खेत-खलियान पर आपका स्‍वागत है - शिवनारायण गौर, भोपाल, मध्‍यप्रदेश e-mail: shivnarayangour@gmail.com

Friday, July 31, 2009

जैविक खेती से किसानों में खुशी

साठ के दशक में शुरू हुई हरित क्रांति के बाद देश खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर ही नहीं बल्कि अग्रणी देश भी बन गया। हरित क्रांति के नाम पर खेती में कीटनाशकों और खाद के रूप में रसायनों के जमकर हुए प्रयोग ने हमारे किसानों का उत्पादन तो बढ़ाया लेकिन साथ ही हमारी प्राकृतिक संपदा का भरपूर दोहन भी किया। धीरे धीरे बंजर हुई ज़मीन का उत्पादन मात्रा में कम और निम्न गुणवत्ता वाला होने लगा और भारी कर्ज़ से दबने के बाद परेशान किसानों ने आत्महत्याएं करनी शुरू कर दीं। देश के नीति निर्धारकों को इस विपदा से निपटने का एकमात्र उपाय नज़र आया रासायनिक खेती के बजाय जैविक खेती कराना।

मिट्टी को जीवन यापन का आधार मानने वाले भारत के लिए जैविक खेती कोई नई बात नहीं है। देश की पुरानी पारंपरिक खेती में भी गाय और दूसरे पालतू पशुओं के गोबर से बनी खाद का उर्वरकों के रूप में इस्तेमाल होता था। पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए लाभदायक इस जैविक खेती ने फिर लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। जैविक खेती में रसायनों का प्रयोग करते हुए फसलों और मिट्टी को फायदा पहुंचाने वाले कृमियों और सूक्ष्म जीवों का संरक्षण होता है जिससे जमीन की उर्वरा शक्ति बनी रहती है। जैविक खेती रसायनों से होने वाले दुष्प्रभावों से पर्यावरण को बचाती है और इसके माध्यम से जैव पर्यावरण का भी संरक्षण होता है। सबसे बड़ी बात यह है कि जैविक खेती के जरिये ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में करीब 35 फीसदी की कमी की जा सकती है।

किसानों की सहकारी संस्था नैफ़ेड और आईटीएस यानी इंटरनेशनल ट्रेसिएबिलिटी सिस्टम्स लिमिटेड मिलकर पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप में राष्ट्रीय बागवानी मिशन और राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत उत्तर प्रदेश के 25 ज़िलों में 41 हज़ार हैक्टेयर क्षेत्र में जैविक खेती परियोजना चला रहे हैं। जैविक खेती का प्रमाणीकरण कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण यानी एपेडा से मान्यताप्राप्त इंडोसर्ट और एसजीएस संस्थाएं कर रही हैं।

राष्ट्रीय बागवानी मिशन के तहत उत्तर प्रदेश के 25 ज़िलों में 15 हज़ार हैक्टेयर क्षेत्रफल में 9225 पंजीकृत किसानों के खेतों पर फल और सब्ज़ियों की खेती अन्य फसल चक्रों में की जा रही है, जबकि ऱाष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत उत्तर प्रदेश के 24 ज़िलों में 26 हज़ार हैक्टेयर क्षेत्रफल में 12790 पंजीकृत किसानों के खेतों पर खाद्य, तिलहन और दलहन की खेती की जा रही है।

इन योजनाओं के तहत इन संस्थाओं के माध्यम से किसानों के समूहों को पहले जैविक फसल उत्पादन के लिए पंजीकृत किया जाता है फिर उन्हें उत्पादन की जैविक विधियों का प्रशिक्षण दिया जाता है। जैविक खेती प्रणाली अपनाने के लिए प्रेरित करने के साथ-साथ किसानों को कृमि खाद इकाई, जैविक खेती तथा जैविक प्रमाणीकरण के बारे में भी प्रशिक्षित किया जाता है। किसानों के खेतों से मिट्टी के नमूने लेकर भूमि स्वास्थ्य की जाँच करवाई जाती है। इन नमूनों से मिट्टी के लिए लाभदायक सूक्ष्म जीवाणुओं को अलग करके जैविक कल्चर तैयार किया जाता है। यह जैविक कल्चर किसानों में वितरित किया जाता है जिसे किसान गोबर की सड़ी खाद के साथ मिलाकर खेत में इस्तेमाल करते हैं। इससे भूमि की उर्वरा शक्ति और साथ ही फसल उत्पादन भी बढ़ता है।

किसान के खेत से प्राप्त सभी प्रकार के आँकड़े नैफ़ेड और आईटीएस को प्राप्त कराता है जिन्हें नैफ़ेड और आईटीएस की वेबसाइट पर देखा जा सकता है। ये आँकड़े किसानों की ट्रेसिएबिलिटी में काम आते हैं। ट्रेसिएबिलिटी इनके उत्पादों के पैदा होने से बाज़ार होते हुए उपभोक्ता तक पहुँचने और ज़रूरत पड़ने पर वापस उत्पादक तक पहुँचने की व्यवस्था है।

विशेषज्ञों का कहना है कि जैविक उत्पाद का स्वाद और गुणवत्ता पारंपरिक खेती के जरिए उगाये जाने वाले उत्पाद से ज्यादा बेहतर होता है। कीटनाशक हवा के साथ-साथ मीलों तक अपना दुष्प्रभाव छोड़ते हैं इसलिए इनका असर क्षेत्र के लोगों के स्वास्थ्य पर भी पड़ता है इसलिए जैविक खाद्य स्वास्थ्य के लिहाज से भी बेहतरीन होते हैं। विभिन्न शोधों से भी जाहिर हुआ है कि पारंपरिक खेती के जरिए उगाए गए उत्पादों के मुकाबले जैविक उत्पादों में विटामिन आदि की मात्रा ज्यादा होती है और इसमें रासायनिक कीटनाशक का अंश भी नहीं होता।

अब तक साधारण खेती कर रहे किसानों और अन्य जानकारों की आशंका थी कि जैविक खेती करने से उत्पादन पहले के मुक़ाबले कम हो जाएगा लेकिन उत्तर प्रदेश में जैविक खेती के प्रयोग के आँकड़े बताते हैं कि जैविक खेती के पहले साल में लगभग पहले के ही बराबर पैदावार मिली जबकि दूसरे साल में उनकी पैदावार पहले से क़रीब एक चौथाई बढ़ गई।

राष्ट्रीय बागवानी मिशन के मुख्य सलाहकार डॉ आरके पाठक का कहना है, "हमारे यहाँ जो रसायनों पर आधारित खेती हो रही थी उससे धीऱे धीरे उत्पादकता कम हो रही थी। उत्पादन की गुणवत्ता प्रभावित हो रही थी और पर्यावरण प्रदूषित हो रहा था। इस वजह से हमारे नीति निर्धारकों ने जैविक खेती को बढ़ावा देने के बारे में सोचा।" उन्होंने कहा, "जैविक खेती को जब शुरू किया गया तो लोगों को लगा कि क्या वाकई इससे उत्पादकता बढ़ेगी और खरपतवार ख़त्म हो जाएंगे? लेकिन हमने यह कर दिखाय। अब जो किसान जैविक खेती कर रहे हैं उनका उत्पादन रासायनिक फर्टिलाइज़रों का प्रयोग करने वाले किसानों से हर मायने में बेहतर है।"

खेतों को पूरी तरह जैविक के रूप में परिवर्तित करने के लिए किसानों को तीन साल तक पूरी तरह से जैविक खादों और जैविक कीटनाशकों का ही उपयोग करना होता है। तीन साल तक सफलता के साथ जैविक खेती करने के बाद किसानों और उनके खेतों का जैविक के रूप में किसी देशी या विदेशी सत्यापन एजेंसी से समूह प्रमाणीकरण कराया जाता है।

जैविक खेती और जैविक उत्पादों के लिए अब उपभोक्ताओं में भी जागरुकता आई है और दूसरे साधारण उत्पादों के मुक़ाबले ज़्यादा मूल्य होने के बावजूद उनका रुझान जैविक यानी ऑर्गेनिक खाद्य पदार्थो में बढ़ रहा है। जैविक खाद्य पदार्थों का अलग बाज़ार बनाने के लिए स्वयंसेवी संस्था मोरारका फ़ाउंडेशन ने मुंबई में अपनी आउटलेट "डाउन टू अर्थ" खोली है। हैफेड ने भी प्रारम्भिक तौर पर पंचकूला, चंडीगढ़ और दिल्ली के बाजारों में 500 मिलीलीटर की पैकिंग में प्रमाणित जैविक सरसों तेल और 25 किलोग्राम के थैलों में हैफेड जैविक गेंहू की बिक्री शुरू की है। जैविक खेती के लिए काम करने वाली संस्था आईटीएस भी रिलायंस फ़्रेश, मदर डेयरी और स्पेंसर्स आदि रिटेल आउटलेट के साथ मिलकर भारत में किसानों के जैविक उत्पादों का एक अलग बाज़ार बनाने की कोशिशों में लगी है।
ऋचा कुलश्रेष्ठ

ऋचा कुलश्रेष्ठ दिल्‍ली में रहती हैं उन्‍होंने यह लेख मेल से खेत खलियान के भेजा है।

2 comments:

‘नज़र’ said...

बहुत अच्छा लेख!

परमजीत बाली said...

बढिया आलेख है बधाई।