खेत-खलियान पर आपका स्‍वागत है - शिवनारायण गौर, भोपाल, मध्‍यप्रदेश e-mail: shivnarayangour@gmail.com
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Thursday, September 11, 2008

संकट की खेती

एशिया की खाद्य सुरक्षा की स्थिति दो देशों के उदाहरण से समझी जा सकती है। पहला, फिलीपीन जहां खाद्य सुरक्षा बुरी तरह टूट चुकी है। दूसरा देश चीन है जहां खाद्य सुरक्षा को काफी मजबूत रखा गया है, पर ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि अगर कुछ महत्वपूर्ण कमियों की ओर ध्यान नहीं दिया गया तो भविष्य में गंभीर समस्याएं उत्पन्न हो सकती है। फिलीपीन की मुख्य फसल चावल है। और यह देश कुछ वर्ष पहले तक चावल उत्पादन में आत्मनिर्भर था। अब यह विश्व का सबसे अधिक चावल आयात करने वाला देश बन चुका है।
पिछले तीन दशकों के दौरान अंतरराष्ट्रीय वित्त संस्थाओं की ओर से विदेशी कर्ज वापसी की बड़ी किस्तें जमा करने और जरूरी घरेलू खर्च को कम करने के लिए फिलीपीन पर बहुत दबाव डाला गया। कृषि की प्रगति और किसानों की सहायता के अनेक सरकारी कार्यक्रम ठप्प हो गए या उनमें काफी कटौती हुई। किसानों की कठिनाइयां बढ़ गईं और पैदावार कम होने लगी। इसी दौरान विश्व व्यापार संगठन के नियमों के अंतर्गत फिलीपीन आयातों से संख्यात्मक प्रतिबंध हटाने और आयात शुल्क कम करने के लिए दबाव बनाया गया। इस कारण चावल के अतिरिक्त मक्के की खेती, सब्जी उत्पादन, मुर्गी पालन आदि पर भी प्रतिकूल असर पड़ा।
दूसरी ओर चीन ने चावल, गेहूं मक्का जैसे मुख्य खाद्यान्नों में आत्मनिर्भरता बनाए रखी है। लेकिन अपने यहां भोजन की सबसे महत्वपूर्ण फसल सोयाबीन के मामले में वह मार खा गया और आयात पर उसकी निर्भरता काफी बढ़ गईं। विश्व व्यापार संगठन से हुई वार्ता के दौरान चीन सोयाबीन पर आयात शुल्क तीन प्रतिशत तक कम करने को राजी हो गया। इसके बाद वह सोयाबीन का सबसे बड़ा आयातक बन गया। इसका चीन के सोयाबीन किसानों पर बहुत प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।
दूसरी समस्या यह है कि खाद्याान्न और अन्य कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए कई स्थानों पर रासायनिक खाद और कीटनाशकों को अंधाधुंध उपयोग हुआ है जो आगे चलकर समस्याएं पैदा करेगा। सिंचाई की कुछ बड़ी परियोजनाएं भी पर्यावरण के लिए समस्याएं बढ़ाने वाली हैं। तेज औघेगीकरण और शहरीकरण के कारण कृषि क्षेत्र का बड़ा हिस्सा हमेशाा के लिए लुप्त हो गया है। इन सब कारणों से भविष्य में चीन में खाद्य उत्पादन बढ़ाना कठिन हो सकता है।
इसी तरह एशिया के अधिकतर देशों में पहले से खाद्य संकट मौजूद है या उत्पादन बढ़ाने के ऐसे तौर-तरीके अपनाए गए हैं जिनसे भविष्य में खाद्य आवश्यकताओं को पूरा करने में कठिनाई आ सकती है। अंतरराष्ट्रीय वित्त और व्यापार संस्थानों की नियमों और शर्तों के कारण भी इन देशों के जरूरतमंद लोगों की कठिनाइयां बढ़ रही हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियों का तेजी से प्रसार कृषि और खाद्य क्षेत्र के संकट को और उग्र कर रहा है। इन चिंताजनक परिस्थितियों में यह जरूरी है कि एशिया के देश आपस में खाद्य सुरक्षा संबंधी मुद्दों पर सहयोग और सहायता बढ़ाने के प्रयास करें। बहुराष्ट्रीय कंपनियों, धनी देशों और उनके द्वारा नियंत्रित संस्थानों से बातचीत में एशिया के किसानों को अपने हितों की रक्षा के लिए एकजुट होना चाहिए।
दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि कृषि को पर्यावरण की रक्षा से जोड़ने के साथ-साथ टिकाऊ तकनीकों का प्रसार करना चाहिए। गांवों में जल-संरक्षण और हरियाली पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है। इससे वह बुनियाद तैयार होगी जिससे रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर निर्भर हुए बिना ही पर्याप्त खाद्य उत्पादन हो सकेगा। इस प्रयास में कृषि के परंपरागत ज्ञान और परंपरागत बीजों से बहुत मदद मिल सकती है। विशेषकर चावल के मामले में परंपरागत बीजों और धान की बहुत-सी किस्मों की जैव-विविधता का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है।
जब चावल के संदर्भ में सरकार द्वारा बहुप्रचारित हरित क्रांति की विफलता और रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर अत्यधिक निर्भरता हानिकारक सिध्द होने लगी तो देश की इस सबसे महत्वपूर्ण फसल के बारे में चिंतित सरकार को वर्षों से उपेक्षित महान कृषि वैज्ञानिक डॉ. आरएच रिछारिया की याद आई। सन 1983 में इंदिरा गांधी के कार्यकाल में प्रधानमंत्री कार्यालय ने उन्हें चावल का उत्पादन बढ़ाने के लिए एक कार्ययोजना बनाने का आग्रह किया। डॉ. रिछारिया ने एक कार्ययोजना तैयार की, पर इंदिरा गांधी की मृत्यु के बाद यह दस्तावेज उपेक्षित ही रह गया।
इस दस्तावेज में उन्होंने उन कारणों की पहचान की थी, जिनकी वजह से पिछले लगभग बीस वर्षों में खाद, कीटनाशकों, सिचाईं, अनुसंधान, प्रसार आदि पर बहुत खर्चा करने बावजूद उत्पादकता वृध्दि की दर में वांछित तेजी नहीं लाई जा सकी है। उसके बाद उन्होंने मुख्य रूप से तीन भाग में अपनी योजना सामने रखी थी। पहली, चावल का विकास समृध्द देशी जनन द्रव्य पर आधारित होगा, जिनका अन्वेषण और संरक्षण होना चाहिए। दूसरी, एक अति विकेंद्रित प्रसार नीति और तीसरी, कृंतक प्रसार विधि का सुधरी किस्मों के प्रसार के लिए व्यापक स्तर पर उपयोग।
हालांकि यह योजना भारत के संदर्भ में बनाई गई, पर इससे एशिया के कई अन्य देश भी लाभान्वित हो सकते हैं।
भरत डोंगरा

Wednesday, February 13, 2008

कृषि को मंदी से उबारने की पहल

एमएस स्वामीनाथन
दृष्टिकोण. कृषि क्षेत्र में लगभग तीन दशकों की संतुलित वृद्धि के बाद पिछले दस सालों से उत्पादन और उत्पादकता दोनों स्थिर होती जा रही है। योजना आयोग द्वारा तैयार ११वीं योजना के दस्तावेज में भी कृषि क्षेत्र में तकनीकी और विस्तारपरक मंदी का जिक्र किया गया है। दस्तावेज में साफतौर पर कहा गया है कि पिछले कुछ वर्षो से कृषि क्षेत्र में न तो किसी नई तकनीक का आगमन हुआ है और न ही कृषि क्षेत्र का विस्तार हो पा रहा है। नतीजतन हरित क्रांति की प्रक्रिया में मंदी के लक्षण स्पष्ट दिखने लगे हैं। ऐसे में कृषि क्षेत्र की प्रगति को बनाए रखने और इस क्षेत्र में कार्यशील पुरुष और महिलाओं के बीच नई ऊर्जा का संचार करने के लिए हमें एक त्रि-स्तरीय रणनीति को अपनाने की आवश्यकता है।
इस रणनीति के तहत पहला कदम यह होना चाहिए कि हरित क्रांति के हृदय स्थल रहे पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तरप्रदेश में हरित क्रांति के दौरान प्राप्त की गई सफलता को बनाए रखा जाए। ये क्षेत्र भू-जल स्तर में गिरावट, प्रदूषण और मिट्टी के लवणीकरण सरीखी पर्यावरणीय समस्याओं के साथ-साथ आर्थिक समस्याओं जैसे फसलों की प्रतिकूल कीमतों-पैदावार के जोखिम से भी जूझ रहे हैं। यहां यह ध्यान रखना चाहिए कि अगर कृषि की पर्यावरणीय स्थिति और अर्थव्यवस्था गलत दिशा में जाती है, तो कृषि के सही दिशा में जाने का कोई भी मौका सामने नहीं होगा।
हरित क्रांति के हृदय स्थल अब भी हमारे खाद्य सुरक्षातंत्र के मुख्य आधार हैं। आज भी सार्वजनिक वितरण व्यवस्था के लिए इन क्षेत्रों से बहुत बड़ी मात्रा में गेहूं और चावल खरीदा जाता है। इसलिए आने वाले समय में हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए कि कृषि के संरक्षण द्वारा इन क्षेत्रों में क्रांति के लाभ को हर कीमत पर बचाए रखा जाए। यह कार्य केवल कृषि के संरक्षण से ही हो सकता है और पर्यावरणीय स्थिति को किसी प्रकार का नुकसान पहुंचाए बिना ही उत्पादकता की वृद्धि को निरंतर बनाए रखा जा सकता है।
रणनीति का दूसरा कदम तकनीक के लाभ को नए क्षेत्रों, विशेषकर पूर्वी भारत और सूखा प्रभावित क्षेत्रों में विस्तार से संबंधित है। कृषि उत्पादन के मामले में पूर्वी भारत एक बड़ा भंडार है, जिस पर अभी तक ध्यान नहीं दिया गया है। पूर्वी क्षेत्र पर्याप्त वर्षा आच्छादित है, लेकिन दक्षिणी-पश्चिमी मानसून से इस क्षेत्र में भारी वर्षा और बाढ़ की स्थिति भी आ जाती है। इसलिए इस क्षेत्र में वर्षा जल के साथ-साथ भूमि जल स्तर का कृषि कार्यो में संयुक्त रूप से उपयोग करना संभव होगा।
इस क्षेत्र में एक नई कृषि पद्धति को अपनाने की जरूरत है, जिससे गेहूं, चावल, मक्के के साथ अन्य फसलों की उत्पादकता पर्यावरण के संरक्षण और मिट्टी की गुणवत्ता को बनाए रखते हुए बढ़ाई जा सके। इकोलॉजी को किसी प्रकार का नुकसान पहुंचाए बिना नई तकनीक के प्रयोग से सिंचाई के जल और डीजल का उचित उपयोग सुनिश्चित किया जा सकता है, जिससे कि आय और फसलों की सुरक्षा के साथ अच्छी पैदावार हो सके। इसलिए देश की यह उच्च प्राथमिकता है कि पर्याप्त वष्र वाले क्षेत्रों में कृषि कार्यो का संरक्षण किया जाए ।
रणनीति का तीसरा कदम नए क्षेत्रों के विकास से लाभ कमाने से संबंधित है। इसके लिए जरूरी है अनाज के नए पौधों, फसलों की विविधता और शस्य गहनता की नई तकनीकों को पशुधन के साथ इंटीग्रेटेड फार्मिग से जोड़ना। फसल अर्थव्यवस्था में पशुधन को जोड़ने से आर्गेनिक खेती को बढ़ावा मिलेगा। जिन किसानों के पास पशुधन नहीं हैं, उनके लिए हरित क्रांति की तकनीकों को प्रस्तुत किया जा सकता है। आर्गेनिक फार्मिग में खनिज प्रधान उर्वरकों और रासायनिक कीटनाशकों का प्रयोग पूर्णतया वर्जित करना होगा। साथ ही आर्गेनिक फार्मिग में जेनेटीकली मोडीफाइड फसलों की प्रजातियों के प्रयोग की भी अनुमति नहीं होती है।
दूसरी तरफ हरित खेती में पौष्टिकता की आपूर्ति और कीट प्रबंधन के लिए खनिज उर्वरकों और रासायनिक कीटनाशकों के थोड़े और आवश्यक प्रयोग की सीमित अनुमति होती है। एक हेक्टेयर या उससे कम जोत वाले किसानों की बहुलता को देखते हुए उनके लिए हरित खेती पर्यावरणीय रूप से भी एक उपयुक्त आर्गेनिक विधि साबित होगी। इन तीनों रणनीति के परिचालन की शर्तो में कृषि संरक्षण और बायोइंडस्ट्रियल वॉटरशेड की स्थापना को शामिल करते हुए इन्हें बढ़ावा दिया जाए। इस प्रक्रिया से हमारे देश में स्थित प्रत्येक वाटरशेड नौकरियों और आय से जल को जोड़ने के लिए प्रभावी बायोइंडस्ट्रियल वॉटरशेड भी बन जाएगा।
लाभप्रद मार्केटिंग के अवसर सुनिश्चित होने पर वॉटरशेड के आधार पर बहुत से छोटे उद्यम स्वयं सहायता समूहों द्वारा पुरुषों और महिलाओं के लिए शुरू किए जा सकते हैं। आज हमारी कृषि के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती गैर-कृषि क्षेत्र में नौकरियों की गति को बढ़ाने की है। बायोइंडस्ट्रियल वॉटरशेड कृषि और गैर-कृषि दोनों क्षेत्रों में आय की वृद्धि और काम की सुरक्षा को नए अवसरों के आधार पर मुहैया कराएगी। हमारे देश में कुपोषण की व्यापकता का कारण बाजार में खाद्य पदार्थो की कमी न होकर ग्रामीण इलाकों में लोगों की क्रय-क्षमता का कम होना है। ऐसे में बायोइंडस्ट्रियल वॉटरशेड की यह प्रक्रिया हमारे देश की खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने में मददगार होगी।
किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्याओं और कृषि क्षेत्र में बढ़ रहे दुख व कष्ट को हम एक दर्शक की तरह देखते नहीं रह सकते। इसे समझते हुए कृषि क्षेत्र में एक नवीकरण प्रोग्राम की शुरुआत की महती आवश्यकता है जो कि इस क्षेत्र में अब तक प्राप्त की गई उपलब्धियों को स्थायित्व तो प्रदान करे ही, साथ ही और नए-नए क्षेत्रों में इस उपलब्धि का प्रचार-प्रसार भी करे। उद्देश्य यही होना चाहिए कि वे हर संभावित कदम उठाए जाएं जो एग्रो-प्रोसेसिंग तथा गैर-कृषि क्षेत्रों में रोजगार के बड़े अवसर बनाने में सहायक हों।

दैनिक भास्कर से साभार Wednesday, February 13,
-लेखक राष्ट्रीय कृषक आयोग के अध्यक्ष रहे हैं और वर्तमान में संसद सदस्य हैं।

Tuesday, December 4, 2007

खेती का कम्पनीकरण

सुरेश दीवान
भूमण्डलीकरण का एक रूप उत्पादन के भूमण्डलीकरण का है अस्सी व नब्बे के दशक में उत्पादन प्रक्रिया का तीब्र गति से भूमण्डलीयकरण हुआ। विश्व बैक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष ने विकासशील देशों पर इस दवाब के चहरे को ढांचागत समायोजन का नाम दिया। उदारीकरण की नीति के कारण कृषि क्षेत्र मे सरकारी निवेश घटकर 3-4 प्रतिशत रह गया है। दूसरी ओर निजी पूंजी निवेश का ग्राफ बढ़ रहा है। जिसके चलते भारतीय कृषि संकट की स्थिति में है। भूमण्डलीकरण की नीति ने कोढ़ में खाज का काम किया। उदारीकरण के रास्ते बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारतीय कृषि पर अनेक तरह से हमला कर रही हैं। भारत में 80 प्रतिशत आबादी खेती से आजीविका प्राप्त करती है खेती न केवल आजीविका का स्रोत है लोगो की संस्कृति से भी जुड़ी हुई है। देश के 85 प्रतिशत किसान छोटे व मध्यम वर्गीय है। इनमें से दो तिहाई कृषक सूखी खेती पर निर्भर है। करीब 25 करोड़ लोग जो गरीबी रेखा के अंर्तगत हैं वे ग्रामीण क्षेत्र में निवास करते हैं।
होशंगाबाद जिले में हरित क्रांति के नाम पर 1974 से तवा परियोजना से सिंचाई शुरू हुई, लगभग उसी समय से ही फसल चक्र में बदलाव आया। जिले की उपजाऊ जमीन, आवश्यक आधारभूत संरचना, यातायात की सुगमता, इन्दौर और भोपाल से नजदीकी आदि अनेक कारणों से बहुराष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय कृषि व्यवसायिक प्रतिष्ठानों की घुसपैठ की शुरूआत इस जिले में हो चुकी है। यह जिला इन कंपनियों के प्रयोगों का प्रवेशद्वार बन चुका है। यहाँ तक की जिले का दक्षिणी इलाका जो आदिवासी बहुल है वहाँ भी मोनसेन्टो जैसे बहुराष्ट्रीय कंपनी प्रवेश कर चुकी है। होशंगाबाद से इटारसी अथवा होशंगाबाद से पिपरिया मार्ग पर आपको इन प्रतिष्ठानों के बड़े-बड़े ढाँचे देखने को मिलेंगे। यह एक विरोधाभास है कि इस जिले के लघु, सीमान्त कृषक प्रति वर्ष जमीन से बेदखल हो रहे है। ग्रामीण महिलाओं की बेरोजगारी में वृध्दि हो रही है। बच्चों व गर्भवती माताओं में खून की कमी और पोषण संबंधी कमी के लिए आई.सी.डी.एस. जैसे कार्यक्रम ऑंगनबाड़ी के तहत् चलाए जा रहे हैं। दूसरी तरफ यह कहा जा रहा है कि यह जिला पंजाब और हरियाणा के मुकाबले में हो गया है। यह सच है कि जिले के 5 प्रतिशत बड़े किसान हरितक्रान्ति के दौरान संपन्न हुए हैं लेकिन 95 प्रतिशत किसान अभी भी विपन्न हैं। उदारीकरण और मुक्त व्यापार के इस दौर में खेती में निजी पूँजी निवेश को बढ़ावा देने की शासकीय नीति रही है। इसी के चलते होशंगाबाद जिले का परिदृश्य बदलता नजर आ रहा है। निजी क्षेत्र के कृषि में प्रवेश से यहाँ के लघु, सीमान्त किसान विशेषकर महिला, आदिवासी और पिछड़े वर्ग पर क्या प्रभाव पड़ेगा, इसकी पड़ताल जरूरी है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों की एक समानान्तर सरकार है लोकतंत्र की दुहाई देने वाली कंपनियों की रीति नीति में पारदर्शिता का अभाव है।