेष्ठ दर्जे की थी। खेतों में कीड़े और रोगों का आक्रमण कम होता था। कम अथवा अधिक वर्षा होने पर भी खाद्यान सुरक्षित रहता था क्योंककि उथली जड़ों वाली फसलों का उत्पावदन और उत्पासदकता भी कम नहीं थी। जल, भूमि ओर उर्जा का दोहन होता था, शोषण नहीं। अलबर्ट हॉवर्ड और जॉन अगस्टिन वोलकेयर जैसे अंग्रेज वैज्ञानिक भी भारतीय किसानों का लोहा मानते थे। मोटे देशी कपास के कारण गांव गांव में चरखे चलते थे। देशी हल व बक्खवरों के कारण लुहार व सुतार गांव गांव में उपलब्धर थे। ज्वा र, बाजरा, मक्का् जैसी फसलों के कारण मवेशियों को चारा मिल जाता था।
विदेशी कृषि तंत्रों से प्रभावित हमारे योजनाकारों ने हरित क्रांति के चक्कर में भारतीय फसलचक्र तोड़ा। बहुफसलीय खेती की जगह चावल, गेहूं और सोयाबीन जैसी नगदी और एक फसल पद्धति को अपनाया जिससे खेतासन्तुलन बिगड़ा। खेतों में जीवांश कम हुए। उत्पादकता घटी और रोगग्रस्तता में वृद्धि हुई। लिहाजा देश में रासायनिक खादों ओर कीटनाशकों के कारखानों का जाल बिछा। फिर ट्रेक्टर, कार्बाइन व हार्वेस्टर आए। नगदी फसलों के कारण धन (मुद्रा) तो बढ़ा लेकिन दौलत (चारा, मवेशी लकड़ी, पानी और कारीगरी) कम होती गई।
यह सब खेतों में उत्पादन बढ़ाने के लिए हुआ लेकिन योजनाकार भूल गए कि बाहरी संसाधनों के निर्माण में लगने वाली उर्जा की खपत बढ़ने से गांवों में उर्जा कम हुई सूखती फसल को बचाने कुओं पर लगाए गए पंप और मोटर के लिए उर्जा गायब हो गई। महंगे संसाधनों के कारण फसलों का गणित बिगड़ा व लागत खर्च बढ़ा। फसलों के वाजिब दाम नहीं मिले। ऐसे में आत्महत्या के सिवाय किसानों के पास चारा ही क्या था?
किसी ने यह समझने की कोशिश ही नहीं की कि फसल को जो भोजन लगता है वह 95 प्रतिशत तो प्रकृति से ही प्राप्त होता है जिसके लिए न तो बिजली लगती है और न कोई बाहरी संसाधन। उसे तो खेतों में पर्याप्जीवांश ओर नमीं चाहिए जो फसल अवशेषों से, गोबर ओर गोमूत्र से ही प्राप्त हो जाती है। जंगलों को ही लें, वहां कौन सिंचाई करने या खाद देने या कीटनाशक छिड़कने जाता है, फिर उनकी समृद्धि कहां से आती है?
इस मूलभूत तथ्य को आज भी नजरअंदाज किया जा रहा हैं क्योंकि हमारे कृषि विश्वविद्यालय और अनुसंधानकर्ता विदेशी कृषि तंत्र अपनाए हुए हैं जहां रासायनिक खाद, कीटनाशक और अन्य बाह्य संसाधन आज भी प्रमुख मजाते हैं। भारत की जैव-विविधता, विशास वनस्पति संपदा और हमारे प्राकृतिक संसाधनों पर आज भी कृषि विश्वविद्यालय मौन हैं। वहां आज भी गिनी चुनी फसलों की जातियां विकसित करने पर ही जोर दिया जा रहा है अअब तो जीन रूपांतरित फसलों का बोलबाला है। हमारे अनुसंधानकर्ता भी उसी के पीछे पड़े हैं।
बोरलाग, जिन्होंने भारत में मैक्सिन जाति के गेहूं बीज बोकर हरित क्रांति का शंखनाद किया था, विगत कई वर्षों से अब मक्का पर अनुसंधान कर रहे हैं जबकि हम आज भी गेहूं की नई-नई जातियां विकसित किए जरहे हैं। गेहूं छोड़कर बोरलाग मक्का पर क्यों आए? क्या इसलिए कि बदलते मौसम के कारण गेहूं का उत्पादन और उत्पादकता घटने लगी है? या इसलिए कि गेहूं में निहित ग्लूटिंन मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक सिद्ध हो रहा है या इसलिए कि अमेरिका में अब मोटे अनाज का प्रचलन बढ़ रहा है। अलसी जो कभी भारत में खेतों की जानदार फसल हुआ करती थी। अमेरिका में आजकल अलसी का तेल सबसे महंगा बिक रहा है और देश के अधिकांश हिस्सों में बोने के लिए अलसी का बीज ही उपलब्ध नहीं है।
अरुण डिके

अरुण डिके कृषि वैज्ञानिक हैं। इन्दौर में रहते हैं। उनका यह लेख सप्रेस से प्रसारित हुआ हैं। यहां पर इस लेख का संपादित अंश खेत खलियान पर है।खेत खलियान की ओर से शिवनारायण गौर